Neemuch Road Safety Campaign: काली फिल्म वाले VIP माफ, आम जनता साफ? 670 चालान और पार्किंग पर 3 बड़े सवाल

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Neemuch Road Safety Campaign 

Neemuch Road Safety Campaign 

नीमच : लोकतंत्र में कानून की आंखों पर पट्टी इसलिए बांधी गई थी ताकि वह अमीर-गरीब का भेद न देख सके, लेकिन नीमच की सड़कों पर ऐसा लगता है कि कानून ने अपनी पट्टी खोल दी है और वह ‘चेहरा देखकर’ कार्यवाही कर रहा है। हाल ही में शहर में Neemuch Road Safety Campaign जो विशेष अभियान चलाया गया, उसने यातायात व्यवस्था सुधारने से ज्यादा पुलिस की कार्यप्रणाली और नीयत पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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12 दिसंबर को जारी पुलिस प्रेस नोट बताता है कि 15 दिनों के Neemuch Road Safety Campaign  में 670 चालान बनाए गए और करीब 3 लाख रुपये (2,93,400) वसूले गए। आंकड़े शानदार हैं, लेकिन इन आंकड़ों के पीछे का सच आम जनता के गले नहीं उतर रहा। टैगोर मार्ग से आई एक तस्वीर और शहर में घूमती रसूखदारों की गाड़ियां इस अभियान की ‘निष्पक्षता’ की धज्जियां उड़ा रही हैं।

काली फिल्म और VIP पर पुलिस की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ क्यों ?

इस पूरे Neemuch Road Safety Campaign  का सबसे कड़वा सच यह है कि पुलिस का डंडा केवल कमजोर पर चलता है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि वाहनों के शीशों पर काली फिल्म (Black Film/Tinted Glass) लगाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। सुरक्षा के लिहाज से यह घोर अपराध है।

लेकिन क्या Neemuch Road Safety Campaign के दौरान किसी रसूखदार, किसी नेता या तथाकथित ‘VIP’ की काली फिल्म वाली लक्जरी कार पर कार्यवाही हुई ? शहर में धड़ल्ले से काली फिल्म चढ़ी गाड़ियां घूम रही हैं, जिनमें बैठे लोग शायद कानून से ऊपर खुद को मानते हैं। आम जनता का आरोप है कि ऐसी गाड़ियों को देखकर पुलिसकर्मी रोकने की बजाय या तो अनदेखा कर देते हैं या फिर रसूख के डर से चुप्पी साध लेते हैं।

सवाल यह है कि जब एक आम आदमी हेलमेट भूल जाए या नो-पार्किंग में खड़ा हो जाए, तो उस पर तत्काल चालान कटता है। तो फिर काली फिल्म लगाकर घूमने वाले ‘बाहुबलियों’ पर यह नियम लागू क्यों नहीं होता ? यह दोहरा मापदंड क्यों ? क्या सुरक्षा के नियम और कानून सिर्फ मध्यम वर्गीय परिवार के लिए बने हैं?

तस्वीर में कैद भेदभाव: ‘कवर’ वाली कार पर मेहरबानी

VIP कल्चर के अलावा, टैगोर मार्ग की एक वायरल तस्वीर ने भी पुलिस की कार्यशैली की पोल खोल दी है। तस्वीर में यातायात पुलिस का अमला एक सफेद कार (MP 44 CA 1647) पर मुस्तैदी से व्हील लॉक लगाता दिख रहा है।

विडंबना देखिए! ठीक उसी कार के बगल में एक और कार खड़ी है, जो पूरी तरह बॉडी कवर से ढकी है। उस पर जमी धूल चीख-चीख कर गवाही दे रही है कि वह गाड़ी वहां आज से नहीं, बल्कि हफ्तों से ‘स्थायी अतिक्रमण’ बनकर खड़ी है। पुलिस को वह “परमानेंट बाधा” नजर नहीं आई, लेकिन जो वाहन चालक शायद दवाई लेने या बैंक के काम से दो पल रुका, उस पर Neemuch Road Safety Campaign का चाबुक चल गया। जनता पूछ रही है—बगल वाली कार अदृश्य थी या उस पर कार्यवाही करने की हिम्मत नहीं थी?

पार्किंग दी नहीं, तो गाड़ी हवा में टांग दें ?

