ग्वालियर: चलती बस बनी आग का गोला, 45 जिंदगियां बाल-बाल बचीं; आखिर कब तक सड़कों पर दौड़ेंगे ये ‘मौत के डिब्बे’?

ग्वालियर (द टाइम्स ऑफ एमपी): सोमवार की रात ग्वालियर में एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया, लेकिन इसने एक बार फिर सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है। गुड़गांव से पन्ना जा रही एक वीडियो कोच बस (UP93 CT-6747) पुरानी छावनी के पास आग का गोला बन गई। गनीमत रही कि ड्राइवर की सूझबूझ से बस में सवार 45 यात्रियों को समय रहते बाहर निकाल लिया गया, वरना बुलढाणा जैसा भयावह मंजर दोहराया जा सकता था।
ड्राइवर की सतर्कता, सिस्टम की लापरवाही घटना रात करीब 12 बजे की है। बस अपनी रफ्तार में थी तभी ड्राइवर ने टायर से चिंगारी निकलते देखी। बिना एक पल गंवाए उसने बस को हाईवे किनारे रोका और यात्रियों को तत्काल नीचे उतरने को कहा। यात्रियों के उतरते ही महज 20 मिनट में पूरी बस खाक हो गई। ड्राइवर की सतर्कता ने जान तो बचा ली, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी नौबत आती ही क्यों है?
सरकार की ‘नींद’ और जनता की जान यह पहली बार नहीं है जब किसी स्लीपर या वीडियो कोच बस में आग लगी हो। आए दिन ऐसे हादसे हो रहे हैं, लोग जिंदा जल रहे हैं, लेकिन सरकार और परिवहन विभाग के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। कई विकसित देशों में यात्रियों की सुरक्षा को खतरे में डालने वाली ऐसी बस बॉडी डिजाइन्स और ज्वलनशील पदार्थों से बनी बसों को पूरी तरह बैन (Ban) किया जा चुका है। लेकिन हमारे देश में मुनाफाखोर बस ऑपरेटर्स और भ्रष्ट सिस्टम की मिलीभगत से ये ‘चलती-फिरती चिताएं’ धड़ल्ले से दौड़ रही हैं।
जांच के नाम पर खानापूर्ति? हर हादसे के बाद जांच कमेटियां बनती हैं, लेकिन नतीजा वही ‘ढाक के तीन पात’। क्या प्रशासन इंतजार कर रहा है कि कब कोई बड़ा हादसा हो और सैकड़ों जानें जाएं? जिन बसों को सड़क से हट जाना चाहिए, वे यात्रियों को भरकर मौत का सफर करा रही हैं। अब वक्त आ गया है कि सरकार इन जानलेवा बसों पर कड़ा फैसला ले, वरना सड़कों पर खून और राख का यह खेल ऐसे ही चलता रहेगा।

