Mandsaur Medical Negligence : ‘इलाज’ बना काल? डॉ. ऋतु शर्मा पर लापरवाही के आरोप, महिला और दो नवजातों की मौत से मचा हड़कंप

Mandsaur Medical Negligence

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मन्दसौर (Mandsaur Medical Negligence): चिकित्सा पेशे को धरती का भगवान कहा जाता है, लेकिन जब वही रक्षक भक्षक बन जाए या उसकी लापरवाही किसी हंसते-खेलते परिवार को तबाह कर दे, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। मध्य प्रदेश के मन्दसौर जिले से एक ऐसा ही रूह कंपा देने वाला मामला सामने आया है, जहाँ एक डॉक्टर की कथित लापरवाही ने न केवल एक माँ की जान ले ली, बल्कि दुनिया देखने से पहले ही दो मासूम नवजातों की सांसें भी छीन लीं। यह Mandsaur Medical Negligence का एक ऐसा काला अध्याय है, जिसने सरकारी और निजी चिकित्सा तंत्र की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है।

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क्या है पूरा मामला? 

मृतका पूनम के परिजनों ने मन्दसौर जिला अस्पताल में पदस्थ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. ऋतु शर्मा पर इलाज में भारी कोताही बरतने के आरोप लगाए हैं। परिजनों का कहना है कि पिछले 8 महीनों से पूनम का नियमित चेकअप डॉ. शर्मा के पास ही चल रहा था। सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन 16 दिसंबर 2025 के बाद जो हुआ, वह किसी भयावह सपने से कम नहीं था। 16 दिसंबर को हुई सोनोग्राफी रिपोर्ट में दोनों बच्चे पूरी तरह सुरक्षित और जीवित थे। लेकिन नियति और ‘डॉक्टर की बेरुखी’ को कुछ और ही मंजूर था।

Mandsaur Medical Negligence: जब चेतावनी को किया गया नजरअंदाज

पूनम के पति ने जनसुनवाई में शिकायत करते हुए बताया कि सोनोग्राफी के पांच दिन बाद पूनम की तबीयत बिगड़ने लगी। जब वे डॉ. शर्मा के पास पहुँचे, तो आरोप है कि बिना किसी गहन जांच या गंभीरता दिखाए, डॉक्टर ने केवल 6 दिन की दवाएं देकर उन्हें घर वापस भेज दिया। यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या एक गर्भवती महिला की बिगड़ती हालत को भांपने में डॉक्टर विफल रहीं या जानबूझकर इसे हल्के में लिया गया? यह Mandsaur Medical Negligence का शुरुआती बिंदु बना।

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सरकारी अस्पताल में 3 घंटे की ‘प्रताड़ना’

हालात तब और बदतर हो गए जब 24 दिसंबर को सोनोग्राफी में बच्चों की धड़कन बंद पाई गई। डॉ. शर्मा ने खुद जिला अस्पताल में डिलीवरी की सलाह दी, लेकिन जब पीड़ित परिवार वहाँ पहुँचा, तो संवेदनहीनता की हद पार हो गई। आरोप है कि ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ और डॉक्टरों ने यह कहकर इलाज करने से मना कर दिया कि “जब पहले डॉ. शर्मा इलाज कर रही थीं, तो अब यहाँ क्यों आए?”

लगभग तीन घंटे तक तड़पती महिला को इलाज के लिए भटकना पड़ा। परिजनों का आरोप है कि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और अंततः मजबूरन डिस्चार्ज लेकर निजी अस्पताल भागना पड़ा। सरकारी व्यवस्था की यह कार्यप्रणाली भी Mandsaur Medical Negligence के दायरे में आती है, जहाँ मरीज की जान से ज्यादा कागजी प्रक्रियाओं और ‘अहम’ को तवज्जो दी गई।

उदयपुर में ऑपरेशन और 30 दिसंबर का काला दिन

निजी अस्पतालों (पाटीदार अस्पताल) में भी स्थिति काबू से बाहर बताई गई। जाँच में सामने आया कि महिला के लिवर में संक्रमण फैल चुका था और शरीर में सूजन आ गई थी। अंत में, परिजन पूनम को लेकर उदयपुर के जीवन ज्योति हॉस्पिटल पहुँचे। 25 दिसंबर को वहाँ ऑपरेशन हुआ और दो मृत नवजातों को गर्भ से निकाला गया।

डॉक्टरों ने बताया कि संक्रमण शरीर के अंगों तक फैल चुका है। संघर्ष के बाद, पूनम को घर लाया गया, लेकिन 30 दिसंबर को उसने दम तोड़ दिया। एक साथ तीन मौतों ने परिवार को झकझोर कर रख दिया है। यह केस अब केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि Mandsaur Medical Negligence के खिलाफ न्याय की एक पुकार बन गया है।

जनसुनवाई में गुहार: क्या मिलेगा न्याय?

6 जनवरी को पीड़ित परिवार ने कलेक्टर कार्यालय की जनसुनवाई में पहुँचकर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब प्रशासन पर दबाव है कि वे इस Mandsaur Medical Negligence मामले की निष्पक्ष जांच कराएं।

यह घटना स्वास्थ्य विभाग के उन दावों की पोल खोलती है जहाँ सुरक्षित प्रसव और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। अगर एक विशेषज्ञ डॉक्टर के पास 8 महीने इलाज कराने के बाद भी यह हश्र होता है, तो आम आदमी किस पर भरोसा करे?

मन्दसौर की यह घटना चिकित्सा जगत के लिए एक चेतावनी है। लापरवाही और संवेदनहीनता की कीमत तीन जिंदगियों से चुकानी पड़ी है। क्या डॉ. ऋतु शर्मा और जिला अस्पताल के उस स्टाफ पर कार्रवाई होगी जिसने इलाज में देरी की? यह सवाल अब पूरे जिले में गूंज रहा है। Mandsaur Medical Negligence की इस घटना ने आम जनता के मन में डर और अविश्वास पैदा कर दिया है।


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