GBS का कहर: मनासा में 2 मौतें, 7 संदिग्ध, प्रशासन बेसुध!
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
15 जनवरी 2026, (अपडेटेड 15 जनवरी 2026, 4:48 अपराह्न IST)

नीमच/मनासा न्यूज (GBS का कहर)। सर्द हवाओं के बीच नीमच जिले के मनासा क्षेत्र में एक अंजान खौफ ने दस्तक दी है। यहां के हंसते-खेलते परिवारों में मातम पसर गया है। वजह है—गिलियन बारें सिंड्रोम (GBS)। इस रहस्यमयी और जानलेवा बीमारी ने इलाके में कोहराम मचाना शुरू कर दिया है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस बीमारी की चपेट में आकर दो मासूम अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि स्वास्थ्य विभाग के डोर-टू-डोर सर्वे में 7 अन्य बच्चों में इसके संदिग्ध लक्षण मिले हैं।

जहां एक तरफ माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर दहशत में हैं, वहीं दूसरी तरफ इलाज और संसाधनों की कमी पर सियासत भी उबल पड़ी है। जिला कांग्रेस ने प्रशासन की “नींद” तोड़ने के लिए मोर्चा खोल दिया है।

क्या है ‘GBS का कहर‘ और क्यों डरा रहा है यह सिंड्रोम?

मनासा में GBS का कहर अचानक नहीं बरसा, बल्कि इसके संकेत पिछले कुछ दिनों से मिल रहे थे, जिन्हें शायद नजरअंदाज किया गया। डॉक्टरों के अनुसार, गिलियन बारें सिंड्रोम (GBS) एक दुर्लभ लेकिन बेहद गंभीर ऑटो-इम्यून बीमारी है।

आसान भाषा में समझें तो GBS का कहर हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immune System) गलती से हमारी ही नसों (Nerves) को दुश्मन समझकर उन पर हमला कर देती है। यह अक्सर वायरल बुखार के 5 से 7 दिन बाद उभरता है।

  • लक्षण: इसकी शुरुआत पैरों में झनझनाहट और कमजोरी से होती है।

  • खतरा: धीरे-धीरे यह पैरालिसिस (लकवा) ऊपर की ओर बढ़ता है। अगर यह सांस की नसों तक पहुंच जाए, तो मरीज की जान बचाना मुश्किल हो जाता है।

दो मासूमों की दर्दनाक दास्तां, जिसने सबको झकझोर दिया

इस बीमारी ने जिन दो घरों के चिराग बुझाए, उनकी कहानी सुनकर किसी का भी दिल दहल जाएगा।

  1. सोनू (15 वर्ष) की अधूरी कहानी: रामनगर के रहने वाले सोनू को 22 दिसंबर को मामूली बुखार आया था। परिवार को लगा वायरल है, लेकिन 29 दिसंबर को उसके पैरों में असहनीय दर्द उठा। देखते ही देखते उसकी उंगलियों ने काम करना बंद कर दिया। परिजन उसे लेकर दर-दर भटके। अंत में 13 जनवरी को अहमदाबाद में इलाज के दौरान सोनू जिंदगी की जंग हार गया।

  2. नन्हा केशव (6.5 वर्ष): सिपाही मोहल्ला निवासी केशव अभी ठीक से दुनिया भी नहीं देख पाया था। 2 जनवरी को उसकी तबीयत बिगड़ी। मनासा से नीमच, नीमच से उदयपुर रेफर किया गया। हालत इतनी नाजुक थी कि उसे अहमदाबाद ले जाया जा रहा था, लेकिन GBS का कहर इतना तेज था कि 12 जनवरी को रास्ते में ही उसकी सांसें थम गईं।

प्रशासन की नींद टूटी, लेकिन क्या काफी है?

दो मौतों के बाद प्रशासन हरकत में आया है। कलेक्टर हिमांशु चंद्रा के निर्देश पर मेडिकल कॉलेज की 6 सदस्यीय विशेषज्ञ टीम ने मनासा में डेरा डाला। बुधवार को टीम ने 5 घंटे तक प्रभावित इलाकों में घर-घर जाकर सर्वे किया।

नतीजे चौंकाने वाले थे—सर्वे में 7 और बच्चों में GBS के संदिग्ध लक्षण मिले हैं। इन सभी को तुरंत मेडिकल निगरानी में रखा गया है। पानी के सैंपल भी जांच के लिए भेजे गए हैं, क्योंकि दूषित पानी भी इस वायरस का एक वाहक हो सकता है।

सड़कों पर उतरी कांग्रेस: ‘इलाज नहीं, सिर्फ दिखावा हो रहा है’

बच्चों की मौत और GBS का कहर बढ़ते देख जिला कांग्रेस कमेटी ने प्रशासन के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। कांग्रेस जिला अध्यक्ष तरुण बाहेती के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट का घेराव किया और जमकर नारेबाजी की।

कांग्रेस का आरोप है कि जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था वेंटिलेटर पर है। उन्होंने प्रशासन के सामने कुछ तीखे सवाल और मांगें रखी हैं:

  • न्यूरो विशेषज्ञ कहां हैं?: जिला अस्पताल में एक भी न्यूरोलॉजिस्ट नहीं है। जब बीमारी नसों से जुड़ी है, तो इलाज कौन करेगा?

  • गरीब कैसे खरीदेगा इंजेक्शन?: GBS के इलाज में लगने वाला IVIG (इम्युनोग्लोबुलिन) इंजेक्शन बेहद महंगा (हजारों रुपये का) है। गरीब मरीज इसे कैसे खरीदेगा? इसे तुरंत मुफ्त किया जाए।

  • लैब क्यों नहीं?: बीमारी की पुष्टि के लिए सैंपल बाहर भेजने पड़ते हैं, जिससे रिपोर्ट आने में देरी होती है और इलाज में देरी जानलेवा साबित हो रही है।

चेतावनी: ठोस कदम नहीं तो उग्र आंदोलन

तरुण बाहेती ने प्रशासन को चेतावनी देते हुए साफ शब्दों में कहा,

“अगर GBS का कहर रोकने के लिए न्यूरो डॉक्टरों की नियुक्ति और मुफ्त इंजेक्शन की व्यवस्था नहीं की गई, तो कांग्रेस चुप नहीं बैठेगी। हम उग्र आंदोलन करेंगे क्योंकि यह हमारे बच्चों की जिंदगी का सवाल है।”

फिलहाल, मनासा के लोग खौफ के साये में जी रहे हैं। हर माता-पिता अपने बच्चे के हल्का सा बीमार पड़ने पर भी सिहर उठते हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन कागजी सर्वे से आगे बढ़कर कब तक ठोस चिकित्सा सुविधा मुहैया करा पाता है।


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Aakash Sharma
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