Trump Gold Card Lawsuit: अमेरिका में ‘वीजा वॉर’, 20 राज्यों ने ट्रम्प के ₹9 करोड़ वाले नियम के खिलाफ कोर्ट में खोला मोर्चा
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
13 दिसम्बर 2025, (अपडेटेड 13 दिसम्बर 2025, 10:58 पूर्वाह्न IST)

वॉशिंगटन डीसी: Trump Gold Card Lawsuit : अमेरिका में आव्रजन (Immigration) नीतियों को लेकर एक बार फिर महासंग्राम छिड़ गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा पेश किए गए नए ‘ट्रम्प गोल्ड कार्ड’ और वीजा फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी के खिलाफ अमेरिका के 20 बड़े राज्य एकजुट हो गए हैं। इन राज्यों ने संघीय अदालत में Trump Gold Card Lawsuit दायर करते हुए प्रशासन के फैसले को गैर-कानूनी और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताया है।

मामला केवल फीस बढ़ोतरी का नहीं, बल्कि अमेरिका के भविष्य का है। कैलिफोर्निया के नेतृत्व में न्यूयॉर्क, इलिनॉय, वॉशिंगटन और मैसाचुसेट्स जैसे प्रभावशाली राज्यों का तर्क है कि वीजा के लिए 1 मिलियन डॉलर (करीब 9 करोड़ रुपए) की फीस वसूलना असल में टैलेंट के लिए दरवाजे बंद करने जैसा है।

“डॉक्टर और शिक्षक नहीं खरीद पाएंगे 9 करोड़ का वीजा”

Trump Gold Card Lawsuit का मुख्य आधार यह है कि नई नीतियां अमेरिका के पब्लिक सेक्टर को तबाह कर देंगी। कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोंटा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में तीखा हमला बोलते हुए कहा, “यह वीजा डॉक्टर, नर्स, इंजीनियर, वैज्ञानिक और शिक्षक जैसे उन प्रोफेशनल्स के लिए है जो देश को चलाते हैं। एक स्कूल टीचर या ग्रामीण इलाके में सेवा देने वाला डॉक्टर 9 करोड़ रुपए की फीस कैसे भरेगा?”

Trump Gold Card Lawsuit राज्यों ने कोर्ट में दलील दी है कि एच-1बी (H-1B) और अन्य वर्क वीजा की फीस पहले 1,000 से 7,500 डॉलर (लगभग 1 से 6 लाख रुपए) के बीच थी। इसे अचानक बढ़ाकर करोड़ों में कर देना न केवल अमानवीय है, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम (APA) का सीधा उल्लंघन है। राज्यों का कहना है कि संसद (Congress) की मंजूरी के बिना इतना बड़ा बदलाव करना राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर मंडराता संकट

Trump Gold Card Lawsuit में प्रस्तुत किए गए आंकड़े डराने वाले हैं। अमेरिकी शिक्षा विभाग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि वर्तमान में अमेरिका के 75% डिस्ट्रिक्ट स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। साइंस, गणित और स्पेशल एजुकेशन के लिए विदेशी शिक्षकों पर निर्भरता बहुत ज्यादा है।

वहीं, स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति और भी गंभीर है। आंकड़ों के मुताबिक:

  • 2024 में लगभग 17,000 वीजा विदेशी डॉक्टरों और नर्सों को जारी किए गए थे।

  • अनुमान है कि साल 2036 तक अमेरिका में 86,000 डॉक्टरों की कमी हो जाएगी।

  • ग्रामीण और गरीब इलाकों के अस्पतालों में पहले से ही मेडिकल स्टाफ का टोटा है।

राज्यों का कहना है कि अगर सरकारी और गैर-लाभकारी संस्थानों (Non-profits) से वीज़ा छूट छीन ली गई और इतनी भारी फीस थोपी गई, तो अस्पताल और यूनिवर्सिटीज बंद होने की कगार पर आ जाएंगे। वे या तो सेवाएं कम करेंगे या अन्य जनहित योजनाओं का बजट काटेंगे।

व्हाइट हाउस की दलील: “अमेरिका फर्स्ट”

दूसरी ओर, ट्रम्प प्रशासन अपने फैसले पर अडिग है। व्हाइट हाउस का कहना है कि यह ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे का हिस्सा है। सरकार का तर्क है कि भारी-भरकम फीस वीजा प्रोग्राम के दुरुपयोग को रोकेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि केवल वही लोग आएं जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बड़ा निवेश कर सकें।

ट्रम्प प्रशासन का मानना है कि इससे अमेरिकी नागरिकों के वेतन और नौकरियों की रक्षा होगी। साथ ही, वीजा आवेदकों के पिछले 5 साल के सोशल मीडिया रिकॉर्ड की जांच को अनिवार्य कर सुरक्षा को और कड़ा किया गया है।

क्या है ट्रम्प गोल्ड कार्ड और इसके प्रकार ?

Trump Gold Card Lawsuit

इस विवाद की जड़ में ट्रम्प द्वारा लॉन्च किए गए नए प्रीमियम वीजा कार्ड हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प ने इसे अमीर और अल्ट्रा-रिच टैलेंट को आकर्षित करने का जरिया बताया है।

भारत जैसे देशों पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीति का सबसे बुरा असर भारत और चीन जैसे देशों के प्रोफेशनल्स पर पड़ेगा। अमेरिका में काम करने वाले विदेशी प्रोफेशनल्स में 70% से ज्यादा भारतीय हैं। आलोचकों का कहना है कि टैलेंट अब अमेरिका के बजाय कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या यूरोप का रुख करेगा, जिससे सिलिकॉन वैली और अमेरिकी रिसर्च सेक्टर को long-term नुकसान होगा।

Trump Gold Card Lawsuit अब अमेरिकी न्यायपालिका के पाले में है। देखना होगा कि क्या कोर्ट इस भारी-भरकम फीस पर रोक लगाता है या फिर अमेरिका आव्रजन के इतिहास में सबसे महंगे दौर में प्रवेश करेगा।


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Aakash Sharma
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