467 की जगह 292 रुपये मजदूरी! 2 घंटे का अल्टीमेटम और Neemuch की रस्सी फैक्ट्री के बाहर महिलाओं का आंदोलन
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
25 फ़रवरी 2026, (अपडेटेड 25 फ़रवरी 2026, 5:56 अपराह्न IST)

नीमच: जिले का औद्योगिक और श्रमिक परिदृश्य आज उस समय अचानक गरमा गया, जब भरभड़िया इलाके में स्थित एक प्रमुख रस्सी फैक्ट्री (rope factory) के बाहर सैकड़ों महिला मजदूरों ने अपने जायज हकों के लिए मोर्चा खोल दिया। इस विरोध प्रदर्शन ने न केवल फैक्ट्री प्रबंधन की नींद उड़ा दी है, बल्कि स्थानीय पुलिस और प्रशासन को भी हाई अलर्ट पर ला दिया है। कड़कड़ाती धूप और रोजी-रोटी के गहरे संकट के बीच इन महिलाओं का यह उग्र प्रदर्शन इस बात का सीधा प्रमाण है कि शोषण की इंतहा अब उनके सब्र का बांध पूरी तरह से तोड़ चुकी है।

आखिर क्यों भड़का महिला मजदूरों का गुस्सा?

इस पूरे विवाद की जड़ मजदूरी में की जा रही भारी कटौती और लंबे समय से बकाया एरियर का भुगतान न होना है। प्रदर्शन कर रही आक्रोशित महिलाओं का सीधा आरोप है कि सरकार और श्रम विभाग के तय नियमों के अनुसार उन्हें प्रतिदिन 467 रुपये की न्यूनतम मजदूरी मिलनी चाहिए। लेकिन, इस रस्सी फैक्ट्री (rope factory) के प्रबंधन द्वारा उन्हें लंबे समय से महज 292 रुपये प्रतिदिन का ही भुगतान किया जा रहा है।

एक मजदूर परिवार के लिए आज के इस बेतहाशा महंगाई के दौर में मात्र 292 रुपये में घर का चूल्हा जलाना, बच्चों की पढ़ाई और बीमारी का खर्च उठाना कितना मुश्किल है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। यही आर्थिक तंगी और अपने हक का पैसा मारे जाने की पीड़ा आज सड़क पर एक बड़े हंगामे में तब्दील हो गई है।

श्रम विभाग के खोखले वादे और बढ़ता आक्रोश

यह मामला अचानक रातों-रात सामने नहीं आया है। महिलाओं ने अपनी व्यथा सुनाते हुए संवाददाताओं को बताया कि उन्होंने नियम विरुद्ध हो रहे इस वेतन भुगतान को लेकर पूर्व में श्रम विभाग (Labor Department) का दरवाजा भी खटखटाया था। उस वक्त श्रम अधिकारी ने इन गरीब महिलाओं को न्याय का पूरा भरोसा दिलाया था। बकायदा यह आश्वासन दिया गया था कि एक महीने के भीतर उनका सारा बकाया एरियर उनके बैंक खातों में जमा करवा दिया जाएगा।

लेकिन सिस्टम की विडंबना देखिए कि इस खोखले आश्वासन को दिए हुए आज दो महीने से अधिक का समय बीत चुका है। न तो एरियर का कोई अता-पता है और न ही रस्सी फैक्ट्री (rope factory) के मालिकों के अड़ियल रवैये में कोई सुधार आया है। प्रशासन की इसी लेटलतीफी ने आज इस बड़े आंदोलन को जन्म दिया है। जब कागजी कार्रवाई और मिन्नतों से न्याय नहीं मिला, तो इन महिलाओं ने अपने हकों की आर-पार की लड़ाई के लिए सड़क का रुख कर लिया।

प्रशासन को दो घंटे का अल्टीमेटम: चक्काजाम की चेतावनी

फैक्ट्री के मेन गेट पर जुटीं ये सैकड़ों महिलाएं अब पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं। लगातार नारेबाजी करते हुए उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि अब उन्हें कोई नया झूठा आश्वासन नहीं, बल्कि अपना पूरा बकाया पैसा आज ही चाहिए।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन और रस्सी फैक्ट्री (rope factory) प्रबंधन को कड़े शब्दों में केवल दो घंटे का अल्टीमेटम दिया है। महिलाओं ने साफ चेतावनी दी है कि यदि इन दो घंटों के भीतर उनकी मांगों का ठोस और लिखित समाधान नहीं निकलता है, तो वे सड़क पर बैठकर पूर्ण चक्काजाम करेंगी। इस चेतावनी के बाद से ही पूरे क्षेत्र में भारी यातायात जाम और व्यवस्था बिगड़ने की आशंका मंडराने लगी है।

पुलिस-प्रशासन की दौड़-भाग और ताजा हालात

जैसे ही इस विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम के अल्टीमेटम की खबर आला अधिकारियों के कानों तक पहुंची, पुलिस और प्रशासन के महकमे में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में भारी पुलिस बल और आला प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंच गए हैं। फिलहाल इस रस्सी फैक्ट्री (rope factory) के बाहर स्थिति बेहद तनावपूर्ण है, लेकिन पुलिस ने किसी तरह हालात को नियंत्रण में रखा हुआ है।

प्रशासनिक टीम फैक्ट्री प्रबंधन और मजदूर महिलाओं के प्रतिनिधियों के बीच मध्यस्थता कराकर बातचीत का रास्ता निकालने में जुटी हुई है। अधिकारियों की कोशिश है कि समय रहते कोई सकारात्मक हल निकल आए ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति किसी भी हाल में न बिगड़े।

मजदूरों के अधिकार और श्रमिक संगठनों का समर्थन

न्यूनतम मजदूरी हर कामगार का मौलिक और कानूनी अधिकार है। जिस तरह से 467 रुपये के बजाय 292 रुपये का भुगतान किया जा रहा है, वह श्रम कानूनों का सीधा और स्पष्ट उल्लंघन है। इस रस्सी फैक्ट्री (rope factory) के बाहर हो रहे प्रदर्शन की गूंज अब सिर्फ फैक्ट्री परिसर तक सीमित नहीं रह गई है। जिले के अन्य श्रमिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए इन महिलाओं के आंदोलन का खुला समर्थन किया है। हर किसी की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या प्रशासन इन गरीब महिलाओं को उनका जायज हक दिला पाएगा या फिर सिस्टम रसूखदारों के आगे बेबस नजर आएगा।


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Aakash Sharma
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