सिनेमा की फटी सीटें सिली और 90 रुपये की नौकरी की, आज 5000 करोड़ के स्नैक किंग हैं Chandubhai Virani Success Story
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
10 फ़रवरी 2026, (अपडेटेड 10 फ़रवरी 2026, 10:24 पूर्वाह्न IST)

नीमच: बिजनेस जगत में अक्सर कहा जाता है कि बड़ा साम्राज्य खड़ा करने के लिए बड़ी डिग्री या भारी निवेश की जरूरत होती है, लेकिन Chandubhai Virani Success Story इस धारणा को पूरी तरह से गलत साबित करती है। यह कहानी एक ऐसे शख्स की है जिसने अभावों में अवसर तलाशा और महज 10वीं तक की पढ़ाई के बावजूद मैनेजमेंट के बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए मिसाल बन गया। कभी राजकोट के एक सिनेमा हॉल की कैंटीन में मेज साफ करने और पोस्टर चिपकाने वाले चंदूभाई विरानी आज 5,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाली ‘बालाजी वेफर्स‘ (Balaji Wafers) के मालिक हैं।

शुरुआती जीवन और विफलता का पहला स्वाद

Chandubhai Virani Success Story की शुरुआत 1972 में हुई, जब चंदूभाई का परिवार जामनगर के एक छोटे से गांव धुंडोराजी से राजकोट शिफ्ट हुआ। उनके पिता, पोपट विरानी एक साधारण किसान थे। उन्होंने अपनी बंजर जमीन बेचकर जो 20,000 रुपये जुटाए थे, उसे अपने तीन बेटों—मेघजीभाई, भिखूभाई और चंदूभाई को सौंप दिया ताकि वे अपना भविष्य बना सकें। भाइयों ने इस पैसे से कृषि उपकरणों और खाद का व्यवसाय शुरू किया। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था; अनुभव की कमी के कारण महज दो साल में बिजनेस पूरी तरह चौपट हो गया और पूंजी डूब गई।

90 रुपये की नौकरी और संघर्ष की पराकाष्ठा

बिजनेस डूबने के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। खाने तक के लाले पड़ गए थे। ऐसे में भाइयों ने राजकोट के ‘एस्ट्रॉन सिनेमा’ की कैंटीन में काम करना शुरू किया। Chandubhai Virani Success Story का यह सबसे कठिन दौर था। चंदूभाई को वहां प्रति माह केवल 90 रुपये मिलते थे। उनकी जिम्मेदारी सिर्फ कैंटीन संभालना नहीं थी, बल्कि वे सिनेमा के गेट संभालते थे, फिल्म के पोस्टर चिपकाते थे और दर्शकों को टॉर्च दिखाकर उनकी सीट तक छोड़ते थे।

हैरानी की बात यह है कि कभी-कभी वे फटी हुई सिनेमा सीटों की मरम्मत भी खुद ही करते थे। गरीबी का आलम यह था कि एक बार वे महज 50 रुपये का किराया नहीं चुका पाए, जिसके कारण उन्हें रात के अंधेरे में अपना घर खाली करना पड़ा था। लेकिन इन कठिनाइयों ने उनके भीतर के उद्यमी को मरने नहीं दिया।

कैसे सूझा चिप्स बेचने का आइडिया?

सिनेमा हॉल की कैंटीन में काम करते हुए चंदूभाई का अवलोकन (Observation) बहुत तेज था। उन्होंने गौर किया कि फिल्म देखने आने वाले लोग स्नैक्स की मांग करते हैं, और उस समय बाजार में उपलब्ध चिप्स की क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं थी। यहीं से Chandubhai Virani Success Story ने एक नया मोड़ लिया।

1982 में उन्होंने रिस्क लिया और अपने घर के पीछे एक छोटा सा शेड बनाया। मात्र 10,000 रुपये के शुरुआती निवेश के साथ उन्होंने घर पर ही आलू के वेफर्स बनाना शुरू किया। उनकी पत्नी और भाइयों ने इस काम में उनका पूरा साथ दिया। उनके चिप्स अपनी शुद्धता और बेहतरीन स्वाद के कारण जल्द ही सिनेमा हॉल के बाहर भी प्रसिद्ध हो गए।

