Malhargarh NDPS Case: कुछ दिन पहले ‘देश के टॉप-10’ में, आज कटघरे में; ‘बेस्ट थाने’ की पुलिस ने छात्र को बस से उतारकर बनाया तस्कर

मंदसौर/इंदौर (ब्यूरो रिपोर्ट): कहते हैं ‘दीपक तले अंधेरा’ होता है। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में यह कहावत मल्हारगढ़ थाने पर बिल्कुल सटीक बैठती है। यह वही थाना है जिसने अभी कुछ ही दिन पहले अपनी बेहतरीन कार्यशैली के लिए देश भर में वाहवाही बटोरी थी, लेकिन आज Malhargarh NDPS Case ने इसकी साख को मिट्टी में मिला दिया है। एक होनहार छात्र को ड्रग तस्कर बनाने की पुलिसिया स्क्रिप्ट का पर्दाफाश हुआ है, और वह भी एक सीसीटीवी फुटेज से।
Malhargarh NDPS Case मंगलवार को इंदौर हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मंदसौर एसपी विनोद कुमार मीणा को शर्मिंदगी उठानी पड़ी। उन्होंने कोर्ट में स्वीकार किया कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में गंभीर खामियां हुई हैं, जिसके बाद 6 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया है।
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ऐलान करते हैं- “India Top 10 Police Stations”। इस लिस्ट में 9वें नंबर पर नाम आता है मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के मल्हारगढ़ थाने का। नेताओं ने बधाइयां दीं, अफसरों ने सीना चौड़ा किया और सोशल मीडिया पर ‘गौरवपूर्ण क्षण’ की बाढ़ आ गई।
लेकिन ठहरिए… अभी उस प्रशस्ति पत्र की स्याही सूखी भी नहीं थी कि India Top 10 Police Stations की इस रैंकिंग की धज्जियां उड़ गईं। जिस थाने को ‘जनता के विश्वास’ और ‘न्याय’ का प्रतीक बताकर 9वां स्थान दिया गया, उसी थाने ने एक मासूम छात्र को बस से उतारकर ड्रग तस्कर बना दिया।
यह खबर कोई सामान्य रिपोर्ट नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर एक करारा तमाचा है, जो सिर्फ फाइलों की चमक देखकर अवार्ड बांट देता है।
‘बेस्ट पुलिसिंग’ या ‘बेस्ट स्क्रिप्ट राइटिंग’ का अवार्ड?
गृह मंत्रालय ने कहा था कि थानों का चयन 70 कड़े पैमानों (Parameters) पर किया गया है। अब जनता पूछ रही है कि क्या उन 70 पैमानों में ये बिंदु भी शामिल थे?
चलती बस से छात्र को किडनैप की तरह उठाना।
भरे बाजार को कागजों में ‘श्मशान घाट’ बना देना।
CCTV होने के बावजूद कोर्ट में झूठ बोलना।
Malhargarh NDPS Case अगर India Top 10 Police Stations की लिस्ट में आने के लिए यही योग्यता चाहिए, तो वाकई मल्हारगढ़ थाना नंबर-1 का हकदार है। मंदसौर एसपी ने इस उपलब्धि को ‘टीम वर्क’ बताया था। वाकई, क्या गजब का ‘टीम वर्क’ है! पूरी टीम ने मिलकर एक निर्दोष को जेल भेजने की जो पटकथा (Script) लिखी, वह किसी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं थी। बस अफ़सोस, ‘डायरेक्टर साहब’ (पुलिस) कैमरे (CCTV) को ऑफ करना भूल गए।
उपमुख्यमंत्री जी, अब कैसी उपलब्धि ?
29 नवंबर को मल्हारगढ़ के विधायक और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने सोशल मीडिया पर लिखा था- “यह क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि है, पुलिस ने सेवा और समर्पण का उदाहरण पेश किया है।”
आज जनता पूछ रही है- माननीय, क्या यही वह ‘सेवा और समर्पण’ है? एक 12वीं पास छात्र, जो पीएससी की तैयारी करना चाहता था, उसे आपकी ‘बेस्ट पुलिस’ ने अपराधी बना दिया। क्या अब आप उसी सोशल मीडिया पर आकर इस ‘कुकृत्य’ की जिम्मेदारी लेंगे? यह थाना आपकी नाक के नीचे चल रहा है और अवार्ड की आड़ में खाकी वर्दी वाला गुंडाराज पनप रहा था।
श्मशान की झूठी कहानी बनाम बस का सच
पुलिस ने अपनी एफआईआर (FIR) में दावा किया था कि मुखबिर की सूचना पर उन्होंने सोहनलाल को बांडा खाल चौराहा स्थित श्मशान घाट के सामने से गिरफ्तार किया। पुलिस के मुताबिक, उसके बैग से 2 किलो 714 ग्राम अफीम मिली।
लेकिन, बचाव पक्ष द्वारा पेश किए गए सीसीटीवी (CCTV) फुटेज ने ‘बेस्ट थाने’ की पोल खोल दी। फुटेज में साफ दिखा कि पुलिस 29 अगस्त 2025 को सोहनलाल को किसी श्मशान से नहीं, बल्कि एक यात्री बस से जबरन उतार रही है। चलती बस में चढ़कर, एक यात्री को घसीटकर ले जाना और फिर कागजों में उसे श्मशान से गिरफ्तार दिखाना— यह में पुलिस की आपराधिक साजिश की ओर इशारा करता है।
हाईकोर्ट की फटकार- “10 साल कौन लौटाएगा?”
