ईरान-इजरायल युद्ध से रसोई (LPG Gas) पर संकट: भारत सरकार ने रिफाइनरियों को दिया ‘इमरजेंसी’ प्रोडक्शन का आदेश

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता (LPG Gas) | मध्य-पूर्व (मिडल ईस्ट) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान-इजरायल के बीच छिड़ी सीधी जंग ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। इस युद्ध की तपिश अब भारतीय रसोइयों तक न पहुँचे, इसके लिए भारत सरकार ने बेहद कड़े और एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। ताजा घटनाक्रम में, केंद्र सरकार ने अपनी विशेष ‘इमरजेंसी पावर्स’ का इस्तेमाल करते हुए देश की सभी तेल रिफाइनरी कंपनियों को तत्काल प्रभाव से LPG Gas का उत्पादन बढ़ाने का कड़ा आदेश जारी किया है।
सप्लाई चेन पर मंडराता खतरा और सरकार की सक्रियता
रॉयटर्स की एक हालिया रिपोर्ट ने इस बात की पुष्टि की है कि खाड़ी देशों में बिगड़ते हालात के कारण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर जहाजों की आवाजाही बुरी तरह बाधित हुई है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा LPG Gas आयातक देश है, ऐसे में आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में मामूली रुकावट भी देश के करोड़ों घरों का बजट और चूल्हा बिगाड़ सकती है। इसी खतरे को भांपते हुए पेट्रोलियम मंत्रालय ने 5 मार्च की देर रात एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद दिशा-निर्देश जारी किए।
इस आदेश की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब देश की सभी रिफाइनरियों को अपने पास उपलब्ध प्रोपेन (Propane) और ब्यूटेन (Butane) का उपयोग केवल और केवल LPG Gas बनाने के लिए करना होगा। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि इन गैसों का डाइवर्जन किसी अन्य औद्योगिक या पेट्रोकेमिकल कार्य के लिए नहीं किया जाएगा।
‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ का विकल्प और रूस की भूमिका
हालाँकि हालात चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत अब केवल होर्मुज रूट के भरोसे नहीं है। LPG Gas की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ऊर्जा निर्भरता को विविधता दी है। साल 2022 में जहाँ भारत रूस से अपनी जरूरत का महज 0.2% तेल खरीदता था, वहीं फरवरी 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 20% तक पहुँच चुका है। वर्तमान में भारत रूस से प्रतिदिन लगभग 10.4 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात कर रहा है।
अधिकारियों का कहना है कि भारत के पास अभी कच्चे तेल और LPG Gas का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, इसलिए जनता को पैनिक करने की आवश्यकता नहीं है। सरकार दुनिया के दूसरे हिस्सों से भी सप्लाई बढ़ाने पर विचार कर रही है ताकि खाड़ी देशों से होने वाली कमी को पूरा किया जा सके।
सरकारी कंपनियों को प्राथमिकता और रिलायंस पर असर
सरकार के इस फैसले का सबसे बड़ा प्रभाव प्राइवेट सेक्टर की दिग्गज कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) पर पड़ता दिख रहा है। प्रोपेन और ब्यूटेन को LPG Gas की ओर मोड़ने से रिलायंस के पेट्रोकेमिकल उत्पादन और ‘अल्काइलेट्स’ के एक्सपोर्ट में भारी कमी आ सकती है। अल्काइलेट्स का उपयोग पेट्रोल की गुणवत्ता सुधारने में होता है। जानकारों का मानना है कि इस फैसले से कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन में गिरावट आ सकती है, क्योंकि पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स बाजार में LPG Gas की तुलना में अधिक मुनाफे वाले होते हैं। फिर भी, सरकार की प्राथमिकता देश के 33.2 करोड़ सक्रिय LPG Gas उपभोक्ताओं को निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित करना है।
कतर में उत्पादन ठप: CNG और PNG पर भी खतरा
युद्ध का असर सिर्फ LPG Gas तक सीमित नहीं है। ईरान द्वारा कतर के ‘रास लफान’ इंडस्ट्रियल सिटी पर किए गए ड्रोन हमलों के बाद वहां लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का उत्पादन रोक दिया गया है। भारत अपनी जरूरत की लगभग 40% एलएनजी कतर से ही आयात करता है। आपूर्ति में 40% की इस भारी कटौती ने सिटी गैस वितरकों (CGD) की चिंता बढ़ा दी है। अगर हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले दिनों में सीएनजी और पीएनजी की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल सकता है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत की आधी से ज्यादा LPG Gas और LNG इन्हीं रास्तों से मंगाता है।
‘फोर्स मेजर’ और भविष्य की चुनौती
भारत की सबसे बड़ी गैस आयातक कंपनी, पेट्रोनेट एलएनजी ने पहले ही कतर-एनर्जी को ‘फोर्स मेजर’ (Force Majeure) नोटिस भेज दिया है। इसका सीधा अर्थ है कि युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण वे मौजूदा अनुबंधों को पूरा करने में असमर्थ हैं। इस स्थिति ने ‘स्पॉट मार्केट’ में गैस की कीमतों को 25 डॉलर प्रति यूनिट तक पहुँचा दिया है, जो सामान्य दरों से दोगुनी है। अगर यह संकट लंबा खिंचा, तो डोमेस्टिक LPG Gas की कीमतों को स्थिर रखना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
कुल मिलाकर, सरकार फिलहाल ‘इमरजेंसी मोड’ में है। जहाँ एक तरफ घरेलू LPG Gas उत्पादन बढ़ाने पर जोर है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैकल्पिक रास्तों और नए साझेदारों की तलाश तेज कर दी गई है ताकि युद्ध का प्रभाव भारतीय जनता पर कम से कम पड़े।
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