नीमच न्यूज़। आज पूरी दुनिया एक ऐसे बारूद के ढेर पर बैठी है, जहाँ एक छोटी सी चिंगारी सब कुछ राख कर सकती है। अमेरिका, इजरायल, ईरान, रूस और यूक्रेन जैसे देशों के बीच लगातार बढ़ता तनाव तीसरे विश्व युद्ध की आहट दे रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर सच में एक पूर्ण पैमाने का परमाणु युद्ध (Nuclear War) छिड़ जाए, तो इस धरती का क्या होगा?
विशेषज्ञों और हालिया वैज्ञानिक रिसर्च ने जो तस्वीर पेश की है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। अगर दुनिया में मौजूद 12 हजार परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होता है, तो पलक झपकते ही करीब 5 अरब इंसानों की मौत हो जाएगी और धरती ‘न्यूक्लियर विंटर’ यानी ‘परमाणु शीत’ की खौफनाक चपेट में आ जाएगी।
Nuclear War के बाद कैसी होगी दुनिया?
Nuclear War के बाद कैसी होगी दुनिया? इस स्टडी ने मानवता के भविष्य को लेकर डरावने दावे किए हैं। इस स्टडी के मुताबिक, अगर भयंकर परमाणु युद्ध (Nuclear War) होता है, तो पूरी दुनिया में सिर्फ दो ही ऐसे देश होंगे, जो इस महाविनाश के बाद भी अपना वजूद बचाए रखने में कामयाब हो सकते हैं। ये दो देश हैं— ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड।
वैज्ञानिकों का स्पष्ट मानना है कि अपनी विशेष भौगोलिक स्थिति और समुद्री प्रभाव के चलते ये दोनों देश परमाणु शीत के उस भयानक दौर में भी खेती करने और जीवन को किसी तरह आगे बढ़ाने में सक्षम रहेंगे। हालाँकि, वहाँ भी ज़िंदगी बिल्कुल आसान नहीं होगी।
100 मिलियन डिग्री का तापमान और ब्लैकआउट
वैज्ञानिकों के अनुसार, परमाणु युद्ध (Nuclear War) के दौरान होने वाले धमाकों से आग के जो विशालकाय गोले उठेंगे, उनका तापमान 100 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।
शुरुआती हमलों में ही करोड़ों लोग भाप बनकर उड़ जाएंगे। लेकिन, असली तबाही तो धमाकों के शांत होने के बाद शुरू होगी। धमाकों से उठा काला धुआं और कालिख (Soot) समताप मंडल को पूरी तरह से ढक लेगी। सूरज की रोशनी धरती तक पहुंचना बंद हो जाएगी। अमेरिका के आयोवा और यूरोप के यूक्रेन जैसे बड़े कृषि प्रधान क्षेत्र 10 सालों तक बर्फ की मोटी चादर के नीचे दबे रहेंगे।
न्यूक्लियर विंटर (परमाणु शीत) का खौफनाक असर
परमाणु युद्ध (Nuclear War) सिर्फ आग और धमाकों का नाम नहीं है, बल्कि यह धरती के पूरे इकोसिस्टम के ठप होने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसके मुख्य प्रभाव कुछ इस तरह होंगे:
सूर्य की रोशनी पर ब्रेक: शहरों और जंगलों के जलने से उठा लगभग 150 मिलियन टन धुआं आसमान में एक अभेद्य दीवार बना लेगा। पूरी दुनिया में भयानक अंधेरा छा जाएगा।
तापमान में भारी गिरावट: सूरज की किरणें न मिलने से धरती का तापमान अचानक माइनस 20 (-20°C) से माइनस 30 (-30°C) डिग्री तक गिर जाएगा। यह भयंकर ठंड हफ्तों नहीं, बल्कि एक दशक तक रह सकती है।
ओजोन परत का खात्मा: परमाणु विस्फोटों से निकलने वाले खतरनाक केमिकल ओजोन परत को छलनी कर देंगे। जब सालों बाद आसमान साफ होगा, तो सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणें सीधे धरती पर गिरेंगी, जिससे स्किन कैंसर और डीएनए म्यूटेशन जैसी भयानक बीमारियां फैलेंगी।
भुखमरी से सबसे ज्यादा मौतें: धूप न मिलने से प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया रुक जाएगी। पेड़-पौधे मर जाएंगे और ग्लोबल लेवल पर बारिश में 90 प्रतिशत तक की कमी आएगी। शुरुआती धमाकों से बचने वाले करीब 2 से 3 अरब लोग बाद में तड़प-तड़प कर भुखमरी का शिकार हो जाएंगे।
दुनिया के इन कोनों में सुलग रही है आग
यह खौफनाक रिपोर्ट ऐसे वक्त में आई है, जब वैश्विक मंच पर हालात बेहद नाजुक हैं। इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम सीमा पर है। दोनों तरफ से मिसाइल हमले तेज हो चुके हैं। दूसरी ओर, रूस और यूक्रेन का युद्ध पिछले चार सालों से थमने का नाम नहीं ले रहा है।
एशिया में चीन और ताइवान के बीच तनातनी जारी है, तो वहीं अफगानिस्तान के तालिबान ने पाकिस्तान पर हमले तेज कर दिए हैं। इन सभी देशों के पास विनाशकारी हथियार हैं, जो किसी भी वक्त एक बड़े परमाणु युद्ध (Nuclear War) का ट्रिगर दबा सकते हैं।
ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ही क्यों बचेंगे?
एक्सपर्ट्स का दावा है कि परमाणु युद्ध (Nuclear War) के बाद समुद्री प्रभाव के कारण दक्षिणी गोलार्ध में मौजूद ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का तापमान इतना नीचे नहीं गिरेगा कि वहाँ खेती पूरी तरह से असंभव हो जाए। बाहरी दुनिया से इनकी दूरी इन्हें ग्लोबल फॉलआउट से थोड़ा बचा लेगी।
हालाँकि, वहाँ बचे हुए लोगों को भी भयानक ठंड, अंधेरे, और रेडिएशन से बचने के लिए अंडरग्राउंड बंकरों में शरण लेनी पड़ेगी और एक-एक निवाले के लिए संघर्ष करना होगा।
यह समय दुनिया भर के नेताओं के लिए जागने का है। अगर कूटनीति और बातचीत के जरिए इन संघर्षों को नहीं रोका गया, तो इंसानियत अपने ही हाथों अपना नामोनिशान मिटा लेगी।
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