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किसान का विरोध: ज्ञापनों की माला पहनकर जनसुनवाई में पहुंचा अन्नदाता

Farmer

जीरन न्यूज (Jeeran News)सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते जब जूतों के सोल घिस जाते हैं और फाइलों में दबे आदेशों पर धूल जमने लगती है, तब एक आम आदमी के पास क्या विकल्प बचता है? वह या तो थक-हार कर बैठ जाता है या फिर विरोध का कोई ऐसा रचनात्मक तरीका अपनाता है, जो गहरी नींद में सोए प्रशासन को झकझोर कर रख दे। मध्य प्रदेश के नीमच जिले में मंगलवार को ठीक ऐसा ही एक वाकया देखने को मिला।

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कलेक्टर कार्यालय में आयोजित जनसुनवाई के दौरान एक किसान (Farmer) ने विरोध का जो तरीका अपनाया, उसने वहां मौजूद हर अधिकारी और आम नागरिक को हैरान कर दिया। यह घटना अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गई है और सरकारी सिस्टम की लालफीताशाही की पोल खोल रही है।

सिस्टम से हारा अन्नदाता, गले में डाली दस्तावेजों की माला

दरअसल, मंगलवार को नीमच जिले के ग्राम जीरन निवासी नरेंद्र कुमार पाटीदार कलेक्टर कार्यालय में अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। लेकिन उनके पहुंचने का अंदाज बिल्कुल अलग था। उनके गले में फूलों की माला नहीं, बल्कि उन अनगिनत आवेदनों, शिकायतों और सरकारी दस्तावेजों की माला थी, जिन्हें लेकर वे पिछले कई महीनों से अधिकारियों की चौखट पर माथा टेक रहे थे।

इस अनोखे नजारे को देखकर जनसुनवाई में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। उनकी यह वेशभूषा चीख-चीख कर यह गवाही दे रही थी कि हमारे सिस्टम में एक आम किसान (Farmer) को अपना जायज हक पाने के लिए कितनी जद्दोजहद करनी पड़ती है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर सवाल है जो फाइलों के बोझ तले दब गया है।

क्या है पूरा मामला? क्यों बंद है खेत का रास्ता?

जानकारी के मुताबिक, नरेंद्र पाटीदार की मुख्य समस्या उनकी अपनी निजी खाता भूमि तक पहुंचने के रास्ते से जुड़ी है। उनका आरोप है कि सरकारी जमीन (शासकीय भूमि) से होकर उनके खेत तक जो रास्ता जाता है, उसे कुछ दबंगों और असामाजिक तत्वों ने अवैध रूप से अवरुद्ध कर दिया है।

रास्ता बंद होने की वजह से उन्हें अपने ही खेत में जाने के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। बुवाई, जुताई से लेकर फसल की कटाई तक, हर काम बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। जरा सोचिए, जब खेत तक ट्रैक्टर और आधुनिक कृषि उपकरण ही नहीं पहुंच पाएंगे, तो कोई भी किसान (Farmer) खेती कैसे करेगा? अपने परिवार का पेट कैसे पालेगा? यही बुनियादी सवाल लेकर वह दर-दर की ठोकरें खा रहा है और न्याय की भीख मांग रहा है।

आदेश हुआ पारित, लेकिन जमीन पर पालन शून्य

इस पूरे प्रकरण का सबसे निराशाजनक पहलू यह है कि प्रशासन ने पहले ही इस किसान (Farmer) के पक्ष में फैसला सुना दिया था, लेकिन उसे धरातल पर लागू करने वाला कोई नहीं है।

नरेंद्र पाटीदार ने दस्तावेजों के हवाले से बताया कि उन्होंने रास्ता खुलवाने के लिए राजस्व विभाग में विधिवत आवेदन दिया था। तहसील जीरन के प्रकरण क्रमांक 07/1 13/24-25 के तहत 15 सितंबर 2024 को बाकायदा एक आदेश भी पारित किया गया।

इस आदेश में राजस्व निरीक्षक जीरन को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि वे मौके पर जाकर रास्ते को अतिक्रमण मुक्त कराएं और रास्ता स्वतंत्र कराएं।

लालफीताशाही और प्रशासन की अनदेखी

विडंबना देखिए कि एक सरकारी आदेश जारी होने के महीनों बाद भी वह रद्दी के कागज से ज्यादा कुछ साबित नहीं हो पाया है। राजस्व विभाग के मैदानी अमले ने आज तक उस आदेश का पालन नहीं कराया। इसी लेटलतीफी और अनदेखी ने इस अनोखे विरोध को जन्म दिया।

लगातार गुहार लगाने, तहसील कार्यालय के चक्कर काटने और बार-बार शिकायत दर्ज कराने के बाद भी जब कोई हल नहीं निकला, तो इस पीड़ित किसान (Farmer) का धैर्य पूरी तरह से जवाब दे गया। जनसुनवाई जैसे मंच का निर्माण ही इसलिए किया गया था ताकि आम जनता की समस्याओं का त्वरित निराकरण हो सके, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

कलेक्टर से लगाई अंतिम गुहार

ज्ञापनों और फाइलों की माला पहनकर आने का मुख्य उद्देश्य यही था कि आला अधिकारियों की नजर इस गंभीर लापरवाही पर पड़े। अपने गले में आवेदनों का बोझ लिए नरेंद्र पाटीदार ने कलेक्टर महोदय के सामने अपनी पीड़ा व्यक्त की।

उन्होंने मांग की है कि पूर्व में पारित 15 सितंबर 2024 के आदेश का तत्काल प्रभाव से पालन कराया जाए। साथ ही, संबंधित राजस्व निरीक्षक को सख्त हिदायत दी जाए कि वे मौके पर जाकर रास्ता खुलवाएं ताकि यह किसान (Farmer) अपनी खेती-बाड़ी सुचारू रूप से कर सके और उसे मानसिक प्रताड़ना से मुक्ति मिले।

अब देखना यह होगा कि इस हंगामे के बाद जिला प्रशासन नींद से जागता है या नहीं।


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