नीमच । विकासखंड मनासा के ग्राम भाटखेड़ी निवासी किसान कमलाशंकर विश्वकर्मा ने बांस की खेती को केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे जैविक कृषि, पर्यावरण संरक्षण, फसल विविधता और अतिरिक्त आय से जोड़ने की पहल की है। उनके कृषि नवाचार के चलते क्षेत्र में उन्हें ‘बैम्बू मैन’ के नाम से पहचान मिली है।
कलेक्टर हिमांशु चंद्रा के मार्गदर्शन और कृषि विभाग के सहयोग से कमलाशंकर विश्वकर्मा ने अपने खेत को ‘विश्वकर्मा बैम्बू फार्म एंड बायोडायवर्सिटी पार्क’ के रूप में विकसित करने की पहल की है। अब यह खेत बांस की खेती के साथ-साथ विभिन्न कृषि प्रयोगों, जैव विविधता, शिक्षा और कृषि पर्यटन से जुड़ता नजर आ रहा है।
बांस की खेती से शुरू हुआ नवाचार का सफर
किसान कमलाशंकर विश्वकर्मा ने बताया कि उन्होंने बांस की खेती को आय के साथ पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया। उनके खेत में तैयार होने वाले बांस से विभिन्न उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इसके बाद इन उत्पादों का मूल्यवर्धन और विक्रय भी किया जाता है। यही कृषि नवाचार उनकी पहचान का प्रमुख आधार बना। बांस को खेती और आय के माध्यम से जोड़ने के साथ उन्होंने अपने खेत में अन्य फसलों और प्राकृतिक एवं जैविक खेती से जुड़े प्रयोग भी शुरू किए।
एक खेत में कई फसलों का प्रयोग
कमलाशंकर विश्वकर्मा के खेत की खास बात यह है कि यहां केवल बांस ही नहीं लगाया गया है। बांस के साथ अलग-अलग फसलों का उत्पादन किया जा रहा है।
खेत में इन फसलों का उत्पादन
- मूंग
- उड़द
- मूंगफली
- मक्का
- चिया
- ढैंचा बीज
इसके अलावा खेत में प्राकृतिक एवं जैविक खेती से जुड़े प्रयोग किए जा रहे हैं। फसल विविधता और जैविक पद्धतियों के माध्यम से मिट्टी के स्वास्थ्य तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है।
खेत को बनाया बायोडायवर्सिटी पार्क
बांस की खेती, जैव विविधता और कृषि प्रयोगों के जरिए कमलाशंकर विश्वकर्मा अपने खेत को एक अलग स्वरूप देने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसे ‘विश्वकर्मा बैम्बू फार्म एंड बायोडायवर्सिटी पार्क’ के रूप में विकसित करने की पहल की गई है। यह खेत अब कृषि के साथ पर्यावरण, शिक्षा और कृषि पर्यटन से जुड़ा केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यहां आने वाले लोग विभिन्न कृषि नवाचारों को प्रत्यक्ष रूप से देख और समझ सकते हैं।
योजना से मिल रही सहायता, जैविक खेती को बढ़ावा
कमलाशंकर विश्वकर्मा परंपरागत कृषि विकास योजना से भी जुड़े हैं। योजना के तहत उन्हें ₹5,000 प्रतिवर्ष, तीन वर्षों तक सहायता राशि मिल रही है। कृषि विभाग के मार्गदर्शन में वे जैविक खेती को आगे बढ़ाने के साथ अपने अनुभव किसानों और विद्यार्थियों के साथ साझा कर रहे हैं। इस तरह उनका खेत कृषि प्रयोगों के साथ सीखने और अनुभव साझा करने का माध्यम भी बन रहा है।
किसानों के लिए क्या संदेश दे रही यह पहल?
कमलाशंकर विश्वकर्मा की पहल में बांस की खेती के साथ फसल विविधता, जैविक कृषि और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ा गया है। उनके खेत में किए जा रहे प्रयोग बताते हैं कि कृषि को केवल उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय उसे अलग-अलग गतिविधियों से जोड़ने की दिशा में भी प्रयास किए जा सकते हैं।
किसान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि किसानों के हित में संचालित योजनाओं से उन्हें खेती में नए प्रयोग करने का अवसर मिला है। उन्होंने कलेक्टर हिमांशु चंद्रा के मार्गदर्शन और कृषि विभाग के सहयोग के लिए भी धन्यवाद दिया।
‘बैम्बू मैन’ के खेत की कहानी क्यों खास?
भाटखेड़ी के किसान कमलाशंकर विश्वकर्मा ने बांस की खेती को अपनी पहचान का आधार बनाते हुए इसे जैविक खेती, पर्यावरण और कृषि नवाचार से जोड़ने का प्रयास किया है। बांस से उपयोगी उत्पाद तैयार करने से लेकर अलग-अलग फसलों और प्राकृतिक खेती के प्रयोग तक, उनके खेत को बहुआयामी कृषि केंद्र के रूप में विकसित करने की पहल की जा रही है।
उनकी यह पहल यह संदेश देती है कि नवाचार और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर खेती को केवल फसल उत्पादन ही नहीं, बल्कि आय, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा और कृषि पर्यटन से जोड़ने का माध्यम भी बनाया जा सकता है।
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