Success Story of Santosh Devi: भैंस बेचकर शुरू की खेती, अब सेब-अनार से सालाना ₹40 लाख की कमाई; पढ़ें राजस्थान की ‘लखपति’ संतोष देवी की संघर्ष गाथा

Success Story of Santosh Devi

Success Story of Santosh Devi

सीकर, राजस्थान। अगर मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो रेगिस्तान की तपती रेत भी मीठे फलों की खुशबू से महक सकती है। राजस्थान के सीकर जिले के एक छोटे से गांव बेरी की रहने वाली संतोष देवी ने इस कहावत को हकीकत में बदल दिया है। यह Success Story of Santosh Devi आज देश के उन तमाम युवाओं और किसानों के लिए एक प्रेरणा है, जो बंजर जमीन या संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं। महज 5वीं तक शिक्षा प्राप्त करने वाली एक साधारण गृहिणी ने अपनी कड़ी मेहनत और अटूट विश्वास के दम पर 5 बीघा रेतीली जमीन को 40 लाख रुपये सालाना आय वाले बिजनेस में तब्दील कर दिया है।

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कम उम्र में शादी और चुनौतियों का पहाड़

संतोष देवी के जीवन का सफर संघर्षों की एक लंबी दास्तान है। साल 1990 में जब उनकी उम्र महज 15 साल थी, तब उनकी शादी रामकरण खेदड़ से हुई थी। पढ़ाई के नाम पर उनके पास सिर्फ 5वीं तक का ज्ञान था, लेकिन जमीन से जुड़ाव बचपन से ही था। शादी के कुछ समय बाद जब परिवार का बंटवारा हुआ, तो हिस्से में आई 5 बीघा जमीन। यह जमीन उपजाऊ नहीं, बल्कि पूरी तरह बंजर और रेतीली थी।

हालात इतने चुनौतीपूर्ण थे कि वहां सिंचाई के लिए पानी का एक कतरा तक नहीं था। पति रामकरण होमगार्ड की नौकरी करते थे, जिससे महीने में सिर्फ 3 हजार रुपये की आय होती थी। इतने कम पैसों में परिवार का गुजारा करना और बच्चों के बेहतर भविष्य का सपना देखना किसी दुःस्वप्न जैसा था। लेकिन संतोष ने हार नहीं मानी।

नौकरी छोड़ने का बड़ा फैसला और इकलौती भैंस की कुर्बानी

साल 2008 में जब रामकरण करौली में अपनी ड्यूटी पर थे, तब एक अधिकारी ने उन्हें अनार की खेती की संभावनाओं के बारे में बताया। जब उन्होंने यह बात घर आकर संतोष को बताई, तो संतोष ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया। उन्होंने पति से कहा,

“आप यह 3 हजार की नौकरी छोड़ दीजिए, हम अपनी ही जमीन पर पसीना बहाएंगे।”

पूंजी की व्यवस्था करना सबसे बड़ी चुनौती थी। विभाग से 220 अनार के पौधे खरीदने के लिए 5,500 रुपये चाहिए थे, और पूरे सिस्टम को खड़ा करने के लिए करीब 45 हजार रुपये की आवश्यकता थी। उस समय घर में सिर्फ एक भैंस थी। अपनी उम्मीदों को पंख देने के लिए संतोष ने उस भैंस को 25 हजार रुपये में बेच दिया और बाकी पैसे रिश्तेदारों से उधार लिए। यहीं से Success Story of Santosh Devi का असली अध्याय शुरू हुआ।

14 घंटे की मेहनत और आधुनिक खेती का संगम

रेतीले धोरों में पौधे उगाना आसान नहीं था। संतोष देवी ने पारंपरिक खेती के बजाय वैज्ञानिक और जैविक खेती का रास्ता चुना। शुरुआत में बिजली नहीं थी, तो उन्होंने डीजल इंजन से सिंचाई की। बाद में 2012 में सरकारी अनुदान से सोलर प्लांट लगवाया। संतोष रोजाना 14 घंटे खेत में बिताती हैं।

उनकी खेती की सबसे बड़ी यूएसपी ‘ऑर्गेनिक फार्मिंग’ है। वे रासायनिक उर्वरकों के बजाय हर पौधे में 50 किलो गोबर की खाद का उपयोग करती हैं। पौधों को बीमारियों से बचाने के लिए वे चूने और नीले थोथे का खुद तैयार किया हुआ घोल इस्तेमाल करती हैं। उनकी तकनीक इतनी सटीक है कि प्रत्येक पौधे को सप्ताह में सिर्फ एक बार पानी की जरूरत पड़ती है। आज उनके खेत में सेब, सिंदूरी अनार, मौसमी और नींबू के हजारों पेड़ लहलहा रहे हैं।

शेखावाटी कृषि फार्म: एक ब्रांड और ट्रेनिंग सेंटर

आज उनकी 5 बीघा जमीन केवल एक खेत नहीं, बल्कि ‘शेखावाटी कृषि फार्म और उद्यान नर्सरी’ के नाम से एक ब्रांड बन चुकी है। यह नर्सरी भारत सरकार से रजिस्टर्ड है। संतोष देवी अब सिर्फ फल नहीं बेचतीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाले पौधे भी तैयार करती हैं। उनके फॉर्म से होने वाली आय अब सालाना 40 लाख रुपये के पार पहुंच गई है।

उनकी सफलता को देखते हुए सरकार ने उन्हें कई पुरस्कारों से नवाजा है। अब वे अपने इलाके की रोल मॉडल बन चुकी हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से किसान उनके पास कम पानी और कम जमीन में अधिक मुनाफा कमाने की ट्रेनिंग लेने आते हैं।

नई पीढ़ी का जुड़ाव और भविष्य की राह

संतोष देवी का संघर्ष अब उनकी अगली पीढ़ी के लिए रास्ता बन गया है। उनके बेटे राहुल, जिन्होंने बीकानेर से एग्रीकल्चर में ग्रेजुएशन (B.Sc) किया है, अब अपनी मां के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। राहुल खेत में ही एक प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की योजना बना रहे हैं, ताकि गांव के अन्य लोगों को भी रोजगार मिल सके। यह Success Story of Santosh Devi इस बात का प्रमाण है कि खेती यदि सही दिशा और समर्पण के साथ की जाए, तो यह किसी भी कॉर्पोरेट नौकरी से अधिक सम्मान और पैसा दे सकती है।


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