जस्टिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने कहा:
“आप एक युवा के भविष्य के साथ खेल रहे हैं। अगर इस युवक को 10 साल की सजा हो जाती, तो उसके जीवन के ये साल कौन लौटाता ?”
कोर्ट की सख्ती के बाद ही एसपी ने माना कि जांच में चूक हुई है। नतीजतन, देश के तथाकथित ‘बेस्ट थाने’ के 6 पुलिसकर्मी अब सस्पेंड हैं और विभागीय जांच का सामना कर रहे हैं।
श्मशान में न्याय का अंतिम संस्कार
Malhargarh NDPS Case पुलिस ने अपनी FIR में लिखा कि आरोपी ‘श्मशान घाट’ के पास से पकड़ा गया। यह महज एक संयोग नहीं, बल्कि एक रूपक (Metaphor) है। मल्हारगढ़ पुलिस ने वास्तव में उस दिन श्मशान में ही ‘सच्चाई’ और ‘ईमानदारी’ का अंतिम संस्कार करने की कोशिश की थी।

सोचिए, अगर उस बस में सीसीटीवी नहीं होता, तो आज वह ‘बेस्ट थाना’ अपनी पीठ थपथपा रहा होता और वह छात्र जेल की काल कोठरी में सड़ रहा होता। India Top 10 Police Stations का तमगा उस छात्र के सीने पर लगे ‘चरसी’ के टैग से ज्यादा भारी नहीं हो सकता।
सरकार, यह अवार्ड वापस लो!
Malhargarh NDPS Case आज हम कड़े शब्दों में केंद्र सरकार और राज्य सरकार से मांग करते हैं- यह अवार्ड वापस लिया जाए। जिस थाने के 6 पुलिसकर्मी सस्पेंड हो चुके हों, जिस थाने के एसपी को हाई कोर्ट में माफी मांगनी पड़ी हो, उस थाने के दीवार पर टंगा “देश का 9वां सर्वश्रेष्ठ थाना” का बोर्ड, न्याय व्यवस्था का मुंह चिढ़ा रहा है।
Malhargarh NDPS Case अगर यह अवार्ड वापस नहीं लिया गया, तो यह उन हजारों ईमानदार पुलिसकर्मियों का अपमान होगा जो वाकई धूप और बारिश में जनता की सेवा कर रहे हैं। यह उन मापदंडों का अपमान है जिनके आधार पर यह रैंकिंग बनी थी।
डेटा का खेल या आंखों में धूल?
Malhargarh NDPS Case दावा किया गया था कि थाने ने ‘पेंडिंग मामले’ निपटाए। अब समझ आ रहा है कि मामले कैसे निपटाए जा रहे थे। किसी को भी उठाओ, जेब में अफीम डालो, और केस डायरी बंद! ‘आमजन में विश्वास’ का नारा देने वाली पुलिस ने आमजन के मन में जो ‘खौफ’ पैदा किया है, उसे धोने में सालों लग जाएंगे।
India Top 10 Police Stations की लिस्ट से मल्हारगढ़ का नाम तुरंत हटाया जाना चाहिए। यह सम्मान एक दागदार वर्दी पर शोभा नहीं देता। यह ‘बेस्ट थाना’ नहीं, बल्कि इस वक्त का ‘सबसे दागी थाना’ है।
बैग और दूसरे आरोपी का पेच
Malhargarh NDPS Case सुनवाई के दौरान वीडियो में सोहनलाल के पास एक बैग दिखाई दिया, जिसे लेकर पुलिस दावा कर रही है कि उसमें अफीम थी। हालांकि, बचाव पक्ष का कहना है कि पुलिस ने पूरी कहानी गढ़ी है। पुलिस अब अपनी लाज बचाने के लिए दूसरे आरोपी चंद्रप्रकाश पाटीदार का सहारा ले रही है, जिस पर पहले से एनडीपीएस के केस दर्ज हैं। पुलिस का कहना है कि चंद्रप्रकाश ने ही सोहन को बुलाया था। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर सोहन अपराधी था, तो पुलिस को गिरफ्तारी का स्थान बदलने (श्मशान vs बस) की जरूरत क्यों पड़ी?
होनहार छात्र का सपना टूटा
Malhargarh NDPS Case ने 12वीं में फर्स्ट डिवीजन पास करने वाले 18 वर्षीय सोहनलाल के सपनों को चकनाचूर कर दिया है। पीएससी (PSC) की तैयारी करने की चाहत रखने वाला यह छात्र अब जेल की दीवारों के पीछे है। एनडीपीएस एक्ट में जमानत मिलना बेहद मुश्किल होता है, और सजा भी 10 से 20 साल की होती है।
सिस्टम पर सवाल
क्या ‘टॉप-10’ की रैंकिंग केवल कागजी आंकड़ों पर आधारित थी?
क्या मल्हारगढ़ पुलिस ने अवार्ड की आड़ में मनमानी शुरू कर दी थी?
अगर सीसीटीवी नहीं होता, तो क्या ‘बेस्ट पुलिस’ का यह झूठ कभी पकड़ा जाता?
फिलहाल, Malhargarh NDPS Case ने यह साबित कर दिया है कि वर्दी पर लगा मेडल ईमानदारी की गारंटी नहीं होता। अब देखना यह है कि कोर्ट इस मामले में क्या अंतिम फैसला सुनाता है।
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