सिनेमा की फटी सीटें सिली और 90 रुपये की नौकरी की, आज 5000 करोड़ के स्नैक किंग हैं Chandubhai Virani Success Story

Chandubhai Virani Success Story
नीमच: बिजनेस जगत में अक्सर कहा जाता है कि बड़ा साम्राज्य खड़ा करने के लिए बड़ी डिग्री या भारी निवेश की जरूरत होती है, लेकिन Chandubhai Virani Success Story इस धारणा को पूरी तरह से गलत साबित करती है। यह कहानी एक ऐसे शख्स की है जिसने अभावों में अवसर तलाशा और महज 10वीं तक की पढ़ाई के बावजूद मैनेजमेंट के बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए मिसाल बन गया। कभी राजकोट के एक सिनेमा हॉल की कैंटीन में मेज साफ करने और पोस्टर चिपकाने वाले चंदूभाई विरानी आज 5,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाली ‘बालाजी वेफर्स‘ (Balaji Wafers) के मालिक हैं।
शुरुआती जीवन और विफलता का पहला स्वाद
Chandubhai Virani Success Story की शुरुआत 1972 में हुई, जब चंदूभाई का परिवार जामनगर के एक छोटे से गांव धुंडोराजी से राजकोट शिफ्ट हुआ। उनके पिता, पोपट विरानी एक साधारण किसान थे। उन्होंने अपनी बंजर जमीन बेचकर जो 20,000 रुपये जुटाए थे, उसे अपने तीन बेटों—मेघजीभाई, भिखूभाई और चंदूभाई को सौंप दिया ताकि वे अपना भविष्य बना सकें। भाइयों ने इस पैसे से कृषि उपकरणों और खाद का व्यवसाय शुरू किया। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था; अनुभव की कमी के कारण महज दो साल में बिजनेस पूरी तरह चौपट हो गया और पूंजी डूब गई।
90 रुपये की नौकरी और संघर्ष की पराकाष्ठा
बिजनेस डूबने के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। खाने तक के लाले पड़ गए थे। ऐसे में भाइयों ने राजकोट के ‘एस्ट्रॉन सिनेमा’ की कैंटीन में काम करना शुरू किया। Chandubhai Virani Success Story का यह सबसे कठिन दौर था। चंदूभाई को वहां प्रति माह केवल 90 रुपये मिलते थे। उनकी जिम्मेदारी सिर्फ कैंटीन संभालना नहीं थी, बल्कि वे सिनेमा के गेट संभालते थे, फिल्म के पोस्टर चिपकाते थे और दर्शकों को टॉर्च दिखाकर उनकी सीट तक छोड़ते थे।
हैरानी की बात यह है कि कभी-कभी वे फटी हुई सिनेमा सीटों की मरम्मत भी खुद ही करते थे। गरीबी का आलम यह था कि एक बार वे महज 50 रुपये का किराया नहीं चुका पाए, जिसके कारण उन्हें रात के अंधेरे में अपना घर खाली करना पड़ा था। लेकिन इन कठिनाइयों ने उनके भीतर के उद्यमी को मरने नहीं दिया।
कैसे सूझा चिप्स बेचने का आइडिया?
सिनेमा हॉल की कैंटीन में काम करते हुए चंदूभाई का अवलोकन (Observation) बहुत तेज था। उन्होंने गौर किया कि फिल्म देखने आने वाले लोग स्नैक्स की मांग करते हैं, और उस समय बाजार में उपलब्ध चिप्स की क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं थी। यहीं से Chandubhai Virani Success Story ने एक नया मोड़ लिया।
1982 में उन्होंने रिस्क लिया और अपने घर के पीछे एक छोटा सा शेड बनाया। मात्र 10,000 रुपये के शुरुआती निवेश के साथ उन्होंने घर पर ही आलू के वेफर्स बनाना शुरू किया। उनकी पत्नी और भाइयों ने इस काम में उनका पूरा साथ दिया। उनके चिप्स अपनी शुद्धता और बेहतरीन स्वाद के कारण जल्द ही सिनेमा हॉल के बाहर भी प्रसिद्ध हो गए।
हनुमान जी का आशीर्वाद और ‘बालाजी’ का उदय
1992 में इस छोटे से गृह उद्योग को एक ब्रांड का नाम मिला। विरानी भाइयों ने अपने घर के मंदिर में रखी भगवान हनुमान (बालाजी) की मूर्ति से प्रेरित होकर कंपनी का नाम ‘बालाजी वेफर्स प्राइवेट लिमिटेड’ रखा। Chandubhai Virani Success Story में असली उछाल 1989 में आया, जब उन्होंने साहस दिखाते हुए बैंक से 50 लाख रुपये का लोन लिया और राजकोट के अजी GIDC में गुजरात की सबसे बड़ी और आधुनिक आलू वेफर यूनिट स्थापित की।
आज का विशाल बिजनेस मॉडल और आंकड़े
आज बालाजी वेफर्स देश की तीसरी सबसे बड़ी स्नैक कंपनी बन चुकी है और दिग्गजों को कड़ी टक्कर दे रही है। कंपनी के आंकड़े किसी को भी हैरान कर सकते हैं:
टर्नओवर: कंपनी का सालाना कारोबार 5,000 करोड़ रुपये को पार कर चुका है।
उत्पादन क्षमता: बालाजी की फैक्ट्रियों में हर घंटे 3,400 किलोग्राम चिप्स तैयार होते हैं।
कच्चा माल: कंपनी सालाना 65 लाख किलोग्राम आलू और 100 लाख किलोग्राम नमकीन का प्रसंस्करण करती है।
मार्केट शेयर: भारत के विशाल स्नैक मार्केट में बालाजी की 12% हिस्सेदारी है।
नेटवर्क: आज कंपनी की चार बड़ी अत्याधुनिक फैक्ट्रियां हैं जो हजारों लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार दे रही हैं।

