नीमच (The Times of MP): शनिवार को भरभड़िया स्थित हकीमी रोप इंडस्ट्रीज (Hakimi Rope Industries) के बाहर हुए Neemuch Factory Protest ने जिले के औद्योगिक क्षेत्र की उस ‘काली सच्चाई’ से पर्दा उठा दिया है, जिसे अब तक ऊंची दीवारों के पीछे छिपाकर रखा गया था।
रस्सी फैक्ट्री की महिला मजदूरों का गुस्सा तो फूटा, लेकिन The Times of MP की पड़ताल में सामने आया है कि शोषण का यह खेल सिर्फ एक फैक्ट्री तक सीमित नहीं है। नीमच के कई नामचीन प्लांट्स और फैक्ट्रियों में मजदूरों के साथ-साथ एसी कमरों में बैठने वाले ‘ऑफिस स्टाफ’ का भी खून चूसा जा रहा है।
Neemuch Factory Protest घटना: 10 मिनट की देरी और भड़क उठा गुस्सा
मामले की शुरुआत शनिवार सुबह हुई। फैक्ट्री में काम करने वाली करीब 20 से 25 महिलाएं जब काम पर पहुंचीं, तो उन्हें गेट पर ही रोक दिया गया। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे निर्धारित समय से 10 मिनट देरी से पहुंची थीं। फैक्ट्री प्रबंधन की इस तानाशाही ने बारूद में चिंगारी का काम किया और महिलाओं का सब्र टूट गया।
विरोध कर रही श्रमिक डाली बाई (जाटव) ने मीडिया को अपनी आपबीती बताते हुए कहा,
“साहब! हम सुबह 8 बजे आते हैं और शाम 5:30 बजे तक मशीन की तरह खटते हैं। हमसे 9 से 10 घंटे काम कराया जाता है। अगर कभी 5-10 मिनट की देरी हो जाए, तो गेट से ही वापस लौटा दिया जाता है या फिर गालियां दी जाती हैं। काम करना है तो करो, नहीं तो घर बैठो – यह रोज की धमकी है।”
The Times of MP का ‘लॉ क्लास’: जानिए फैक्ट्री में किन 5 कानूनों का हो रहा था ‘अंतिम संस्कार’
इस हंगामे ने न केवल प्रशासन को जगाया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया है कि आखिर फैक्ट्री के अंदर चल क्या रहा था? एक जिम्मेदार मीडिया हाउस होने के नाते हम आपको बता रहे हैं कि फैक्ट्री प्रबंधन ने Labor Act (श्रम कानून) के किन नियमों का खुला उल्लंघन किया है:
काम के घंटे (Factories Act, 1948 – Section 51 & 54): कानूनन किसी भी श्रमिक से एक दिन में 9 घंटे और सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता।
हकीकत: यहाँ महिलाओं से जबरन 10 घंटे काम कराया जा रहा था, जो गैर-कानूनी है।
ओवरटाइम का भुगतान (Section 59): नियम कहता है कि तय घंटों से ज्यादा काम कराने पर दोगुना (Double) वेतन मिलना चाहिए।
हकीकत: ओवरटाइम तो छोड़िए, यहाँ सामान्य वेतन के भी लाले पड़े हैं।
वजन उठाने की सीमा (Section 34): कानून महिलाओं से अत्यधिक भारी वजन उठाने पर रोक लगाता है। सुरक्षा मानकों के अनुसार यह सीमा (सिर पर) 65 किलो से कम होनी चाहिए।
हकीकत: महिलाएं चिल्ला-चिल्लाकर कह रही हैं कि उनसे 70 से 80 किलो वजन की बोरियां उठवाई जाती हैं और ‘पलटी’ लगवाई जाती है। यह अमानवीय है।
न्यूनतम वेतन (Minimum Wages Act): कुशल श्रमिक के लिए शासन द्वारा निर्धारित दर लगभग 467 रुपये प्रतिदिन है।
हकीकत: इन मजदूरों को मात्र 292 रुपये देकर इनका आर्थिक शोषण किया जा रहा है।
नोटिस बोर्ड (Transparency Norms): फैक्ट्री गेट पर काम के घंटे, वेतन दर और लेबर अधिकारी के नंबर चस्पा होने अनिवार्य हैं।
हकीकत: मौके पर ऐसा कोई बोर्ड नहीं मिला। सब कुछ ‘हवा’ में चल रहा था।
इंस्पेक्शन के नाम पर ‘लुका-छिपी’ का खेल
मजदूरों ने एक और सनसनीखेज खुलासा किया। उन्होंने बताया कि जब भी कोई अधिकारी जांच (Inspection) के लिए आता है, तो फैक्ट्री प्रबंधन चालाकी से महिलाओं को पिछली छुट्टी दे देता है या उन्हें गोदामों में छिपा दिया जाता है। अधिकारियों के सामने ‘सेट’ किए गए कर्मचारियों को पेश कर ‘सब चंगा सी’ की रिपोर्ट बनवा ली जाती है।
लेबर ऑफिसर की दबिश: रंगे हाथों पकड़ी गई चोरी
हंगामे की सूचना मिलते ही श्रम पदाधिकारी (Labor Officer) सज्जन सिंह मौके पर पहुंचे। उनके तीखे सवालों के आगे फैक्ट्री के स्टाफ ने घुटने टेक दिए और कैमरे के सामने सच कबूल लिया। स्टाफ ने माना कि 10 घंटे काम कराया जाता है।
लेबर ऑफिसर सज्जन सिंह ने कहा,
“शिकायत सही पाई गई है। यहाँ न तो नियमों का डिस्प्ले है, न ही न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है। बाल श्रमिक के नियम भी प्रदर्शित नहीं हैं। हम फैक्ट्री मालिक से पिछले एरियर (बकाया) का भुगतान करवाएंगे और न्यायालय के माध्यम से चालानी कार्रवाई की जाएगी।”
मालिक का रटा-रटाया जवाब: “मुझे नहीं पता”
हैरानी की बात यह है कि जब फैक्ट्री मालिक से मजदूरों के शोषण और गाली-गलौज पर सवाल किया गया, तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने कहा, “मुझे जानकारी नहीं है, मैं तो बाहर था, यहाँ बालक बैठता है, मैं दिखवाता हूं।” सवाल यह है कि क्या मालिक की नाक के नीचे 12-13 साल से चल रही फैक्ट्री में नियमों की धज्जियां उड़ती रहीं और उन्हें खबर तक नहीं? या फिर यह सब रसूख के दम पर हो रहा था?
