बदहाली की मार झेल रही पुरानी  कचहरी, चोरी हुई ऐतिहासिक तोप का अब तक नहीं मिला कोई सुराग

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नीमच । नीमच सिटी की पुरानी कचहरी  बदहाली की मार झेल रही है। पुरातत्व  महत्व की ऐतिहासिक धरोहर के कई भवन खंडहर में तब्दील होते जा रहे है।  2024 सितम्बर माह में कचहरी के मुख्य द्वार पर लगी प्राचीन दो तोपों में से एक तोप चोरी हो गई थी महीनों गुजर गए लेकिन तोप का कोई अता-पता नहीं चल पाया है। उस समय चोरी की घटना के बाद पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज खंगाले थे और जांच की थी, लेकिन सफलता नहीं मिली।यह चोरी पुरानी कचहरी परिसर की बदहाली और सुरक्षा व्यवस्था की कमी को उजागर करती है, जहाँ से चोर आसानी से एक बड़ी और भारी वस्तु चुरा ले गए…! हालांकि  पुलिस प्रशासन ने तोप की तलाश के लिए टीमें गठित की गई थीं। फिलहाल, इस मामले में कोई नई जानकारी या गिरफ्तारी की खबर सामने नहीं आई है, जिससे पता चलता है कि तोप अब भी लापता है…!  प्रशासन भी कचहरी के प्राचीन भवनों की मरम्मत के लिए प्रशासन भी कोई रुचि नहीं दिखा रहा है। ग्वालियर स्टेट के जमाने  की कचहरी को शासन द्वारा पुरात्व महत्व की संपदा घोषित किया गया है लेकिन  कचहरी के कई भवन जर्जर और खंडहर हो चुूके है। कचहरी परिसर में जिला होम गार्ड कार्यालय वर्षो से संचालित हो रहा है लेकिन कचहरी की सुरक्षा के लिहाज से लगाए गए सीसीटीवी कैमरे भी काफी समय से बंद है। कचहरी परिसर में लगाए गए हाईमास्क भी काफी समय से बंद है। 

नीमच की पुरानी कचहरी का इतिहास जीवाजी राव सिंधिया के शासनकाल से जुड़ा है। इसका निर्माण 14वीं शताब्दी में हुआ था और ग्वालियर रियासत के दौरान इसका जीर्णोद्धार जीवाजी राव सिंधिया ने कराया था। यह रियासत की एक महत्वपूर्ण संपत्ति थी, जहाँ सिंधिया राजघराने के सदस्य दशहरा उत्सव के लिए आने पर रुकते थे और यह जागीरदारों का निवास स्थान भी था।इसका निर्माण 14वीं शताब्दी में हुआ था और बाद में, ग्वालियर रियासत के दौरान जीवाजी राव सिंधिया ने इसका जीर्णोद्धार कराया।यह ग्वालियर रियासत की एक महत्वपूर्ण संपत्ति थी और राजसी वैभव का केंद्र थी।
पुरानी कचहरी को पर्यटन स्थल के रुप में विकसित  पुराना वैभव में इसको लाया था। जिसमें तोपों का रखरखाव और सुरक्षा कार्य भी शामिल थे। लेकिन वर्तमान समय मेें कचहरी भवन व परिसर में कई हिस्से खस्ताहाल हैं। वर्तमान कचहरी भवन में जिला होमगार्ड कमांडेंट कार्यालय सहित 2 स्कूल और 1 आंगनवाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं। गढ़ी के एक कमरे में सन्‌ 1900 के करीब के 13 शिलालेख लगे हैं, जो निर्माण कार्यों से संबंधित है। इसका शिल्प मूलतः राजपूत कालीन है। गुंबद मराठा स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। बदहाली की मार झेल रही पुरानी  कचहरी, चोरी हुई ऐतिहासिक तोप का अब तक नहीं मिला कोई सुराग