ISRO PSLV-C62 लॉन्च: 2026 की शुरुआत में भारत को ‘अंतरिक्ष’ में बड़ा झटका, मिशन अन्वेषा फेल होने से सुरक्षा को नुकसान

ISRO PSLV-C62

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नीमच/श्रीहरिकोटा: ISRO PSLV-C62 लॉन्च भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और देश के करोड़ों देशवासियों के लिए साल 2026 की शुरुआत एक गहरी निराशा के साथ हुई है। देश की सीमाओं की सुरक्षा को अभेद्य बनाने के सपने के साथ आज सुबह श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से उड़ान भरने वाला ISRO PSLV-C62 लॉन्च अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सका। तकनीकी खामियों के चलते यह मिशन पूरी तरह विफल हो गया है।

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ISRO PSLV-C62 लॉन्च की इस विफलता ने न केवल वैज्ञानिकों की मेहनत पर पानी फेरा है, बल्कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के उस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट को भी गहरा धक्का दिया है, जो चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर ‘तीसरी आंख’ बनने वाला था।

 आसमान में क्या हुआ: वो 15 मिनट जो भारी पड़े ISRO PSLV-C62 लॉन्च के बाद

ISRO PSLV-C62 लॉन्च सोमवार सुबह 10:18 बजे जब रॉकेट ने उड़ान भरी, तो सब कुछ सामान्य लग रहा था। कंट्रोल रूम में तालियों की गड़गड़ाहट थी, लेकिन यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिक सकी। लॉन्चिंग के करीब 10 मिनट बाद, जब रॉकेट अपने तीसरे चरण (Third Stage) में था, तभी मिशन कंट्रोल रूम की स्क्रीन्स पर डेटा फ्रीज हो गया।

ISRO PSLV-C62 लॉन्च इसरो के टेलीमेट्री ट्रैकिंग और कमांड नेटवर्क (ISTRAC) के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, ISRO PSLV-C62 लॉन्च के दौरान तीसरे चरण (PS3 Stage) में इग्निशन के वक्त भारी गड़बड़ी देखी गई। रॉकेट अपनी तय कक्षा (Orbit) की ओर बढ़ने के बजाय अनियंत्रित होकर घूमने लगा (Tumbling)। वैज्ञानिकों की भाषा में इसे ‘एटीट्यूड लॉस’ कहा जाता है। कुछ ही पलों में रॉकेट और उसके साथ मौजूद 16 सैटेलाइट्स पृथ्वी के वायुमंडल में ही खाक हो गए या समुद्र में जा गिरे।

लगातार दूसरी बार ‘तीसरे चरण’ ने दिया धोखा ISRO PSLV-C62 लॉन्च

ISRO PSLV-C62 लॉन्च वैज्ञानिकों और रक्षा विशेषज्ञों के माथे पर चिंता की लकीरें इसलिए भी गहरी हैं क्योंकि यह घटना एक पैटर्न की तरह दिख रही है। आपको याद होगा कि पिछले साल मई 2025 में भी PSLV-C61 मिशन के दौरान ठीक इसी तरह की समस्या सामने आई थी। उस वक्त भी तीसरे चरण में चैंबर प्रेशर गिरने और धमाका होने की खबरें आई थीं।

इसरो के सबसे भरोसेमंद रॉकेट PSLV, जिसे दुनिया ‘वर्कहॉर्स’ कहती है, का लगातार दो बार एक ही तरह की तकनीकी खामी का शिकार होना गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या यह क्वालिटी कंट्रोल की कमी है या फिर किसी पुर्जे में मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट? इसकी जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जा रहा है।

‘अन्वेषा’ का खोना: दुश्मनों के लिए राहत, भारत के लिए चुनौती

ISRO PSLV-C62 लॉन्च के इस मिशन की सबसे बड़ी क्षति DRDO द्वारा विकसित ‘अन्वेषा’ (EOS-N1) सैटेलाइट का नष्ट होना है। यह कोई साधारण उपग्रह नहीं था। इसे विशेष रूप से रणनीतिक निगरानी के लिए डिजाइन किया गया था।

  • हाइपरस्पेक्ट्रल विजन: अन्वेषा में ऐसे सेंसर लगे थे जो घने बादलों और जंगलों के आर-पार देख सकते थे।

  • बॉर्डर सर्विलांस: चीन और पाकिस्तान से सटी सीमाओं पर बंकरों का निर्माण हो या सैनिकों की गुप्त आवाजाही, अन्वेषा हर हरकत की एचडी तस्वीरें मिनटों में भेजने में सक्षम था।

  • सुरक्षा में सें: इस सैटेलाइट के न होने से सीमा पार की गतिविधियों पर नजर रखने की भारत की क्षमता को अस्थायी रूप से झटका लगा है। रक्षा जानकारों का मानना है कि अगला सैटेलाइट तैयार करने में कम से कम 8 से 10 महीने का वक्त और लग सकता है।

बाजार पर असर: 15 विदेशी ग्राहकों का भरोसा डगमगाया

ISRO PSLV-C62 लॉन्च की विफलता सिर्फ भारत का नुकसान नहीं है। इस रॉकेट पर मॉरीशस, स्पेन और कई यूरोपीय देशों के 15 छोटे उपग्रह (Co-passenger satellites) भी सवार थे। ग्लोबल स्पेस मार्केट में इसरो अपनी सस्ती और सटीक लॉन्चिंग के लिए जाना जाता है।

अंतरिक्ष बाज़ार के विश्लेषकों का मानना है कि लगातार विफलताओं से विदेशी क्लाइंट्स का भरोसा डगमगा सकता है। स्पेसएक्स जैसी निजी कंपनियों की कड़ी टक्कर के बीच, इसरो के लिए अपने 94% सक्सेस रेट वाले रिकॉर्ड को बनाए रखना अब एक बड़ी चुनौती होगी।

गगनयान और चंद्रयान पर अनिश्चितता के बादल

संसद से लेकर विज्ञान गलियारों तक अब एक ही चर्चा है—क्या इसका असर भारत के मानव मिशन ‘गगनयान’ पर पड़ेगा? हालांकि गगनयान के लिए GSLV Mk-III (LVM3) रॉकेट का इस्तेमाल होता है, लेकिन पूरी लांचिंग प्रक्रिया और ग्राउंड स्टेशन के प्रोटोकॉल एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक ISRO PSLV-C62 लॉन्च की विफलता की असली वजह (Root Cause Analysis) सामने नहीं आ जाती, तब तक इसरो आगामी किसी भी बड़े लॉन्च को टाल सकता है। इसका सीधा मतलब है कि चंद्रयान सीरीज के अगले मिशन और गगनयान की टाइमलाइन 6 महीने से लेकर 1 साल तक पीछे खिसक सकती है।

फिलहाल, पूरा देश इसरो के वैज्ञानिकों के साथ खड़ा है, क्योंकि गिरकर संभलना और फिर इतिहास रचना इसरो की पुरानी आदत रही है।


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