वाशिंगटन/तेहरान: ट्रम्प ईरान संघर्ष (Trump Iran Conflict) के कारण मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) की धरती इस समय एक ऐसे बारूद के ढेर पर बैठी है, जिसमें किसी भी वक्त एक भयंकर धमाका हो सकता है। वैश्विक राजनीति में पिछले कुछ दिनों से ट्रम्प ईरान संघर्ष (Trump Iran Conflict) सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा बन चुका है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अपने तेवर इतने कड़े कर लिए हैं कि अब किसी भी कूटनीतिक वापसी की गुंजाइश लगभग खत्म होती नज़र आ रही है। मियामी बीच पर आयोजित एक भव्य जनसभा के दौरान ट्रम्प ने न केवल ईरान की चरमराती सैन्य क्षमता पर तीखा प्रहार किया, बल्कि अमेरिकी रक्षा विभाग (Pentagon) की उस खुफिया रणनीति का भी खुलासा कर दिया, जिसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है।
यह संघर्ष अब महज़ धमकियों तक सीमित नहीं है, बल्कि ज़मीनी स्तर पर एक विनाशकारी रूप ले चुका है।
3,554 ठिकानों पर अचूक वार: अमेरिका का ‘डेथ ब्लो’ मास्टरप्लान
इस ताज़ा ट्रम्प ईरान संघर्ष (Trump Iran Conflict) में जो सबसे खौफनाक आंकड़ा सामने आया है, वह है ‘3,554’। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मंच से स्पष्ट शब्दों में पूरी दुनिया को बताया कि अमेरिकी रडार सिस्टम, सैटेलाइट्स और खुफिया एजेंसियों ने ईरान के अंदर 3,554 नए और बेहद अहम लक्ष्यों (Targets) की सटीक पहचान कर ली है।
इन ठिकानों में ईरान के खुफिया सैन्य बेस, अंडरग्राउंड मिसाइल लॉन्च पैड, कमांड कंट्रोल सेंटर और संभवतः उनके परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अहम इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं।
ट्रम्प ने बेहद सख्त लहज़े में संकल्प लिया है कि बहुत जल्द इन सभी 3,554 सामरिक ठिकानों पर आसमान से ताबड़तोड़ बमबारी की जाएगी। अमेरिकी राष्ट्रपति के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों से लगातार हो रहे अमेरिकी हवाई हमलों से ईरान की सैन्य शक्ति की रीढ़ पहले ही टूट चुकी है।
उनका एयर डिफेंस सिस्टम पूरी तरह से पंगु हो चुका है, और अब अमेरिका का अगला कदम ईरान की बची-खुची सैन्य ताक़त को हमेशा के लिए ज़मींदोज़ करना होगा।
‘स्ट्रेट ऑफ ट्रम्प’ का मज़ाक और इसके पीछे का मनोवैज्ञानिक युद्ध
अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विशेषकर दुनिया की कुल तेल सप्लाई चेन के लगभग 20% हिस्से के लिए ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को विश्व की सबसे अहम समुद्री चौकी माना जाता है। मियामी बीच के अपने भाषण में ट्रम्प ने अपने चिर-परिचित आक्रामक और व्यंग्यात्मक अंदाज़ में इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते को मज़ाक-मज़ाक में ‘स्ट्रेट ऑफ ट्रम्प’ कह डाला।
यूं तो कुछ ही सेकंड बाद उन्होंने हंसते हुए इसे अपनी ‘जुबान फिसलना’ करार दिया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इस मज़ाक के बहुत गहरे मायने निकाले जा रहे हैं। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह सीधे तौर पर एक मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा है।
यह दर्शाता है कि इस ट्रम्प ईरान संघर्ष (Trump Iran Conflict) में अमेरिका का आत्मविश्वास किस चरम पर है और वह इस पूरे अहम समुद्री क्षेत्र पर अपना पूर्ण और एकतरफा वर्चस्व स्थापित करने का मन बना चुका है।
कानूनी दांव-पेंच: इसे ‘युद्ध’ के बजाय ‘सैन्य संघर्ष’ क्यों कहा जा रहा है?
