नीमच में कुदरत का ‘सफेद’ तांडव: Olavrusti से 100% फसलें बर्बाद, अफीम के पट्टों पर मंडराया ‘ब्लैक आउट’ का खतरा!

Olavrusti

Olavrusti

नीमच। कहते हैं कि जब कुदरत रूठती है, तो वह न मेहनत देखती है और न ही किसान की उम्मीदें। रविवार को नीमच जिले के जीरन और मनासा क्षेत्र में जो मंजर दिखा, उसने दशकों पुराने जख्म ताज़ा कर दिए। दोपहर तक तपती धूप और उमस के बीच अचानक मौसम ने ऐसा पलटा खाया कि आसमान से पत्थर (ओले) बरसने लगे। यह महज ओलावृष्टि(Olavrusti) नहीं थी, बल्कि यह उन हजारों किसानों की मेहनत पर चली ‘सफेद आरी’ थी, जो पिछले चार महीनों से खून-पसीना एक कर अपनी फसल पाल रहे थे।

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जीरन-मनासा के खेतों में बिछा ‘सफेद कफन’

रविवार की दोपहर करीब 3:30 बजे आसमान में काले बादलों का ऐसा घेरा बना कि दिन में ही अंधेरा छा गया। इसके बाद जो हुआ, उसने किसानों के कलेजे को मुंह को ला दिया। जीरन तहसील के भंवरासा, पालसोडा, केलुखेड़ा और बामणिया भोपाल गंज में देखते ही देखते सड़कों और खेतों में 2 से 3 इंच तक ओलों की परत जम गई। वहीं मनासा के रूपावास, आकली, आंतरीमाता, और खजूरी में भी प्रकृति का ऐसा ही रौद्र रूप देखने को मिला। स्थानीय ग्रामीणों की मानें तो पालसोडा और भंवरासा में तो ऐसा लग रहा था मानो कुदरत ने खेतों पर ‘सफेद कफन’ बिछा दिया हो।

अफीम की खेती: पट्टे बचाने की जंग शुरू

नीमच जिला अफीम उत्पादन का केंद्र है और यहाँ का किसान सीधे तौर पर दिल्ली के नारकोटिक्स विभाग के प्रति जवाबदेह होता है। वर्तमान में अफीम की फसल लुवाई-चिराई (Lancing) के करीब है। कई क्षेत्रों में डोडों पर कट लगाने की तैयारी चल रही थी, लेकिन इस भीषण ओलावृष्टि(Olavrusti) ने डोडों को क्षत-विक्षत कर दिया है।

अफीम किसान बताते हैं कि यदि डोडे पर ओला लग जाए, तो उसका दूध रिस जाता है और वह काला पड़ जाता है। इससे न केवल अफीम की मात्रा घटती है, बल्कि उसकी ‘मर्फिन’ की गुणवत्ता भी खत्म हो जाती है। अब किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती विभाग की ‘औसत’ (Average) पूरी करना है। अगर औसत नहीं मिली, तो वर्षों पुराने अफीम के पट्टे कट सकते हैं। यह ओलावृष्टि(Olavrusti) किसानों के लिए सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि उनके भविष्य का ‘ब्लैक आउट’ साबित हो रही है।

गेहूं, चना और लहसुन: 100% बर्बादी की कगार पर

ओलावृष्टि(Olavrusti) की मार इतनी जबरदस्त थी कि गेहूं की फसल खेतों में पूरी तरह सो गई है। जो गेहूं पककर सुनहरा हो रहा था, उसकी बालियां टूटकर मिट्टी में मिल गई हैं। यही हाल चने और लहसुन का भी है। लहसुन की पत्तियां टूट जाने से अब कंद का विकास रुक जाएगा, जिससे उत्पादन में 60 से 70 फीसदी की गिरावट तय मानी जा रही है। ओलावृष्टि(Olavrusti) ने सरसों की फलियों को भी नहीं बख्शा है, वे भी पूरी तरह झड़ चुकी हैं।

विशेषज्ञों की चेतावनी और ग्राउंड जीरो के हालात

कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञ सीपी पाचौरी ने स्थिति का विश्लेषण करते हुए बताया कि “यह बेमौसम ओलावृष्टि(Olavrusti) फसलों के लिए ‘स्लो पॉइजन’ की तरह है। अफीम और धनिया जैसी नाजुक फसलों में अब रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं बची है। जिन किसानों की फसल कटने वाली थी, उनका नुकसान शत-प्रतिशत है।”

ग्राउंड जीरो पर किसानों का गुस्सा प्रशासन के प्रति भी फूट रहा है। किसानों का कहना है कि जब आपदा आती है, तो नेता और अधिकारी सिर्फ आश्वासन की घुट्टी पिलाते हैं। पालसोडा के किसानों ने स्पष्ट लहजे में कहा कि हमें ‘आश्वासन’ नहीं, बल्कि तुरंत ‘सर्वे’ और ‘मुआवजा’ चाहिए। राजस्व विभाग की टीम को कल सुबह से ही खेतों में उतरकर पंचनामा बनाना चाहिए, वरना किसान सड़कों पर उतरने से पीछे नहीं हटेंगे।

अब सरकार की बारी

नीमच के अन्नदाता पर आई इस विपदा ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आधुनिक तकनीक और दावों के बीच किसान आज भी आसमान के भरोसे है। ओलावृष्टि(Olavrusti) ने जो घाव दिए हैं, उन्हें भरने के लिए प्रशासन को कागजी औपचारिकताएं छोड़कर मानवीय आधार पर सर्वे करना होगा। क्या प्रशासन उन किसानों का दर्द समझ पाएगा जिनका घर इन्हीं फसलों की आस में चलने वाला था?


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