ग्राउंड रिपोर्ट: नीमच में ‘खामोश हत्यारा’ बना Neemuch GBS; पानी में ‘जहर’ और सिस्टम की ‘अंधेरगर्दी’ का बड़ा पर्दाफाश
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
18 जनवरी 2026, (अपडेटेड 18 जनवरी 2026, 7:00 अपराह्न IST)

नीमच | मध्यप्रदेश का नीमच जिला इस वक्त एक अदृश्य दुश्मन की गिरफ्त में है। जिस Neemuch GBS (गुइयां-बेरे सिंड्रोम) को प्रशासन अब तक मनासा की सीमाओं तक सीमित मानकर अपनी पीठ थपथपा रहा था, उसने अब जिला मुख्यालय के दिल यानी बगीचा नंबर-13 और चावला कॉलोनी जैसे घनी आबादी वाले इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया है। नगर पालिका की हालिया ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ ने जो सच उगला है, उसने शहर के रसूखदारों और जिम्मेदारों के चेहरे से नकाब उतार दिया है। यह सिर्फ एक बीमारी का फैलाव नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग और जल विभाग की संगठित लापरवाही का नतीजा है।

‘क्रिमिनल मिस्टेक’: डॉक्टरों ने क्यों छिपाई सच्चाई?

Neemuch GBS का पहला केस मनासा में नहीं, बल्कि नीमच शहर में ही 24 दिसंबर को दस्तक दे चुका था। बगीचा नंबर-13 के 65 वर्षीय गुलाबसिंह जादोन पिछले 24 दिनों से वेंटिलेटर के सहारे अपनी आखिरी सांसों के लिए लड़ रहे हैं। यहाँ सवाल शहर के प्रतिष्ठित ‘आशा हॉस्पिटल’ और ‘श्रीराम हॉस्पिटल’ के उन विशेषज्ञों पर उठता है, जिन्होंने चार दिनों तक इस गंभीर बीमारी को पहचानने में ‘आपराधिक भूल’ की। अगर शुरुआती दौर में ही शहर के डॉक्टरों ने उदयपुर के विशेषज्ञों की तरह मुस्तैदी दिखाई होती, तो आज संक्रमण का यह जाल इतना गहरा नहीं होता। यह चूक नहीं, बल्कि नीमच के स्वास्थ्य तंत्र की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है।

मौत से महंगी जिंदगी: 25 इंजेक्शन और 2.5 लाख की चपत

आज नीमच का कोई भी मध्यमवर्गीय परिवार Neemuch GBS का नाम सुनते ही सिहर उठता है, क्योंकि यहाँ जान बचाने की कीमत किसी की पूरी उम्र की कमाई के बराबर है। गुलाबसिंह के परिजनों ने अब तक 25 IVIG इंजेक्शन खरीदे हैं, जिनमें से प्रत्येक की कीमत 10 हजार रुपये है। पांच दिनों के भीतर 2.5 लाख रुपये का खर्च! सबसे वीभत्स स्थिति यह है कि सरकार की ‘आयुष्मान योजना’ और अन्य स्वास्थ्य कार्ड इन महँगे इंजेक्शनों के आगे बेअसर साबित हो रहे हैं। गरीब मरीज अपनी जमीनें गिरवी रखकर मौत को चकमा देने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि सरकारी तंत्र केवल पोस्टरबाजी में मशगूल है।

‘आरती पुड़ी भोजनालय’ और शुद्धता का ढोंग: ग्राहकों को परोसा जा रहा क्लोरीन-मुक्त पानी

नगर पालिका के केमिस्ट सुरेश पंवार की टीम ने जब भारत माता चौराहा स्थित प्रसिद्ध ‘आरती पुड़ी भोजनालय’ के किचन में कदम रखा, तो वहां का दृश्य रोंगटे खड़े करने वाला था। जिस पानी से लोगों की प्यास बुझाई जा रही थी, उसमें ‘सुरक्षा कवच’ यानी क्लोरीन का नामोनिशान नहीं था। नीमच में Neemuch GBS फैलने की मुख्य कड़ी दूषित जल ही है। बिना किसी शुद्धिकरण के सीधे नल से पानी परोसना सीधे तौर पर ग्राहकों की जान के साथ खिलवाड़ है। प्रशासन की इस रेड ने साफ कर दिया है कि शहर के बड़े भोजनालय मानकों को ताक पर रखकर व्यापार कर रहे हैं।

RO प्लांट का ‘मिनरल स्कैम’: 57 TDS का पानी बना रहा शरीर को खोखला

नीमच शहर में RO (रिवर्स ऑस्मोसिस) के नाम पर एक बहुत बड़ा ‘स्कैम’ चल रहा है। छापेमारी में खुलासा हुआ कि कई प्लांट्स में पानी का TDS (Total Dissolved Solids) लेवल मात्र 57 पाया गया। विज्ञान के अनुसार, पीने योग्य पानी का TDS 250 से 300 के बीच होना चाहिए। सुरेश पंवार ने स्पष्ट किया कि “आरओ के नाम पर पानी से जरूरी मिनरल्स को पूरी तरह निचोड़ लेना शुद्धता नहीं, बल्कि शरीर को कमजोर करना है।” यह लो-टीडीएस वाला पानी लोगों की इम्युनिटी (प्रतिरोधक क्षमता) को इतना गिरा चुका है कि Neemuch GBS जैसा वायरस नर्वस सिस्टम पर सीधे हमला कर रहा है।

सड़कों पर दौड़ते ‘गोपावत चिल्ड वाटर’ जैसे टैंकर: संक्रमण का चलता-फिरता जरिया

जांच की आंच अब सड़कों पर भी पहुँच चुकी है। टीम ने जब ‘गोपावत चिल्ड वाटर’ जैसे लोडिंग वाहनों को रोककर जांच की, तो वहां भी मानकों का जनाजा निकलता मिला। न पानी का टीडीएस संतुलित था और न ही क्लोरीनीकरण की कोई व्यवस्था। यह इस बात की पुष्टि करता है कि Neemuch GBS के संक्रमण को घर-घर पहुँचाने में इन निजी जल विक्रेताओं की अमानक सप्लाई ने ‘फ्यूल’ का काम किया है। प्रशासन ने अब संस्थानों को सीधे सील करने का अल्टीमेटम दिया है, लेकिन क्या यह कार्रवाई उन लोगों की भरपाई कर पाएगी जो अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं?


संपादकीय टिप्पणी: कब जागेगा प्रशासन?

प्रशासन ने अब नागरिकों को पानी उबालकर पीने की सलाह दी है और सैंपल लैब भेजे हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब 24 दिसंबर को पहला मरीज मिला, तब सिस्टम क्यों सोया रहा? क्या नीमच को इटली या वुहान बनने का इंतजार था? Neemuch GBS का बढ़ता ग्राफ चीख-चीख कर कह रहा है कि लापरवाही की जड़ें बहुत गहरी हैं। अब वक्त केवल छापेमारी का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है।


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Aakash Sharma
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