अगर हम इस पूरे घटनाक्रम के संवैधानिक और कानूनी पहलुओं को बारीकी से डिकोड करें, तो पता चलता है कि ट्रम्प प्रशासन बेहद चतुराई से अपने कदम आगे बढ़ा रहा है। अमेरिका के संविधान के तहत, आधिकारिक तौर पर किसी भी संप्रभु देश के खिलाफ पूर्ण ‘युद्ध’ (War) की घोषणा करने के लिए अमेरिकी संसद (Congress) की स्पष्ट मंज़ूरी अनिवार्य होती है।
संसद की इस लंबी, जटिल और राजनीतिक गतिरोध वाली प्रक्रिया से बचने के लिए ही व्हाइट हाउस ने इस पूरे अभियान को ‘युद्ध’ के बजाय एक ‘सैन्य संघर्ष’ (Military Conflict) का नाम दिया है। राष्ट्रपति के पास कार्यकारी शक्तियों (Executive Powers) के तहत सैन्य संघर्ष का आदेश देने का अधिकार होता है।
इस कानूनी लूपहोल का इस्तेमाल करते हुए, बिना कांग्रेस की मंज़ूरी के अंजाम दिया जाने वाला यह अब तक का सबसे विशाल और विनाशकारी अमेरिकी सैन्य अभियान बन गया है।
मार्को रुबियो का अल्टीमेटम: “महीनों नहीं, कुछ हफ्तों में होगा पूरा खात्मा”
फ्रांस में संपन्न हुई जी-7 (G7) देशों की उच्च-स्तरीय बैठक के बाद, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने विश्व मंच से जो बातें साझा कीं, वह इस ट्रम्प ईरान संघर्ष (Trump Iran Conflict) की गंभीरता को और बढ़ा देती हैं।
रुबियो ने इस पूरे ऑपरेशन की समय-सीमा तय करते हुए बिल्कुल साफ कर दिया कि यह सैन्य कार्रवाई इराक या अफगानिस्तान की तरह सालों या महीनों तक नहीं खिंचेगी, बल्कि कुछ ही हफ्तों में इसका फाइनल रिज़ल्ट दुनिया के सामने होगा।
अमेरिका के लिए सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि उसे ईरान की धरती पर अपनी जमीनी सेना उतारने का जोखिम नहीं उठाना पड़ेगा। रुबियो ने खुलासा किया कि अमेरिका ने ईरान को 15 बिंदुओं वाला एक विस्तृत शांति प्रस्ताव भी भेजा था, लेकिन तेहरान की ओर से छाई हुई रहस्यमयी चुप्पी ने अमेरिका को आक्रामक कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है।
समंदर में बिछी अभेद्य बिसात और एलन मस्क की कूटनीति में ‘मिस्ट्री एंट्री‘
अमेरिका केवल हवा से ही नहीं, बल्कि समंदर में भी ईरान की पूर्ण घेराबंदी कर चुका है। पेंटागन के सूत्रों के हवाले से पक्की खबरें हैं कि ‘USS जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश’ (USS George H.W. Bush) एयरक्राफ्ट कैरियर को मिडिल ईस्ट (CENTCOM क्षेत्र) में तैनात करने की तैयारी हो चुकी है। वहां पहले से मौजूद दो विशाल अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर के साथ मिलकर यह पोत ईरान के बचने के सभी समुद्री रास्ते बंद कर देगा।
इसी बीच, कूटनीतिक मोर्चे पर एक बेहद हैरान करने वाली घटना घटी है। हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच इस ट्रम्प ईरान संघर्ष (Trump Iran Conflict) और वैश्विक सुरक्षा को लेकर एक लंबी फोन कॉल हुई।
लेकिन पूरी दुनिया तब हैरान रह गई जब पता चला कि इस अति-संवेदनशील और गोपनीय बातचीत में दुनिया के सबसे अमीर प्राइवेट कारोबारी इलॉन मस्क (Elon Musk) भी मौजूद थे! दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच एक सैन्य संकट पर हो रही चर्चा में एक उद्योगपति की मौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
व्हाइट हाउस ने मस्क की भूमिका पर कोई सीधा जवाब तो नहीं दिया, लेकिन इसे ‘सकारात्मक’ बताकर भविष्य की नई कूटनीति का साफ संकेत दे दिया है।
कुल मिलाकर, आने वाले कुछ हफ्ते मिडिल ईस्ट और पूरी दुनिया के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं।
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