BREAKING NEWS: 8 यूरोपीय देशों पर ट्रम्प का बड़ा प्रहार: ग्रीनलैंड विवाद पर 10% टैरिफ, जून से 25% की सख्त चेतावनी

Trump Greenland Tariffs
वॉशिंगटन डीसी (Trump Greenland Tariffs): दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर अपनी ‘टैरिफ डिप्लोमेसी’ से वैश्विक अर्थव्यवस्था में हड़कंप मचा दिया है। ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे का विरोध करने वाले यूरोप के 8 प्रमुख देशों पर 10% टैरिफ लगाने का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। यह नया आयात शुल्क 1 फरवरी 2026 से प्रभावी होगा। ट्रम्प यहीं नहीं रुके; उन्होंने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि जून तक ग्रीनलैंड को लेकर कोई ठोस समझौता नहीं हुआ, तो इस टैरिफ को बढ़ाकर सीधे 25% कर दिया जाएगा।
‘Trump Greenland Tariffs’ का दायरा और समयसीमा
ट्रम्प ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट Trump Greenland Tariffs के जरिए साफ कर दिया है कि इस आर्थिक कार्रवाई की जद में डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड और फिनलैंड शामिल हैं। शनिवार को व्हाइट हाउस की बैठक के बाद ट्रम्प ने स्पष्ट किया कि अमेरिका अब ग्रीनलैंड की “पूर्ण और पूरी खरीद” (Full and Complete Purchase) से कम पर कुछ भी स्वीकार नहीं करेगा। हालांकि अभी यह खुलासा नहीं हुआ है कि यह टैरिफ किन विशेष उत्पादों पर लगेगा, लेकिन यूरोपीय बाजारों में इसे लेकर बेचैनी साफ देखी जा सकती है।
‘गोल्डन डोम’ प्रोजेक्ट: क्यों ग्रीनलैंड के पीछे पड़े हैं ट्रम्प?
डोनाल्ड ट्रम्प के लिए ग्रीनलैंड केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे बड़ा कवच है। ट्रम्प ने इसे ‘गोल्डन डोम’ (Golden Dome) नामक महात्वाकांक्षी मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट के लिए अनिवार्य बताया है। यह प्रोजेक्ट इजराइल के ‘आयरन डोम’ की तर्ज पर बनाया जा रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य चीन और रूस जैसी महाशक्तियों से आने वाली मिसाइलों को हवा में ही ध्वस्त करना है।
ट्रम्प का तर्क है कि यदि अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर पूर्ण नियंत्रण हासिल नहीं किया, तो रूस या चीन वहां अपना सैन्य आधार बढ़ा सकते हैं, जो भविष्य में अमेरिका के लिए अस्तित्व का खतरा बन जाएगा। इसी खतरे को देखते हुए Trump Greenland Tariffs का इस्तेमाल एक रणनीतिक दबाव के तौर पर किया जा रहा है।
कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और यूरोप का विरोध
अमेरिकी राष्ट्रपति के इस आक्रामक रुख का कनाडा और डेनमार्क ने कड़ा विरोध किया है। कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने स्पष्ट कहा, “ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला वहां के लोग और डेनमार्क करेंगे, न कि वॉशिंगटन।” नाटो (NATO) सदस्य होने के नाते कनाडा ने अमेरिका को उसके अंतरराष्ट्रीय वादों की याद दिलाई है। वहीं, यूरोपीय देशों ने एकजुटता दिखाते हुए ग्रीनलैंड में एक निगरानी मिशन के तहत अपने सैनिक भेजने शुरू कर दिए हैं। जर्मनी और स्वीडन ने पहले ही अपने सैन्य विशेषज्ञों की छोटी टीमें वहां तैनात कर दी हैं।
अमेरिकी संसद में खींचतान और ‘वर्किंग ग्रुप’ का गठन
ग्रीनलैंड के मुद्दे पर खुद अमेरिका के भीतर भी राय बंटी हुई है। एक तरफ जहां डेमोक्रेट सीनेटर क्रिस कून्स के नेतृत्व में 11 सांसदों का दल ग्रीनलैंड के स्थानीय नेताओं से बातचीत कर तनाव कम करने की कोशिश कर रहा है, वहीं रिपब्लिकन खेमा ग्रीनलैंड के सीधे विलय के लिए संसद में बिल लाने की तैयारी में है। व्हाइट हाउस में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ हुई बैठकों के बाद अब एक ‘संयुक्त वर्किंग ग्रुप’ बनाने पर सहमति बनी है, जो आने वाले हफ्तों में इस विवाद का समाधान तलाशने की कोशिश करेगा।
2026 में ट्रम्प की टैरिफ नीति का प्रभाव
ट्रम्प अपने दूसरे कार्यकाल में टैरिफ को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। Trump Greenland Tariffs तो महज एक उदाहरण है; इससे पहले वे भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ और ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर भारी जुर्मान लगा चुके हैं। ट्रम्प का मानना है कि केवल ‘लीज’ या ‘संधि’ से अमेरिका सुरक्षित नहीं रहेगा, उसे ग्रीनलैंड का पूर्ण स्वामित्व चाहिए।
आर्कटिक क्षेत्र में पिघलती बर्फ के कारण खुल रहे नए व्यापारिक मार्ग और वहां मौजूद दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Elements) का भंडार इस पूरी जंग का असली कारण है। वर्तमान में इन खनिजों पर चीन का एकछत्र राज है, जिसे ट्रम्प किसी भी कीमत पर खत्म करना चाहते हैं।

