देहदान की महाशक्ति: 80 वर्षीय कमला देवी ने मृत्यु के बाद भी रचा इतिहास, मेडिकल कॉलेज में मिला ‘गार्ड ऑफ ऑनर’

देहदान
नीमच (The Times of MP): मानवता की सेवा के लिए प्राणों की आहुति देने की कहानियाँ तो आपने बहुत सुनी होंगी, लेकिन मृत्यु के बाद अपने शरीर को समाज के काम सौंप देना (देहदान) सबसे बड़ा त्याग माना जाता है। नीमच जिले के ग्राम दड़ौली की 80 वर्षीय कमला देवी नागौरी ने इसी महान परंपरा को निभाते हुए देहदान का संकल्प पूरा किया है। उनके निधन के बाद शोकाकुल परिवार ने आंसू पोंछते हुए उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान किया और उनके पार्थिव शरीर को चिकित्सा शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया। इस साहसिक कदम के सम्मान में प्रशासन ने वीरेंद्र कुमार सकलेचा मेडिकल कॉलेज में उन्हें ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ देकर अंतिम विदाई दी।
धार्मिक मूल्यों से उपजा मानवता का विचार
ग्राम दड़ौली में कमला देवी नागौरी एक मृदुभाषी और धार्मिक प्रवृत्ति की महिला के रूप में जानी जाती थीं। परिजनों का कहना है कि वे हमेशा मानती थीं कि यह शरीर पांच तत्वों से बना है और अंत में इसे मिट्टी में ही मिलना है, लेकिन अगर यह किसी के जीवन या शिक्षा के काम आ सके, तो इससे बड़ा कोई पुण्य नहीं है। उनकी इसी सोच का परिणाम है कि आज उनका देहदान पूरे मालवा-मेवाड़ क्षेत्र में चर्चा और प्रेरणा का विषय बना हुआ है। परिवार ने न केवल शरीर दान किया, बल्कि नेत्रदान कर दो दृष्टिहीन व्यक्तियों के जीवन में रोशनी लाने का मार्ग भी प्रशस्त किया।
राजकीय सम्मान के साथ अंतिम यात्रा
कमला देवी की अंतिम यात्रा साधारण नहीं थी। लायंस क्लब के सहयोग से उनके पार्थिव शरीर को ग्राम दड़ौली से लायन डेन लाया गया। यहाँ से बैंड-बाजों और नारों के साथ एक गौरवशाली यात्रा मेडिकल कॉलेज के लिए रवाना हुई। मध्य प्रदेश सरकार की नीति के अनुसार, अब देहदान करने वाले दाताओं को राजकीय सम्मान दिया जाता है। इसी कड़ी में मेडिकल कॉलेज परिसर में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में उन्हें ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया गया। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं, लेकिन मन में इस महान कार्य के प्रति गहरा सम्मान था।
चिकित्सा छात्रों के लिए संजीवनी है यह त्याग
नीमच के वीरेंद्र कुमार सकलेचा मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों का कहना है कि एक कुशल डॉक्टर बनने के लिए मानव शरीर की आंतरिक संरचना का व्यावहारिक ज्ञान होना अनिवार्य है। नियमानुसार, हर 10 मेडिकल छात्रों पर एक डेड बॉडी की आवश्यकता होती है। कमला देवी द्वारा किया गया यह देहदान आगामी पीढ़ी के डॉक्टरों को शोध और पढ़ाई में सीधे तौर पर मदद करेगा। लायंस क्लब के अध्यक्ष सुनील शर्मा ने जानकारी दी कि क्लब के माध्यम से यह 54वां शरीर दान है, जबकि अब तक 2725 लोग नेत्रदान कर चुके हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि नीमच अब धीरे-धीरे ‘दान की नगरी’ के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।
प्रेरणा की एक नई मशाल
दड़ौली गांव से लेकर नीमच की सड़कों तक, कमला देवी की चर्चा आज हर घर में है। लोग इसे केवल एक मृत्यु नहीं, बल्कि एक नए युग की शुरुआत मान रहे हैं। देहदान का यह महासंकल्प समाज की उस सोच पर प्रहार है जो केवल रीति-रिवाजों में बंधी रहती है। कमला देवी ने सिखा दिया कि विदाई अगर सम्मानजनक हो, तो मौत भी खूबसूरत हो सकती है।
नीमच की इस वीर प्रसूता और उनके साहसी परिवार को ‘The Times of MP’ सलाम करता है।