नीमच के उद्योगों का ‘काला सच’: ऑफिस स्टाफ भी नहीं है अछूता
रस्सी फैक्ट्री के विवाद ने शहर के अन्य बड़े उद्योगों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अंदरखाने से मिल रही खबरों के मुताबिक, नीमच इंडस्ट्रियल एरिया के कई प्लांट्स में स्थिति बद से बदतर है:
1. 8 नहीं, 10 से 12 घंटे की ‘बाध्यकारी’ ड्यूटी: सिर्फ लेबर ही नहीं, बल्कि कंप्यूटर और डेस्क पर काम करने वाले ऑफिस स्टाफ को भी सुबह 9 बजे बुलाकर रात के 8 या 9 बजे तक रोका जाता है। रजिस्टर में ड्यूटी 8 घंटे की दिखाई जाती है, लेकिन हकीकत में 10 से 12 घंटे काम लिया जा रहा है।
नियम: 8 घंटे से ऊपर काम पर दोगुना ओवरटाइम मिलना चाहिए।
हकीकत: ओवरटाइम मांगते ही बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
2. बोनस का नया ‘खेल’: दिवाली की खुशियां मार्च में? परंपरा और नियम के मुताबिक बोनस का भुगतान दिवाली (त्योहार) के समय होता है ताकि श्रमिक परिवार त्योहार मना सकें। लेकिन नीमच के कई उद्योगपतियों ने अपना ही ‘तुगलकी फरमान’ बना लिया है। अब दिवाली का बोनस मार्च (वित्तीय वर्ष समाप्ति) में देने का नया नियम थोप दिया गया है, ताकि कर्मचारी दिवाली पर खाली हाथ रहे और मार्च तक नौकरी छोड़ने की हिम्मत न कर सके।
3. PF के नाम पर 24% की कटौती का गणित: सूत्रों का कहना है कि पीएफ (Provident Fund) कटौती में भी बड़ा झोल चल रहा है। नियमतः 12% कर्मचारी और 12% नियोक्ता (Employer) को देना होता है। लेकिन आरोप है कि कई जगहों पर पूरा 24% कर्मचारी की सैलरी (CTC) से ही काटा जा रहा है। यानी मालिक का हिस्सा भी मजदूर/कर्मचारी की जेब से भरा जा रहा है।
नौकरी खोने का डर और ‘साजिशी चुप्पी’
बड़ा सवाल यह है कि इतना सब होने के बाद भी शिकायत क्यों नहीं होती? इसका जवाब है- डर। नीमच जैसे छोटे शहर में रोजगार के सीमित अवसर हैं। कर्मचारियों को डर है कि अगर आवाज उठाई, तो न सिर्फ मौजूदा नौकरी जाएगी, बल्कि फैक्ट्री मालिकों का ‘सिंडिकेट’ उन्हें कहीं और नौकरी नहीं मिलने देगा। इसी डर का फायदा उठाकर सेठ-साहूकार श्रम कानूनों (Labor Acts) को अपनी तिजोरी में कैद किए बैठे हैं।
जिम्मेदारों की भूमिका संदिग्ध
हकीमी रोप फैक्ट्री के मामले में श्रम अधिकारी ने कार्रवाई की बात कही है, लेकिन शहर के बाकी प्लांट्स का क्या? क्या श्रम विभाग के पास इतना डेटा नहीं है कि किस फैक्ट्री में कर्मचारी कितने घंटे काम कर रहे हैं और उन्हें बोनस कब मिल रहा है?
The Times of MP की यह रिपोर्ट प्रशासन के लिए एक अलार्म है। अगर समय रहते इन उद्योगों में औचक निरीक्षण नहीं किया गया, तो रस्सी फैक्ट्री जैसा Neemuch Factory Protest शहर के हर चौराहे पर देखने को मिल सकता है।
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