हनुमान जी का आशीर्वाद और ‘बालाजी’ का उदय

1992 में इस छोटे से गृह उद्योग को एक ब्रांड का नाम मिला। विरानी भाइयों ने अपने घर के मंदिर में रखी भगवान हनुमान (बालाजी) की मूर्ति से प्रेरित होकर कंपनी का नाम ‘बालाजी वेफर्स प्राइवेट लिमिटेड’ रखा। Chandubhai Virani Success Story में असली उछाल 1989 में आया, जब उन्होंने साहस दिखाते हुए बैंक से 50 लाख रुपये का लोन लिया और राजकोट के अजी GIDC में गुजरात की सबसे बड़ी और आधुनिक आलू वेफर यूनिट स्थापित की।

आज का विशाल बिजनेस मॉडल और आंकड़े

आज बालाजी वेफर्स देश की तीसरी सबसे बड़ी स्नैक कंपनी बन चुकी है और दिग्गजों को कड़ी टक्कर दे रही है। कंपनी के आंकड़े किसी को भी हैरान कर सकते हैं:

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Aakash Sharma
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आकाश शर्मा मध्यप्रदेश के नीमच क्षेत्र में सक्रिय पत्रकार और द टाइम्स ऑफ MP के संपादक हैं। उन्हें प्रिंट मीडिया में 12 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव है। लंबे समय से स्थानीय एवं जनसरोकार से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग, समाचार संपादन और समाचार प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उन्होंने स्थानीय पत्रकारिता में व्यापक अनुभव हासिल किया है।द टाइम्स ऑफ MP के माध्यम से आकाश शर्मा नीमच, मंदसौर और आसपास के क्षेत्रों से जुड़ी महत्वपूर्ण खबरों को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। उनकी कवरेज में स्थानीय प्रशासन, पुलिस एवं कानून-व्यवस्था, जनसमस्याएं, नागरिक सुविधाएं, राजनीति, सामाजिक गतिविधियां, शिक्षा, कृषि, व्यापार और अन्य जनहित से जुड़े विषय शामिल हैं।उनकी संपादकीय कार्यशैली में तथ्यपरक रिपोर्टिंग, स्रोत-आधारित जानकारी, निष्पक्ष प्रस्तुति और जिम्मेदार पत्रकारिता को प्राथमिकता दी जाती है। संवेदनशील और अपराध से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग में आरोप और प्रमाणित तथ्य के बीच अंतर बनाए रखने तथा उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर खबर प्रस्तुत करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।पत्रकारिता के साथ आकाश शर्मा पिछले 4 वर्षों से पैरा लीगल वॉलंटियर (PLV) के रूप में भी कार्य कर रहे हैं। इस भूमिका में वे कानूनी जागरूकता और जनहित से जुड़े कार्यों से जुड़े रहे हैं। इसके साथ ही वे इंटरनेशनल ह्यूमन सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशन में जिला उपाध्यक्ष (District Vice President) के दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।अनुभव 12 वर्ष — प्रिंट मीडिया एवं पत्रकारिता का अनुभव 4 वर्ष — पैरा लीगल वॉलंटियर (PLV) के रूप में अनुभव संपादक — द टाइम्स ऑफ MP जिला उपाध्यक्ष — इंटरनेशनल ह्यूमन सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशनआकाश शर्मा का उद्देश्य स्थानीय स्तर की महत्वपूर्ण सूचनाओं को विश्वसनीय, स्पष्ट, तथ्यपरक और जिम्मेदार पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाना तथा आम नागरिकों से जुड़े मुद्दों को प्रभावी मंच प्रदान करना है।विशेषज्ञता: स्थानीय पत्रकारिता | प्रिंट मीडिया | समाचार संपादन | डिजिटल पत्रकारिता | स्थानीय समाचार रिपोर्टिंग | जनहित के मुद्दे | कानूनी जागरूकता |

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