यातायात पुलिस के साथ-साथ नीमच नगर पालिका भी इस अव्यवस्था की बराबर की जिम्मेदार है। शहर के हृदय स्थल टैगोर मार्ग, नया बाजार और प्रमुख चौराहों पर पार्किंग जोन (Parking Zone) नाम की कोई चीज नहीं है।

जब प्रशासन ने पार्किंग की जगह ही मुहैया नहीं कराई, तो आम नागरिक अपनी गाड़ी कहां ले जाए?

  • क्या वह कार को फोल्ड करके जेब में रख ले?

  • क्या नगर पालिका उम्मीद करती है कि लोग गाड़ी हवा में पार्क करेंगे?

बुनियादी ढांचा (Infrastructure) उपलब्ध कराए बिना जनता पर जुर्माने की बौछार करना, प्रशासन की तानाशाही को दर्शाता है। यह यातायात सुधार नहीं, बल्कि ‘वैध वसूली’ जैसा प्रतीत होता है।

जब इस विषय पर यातायात थाना प्रभारी सोनू बडगूजर से सीधी बात की गई, तो उन्होंने किसी भी तरह का बहाना बनाने या बात को घुमाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने एक सच्चे अधिकारी की तरह पूरी ईमानदारी से स्वीकार किया:

“जी, यह हमारी टीम से चूक हुई है कि ध्यान उस ढकी हुई कार पर नहीं गया। हम अपनी गलती मानते हैं।
मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आगे से इसका विशेष ध्यान रखा जाएगा। कल ही मेरी टीम उन सभी वाहनों पर सख्त कार्यवाही करेगी जो परमानेंट रोड पर खड़े हैं
या अतिक्रमण कर रहे हैं।”

यातायात प्रभारी की इस स्वीकारोक्ति ने यह साबित कर दिया कि पुलिस का उद्देश्य जनता को परेशान करना नहीं, बल्कि सुधार करना है। गलती मानना साहस का काम है और पुलिस के इस ‘सॉफ्ट टच’ और ईमानदारी ने जनता के बीच उनका सम्मान बढ़ा दिया है।

अजीबोगरीब जवाब: ‘आज बेटी का जन्मदिन है, कल बात करेंगे’

इस ज्वलंत मुद्दे पर जब हमारी न्यूज़ टीम ने नीमच नगर पालिका की मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) दुर्गा बामनिया से फोन पर संपर्क किया और उनसे पूछना चाहा कि शहर में पार्किंग की व्यवस्था क्यों नहीं है और जनता कब तक परेशान होती रहेगी?

तो मैडम का जवाब बेहद गैर-जिम्मेदाराना था। CMO दुर्गा बामनिया ने सवाल का जवाब देने के बजाय यह कहकर फोन काटने की कोशिश की:

“आज मेरी बच्ची का जन्मदिन है, मैं अभी उसमें व्यस्त हूँ। इस विषय पर कल बात करते हैं।”

यह जवाब अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। निस्संदेह, अधिकारी का निजी जीवन होता है, लेकिन जब पूरा शहर पार्किंग की अव्यवस्था से जूझ रहा हो, पुलिस सड़कों पर पसीना बहा रही हो और जनता की जेब कट रही हो, तब एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी का ऐसा जवाब देना क्या उचित है? क्या जनता की समस्या एक दिन के जश्न के लिए टाली जा सकती है?

जिम्मेदारों से 3 सीधे सवाल

नीमच की त्रस्त जनता अब प्रशासन से जवाब मांग रही है:

  1. VIP को छूट क्यों? काली फिल्म लगी गाड़ियों और रसूखदारों के वाहनों पर कार्यवाही के आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते ?

  2. पिक एंड चूज क्यों? बगल में खड़ी महीनों पुरानी ‘कवर वाली कार’ को छोड़कर, राहगीरों को निशाना बनाना कौन सा न्याय है ?

  3. वैकल्पिक व्यवस्था कहां है? चालान काटने से पहले प्रशासन बताए कि टैगोर मार्ग पर ‘वैध पार्किंग’ कहां है?

निष्कर्ष: कानून का राज तब स्थापित होता है जब वह सबके लिए समान हो। अगर Neemuch Road Safety Campaign का उद्देश्य वाकई शहर को जाम मुक्त करना है, तो शुरुआत उन काली फिल्म वाली बड़ी गाड़ियों और सड़क घेरकर खड़े स्थायी वाहनों से होनी चाहिए, न कि मजबूर आम आदमी से। जब तक ‘VIP कल्चर’ और ‘आम आदमी’ के बीच का यह भेदभाव खत्म नहीं होगा, ऐसे अभियान जनता की नजर में केवल ‘परेशानी’ और ‘दिखावा’ ही रहेंगे।


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