धानुका का ‘काला साम्राज्य’—मजदूर का खून और ‘झूठी दानवीरता’ की ढाल! क्या प्रशासन धनबल के दबाव में है?

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नीमच: धानुका समूह अब मध्य प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्र में मानव जीवन की उपेक्षा और बड़े आर्थिक अपराधों का एक जीता-जागता प्रतीक बन चुका है। हालिया घटनाक्रम में मजदूर राधेश्याम गंभीर रूप से घायल हुआ है, जो इस बात का सीधा प्रमाण है कि समूह के लिए मजदूर की जान, सैकड़ों करोड़ रुपये के मुनाफ़े के सामने, कोई मायने नहीं रखती। धानुका के खिलाफ लगे अनगिनत आरोपों से यह स्पष्ट होता है कि इसका असली मकसद मजदूरों का शोषण और अपनी ‘झूठी दानवीर कर्ण’ की छवि के पीछे अपने दागदार कृत्यों को छिपाना है।

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समूह का दागदार इतिहास—सैकड़ों करोड़ का फर्जीवाड़ा और आयकर छापे

धानुका समूह की नीयत पर सवाल उसके अतीत से ही उठते रहे हैं।

  • वित्तीय कलंक: समूह का वित्तीय इतिहास गंभीर रूप से दागदार रहा है। समूह पर पूर्व में सैकड़ों करोड़ रुपये की संदिग्ध वित्तीय अनियमितताओं और फर्जी ट्रांजेक्शन के आरोप लगे थे, जिसके चलते इसके ठिकानों पर आयकर विभाग के छापे पड़ चुके हैं। यह तथ्य समूह की नीयत पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
  • झूठी छवि का नकाब: समूह ने अपनी दानवीरता का जो कृत्रिम दिखावा किया, उसका असली उद्देश्य सैकड़ों करोड़ की वित्तीय धांधली और मजदूरों की जान से जुड़े गंभीर अपराधों से जनता और प्रशासन का ध्यान हटाना था। अब यह नकाब पूरी तरह उतर चुका है।

सुरक्षा नहीं, जानलेवा लापरवाही—मजदूरों की मौत का सिलसिला

मजदूर राधेश्याम का घायल होना कोई हादसा नहीं, बल्कि धानुका प्रबंधन की जानबूझकर की गई आपराधिक उपेक्षा है।

  • मौतों का रिकॉर्ड: धानुका फैक्ट्री का इतिहास कई मजदूरों की दर्दनाक मौतों का गवाह है। बार-बार जान जाने के बावजूद सुरक्षा में कोई सुधार न करना, यह दर्शाता है कि प्रबंधन कानून और मानव जीवन की परवाह नहीं करता
  • ज़हरीला हमला: समूह की यूनिट से लगातार निकल रहा ज़हरीला धुआँ और असहनीय बदबू आसपास के हजारों लोगों के स्वास्थ्य पर सीधा हमला है, जिसकी अनदेखी पर्यावरण कानूनों को रौंदने के समान है।

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