UGC के विवादित नियमों पर सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा: ‘अस्पष्ट’ बताकर नए नियमों पर लगाई रोक, केंद्र को दोबारा ड्राफ्ट बनाने का आदेश
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
29 जनवरी 2026, (अपडेटेड 29 जनवरी 2026, 2:44 अपराह्न IST)

नई दिल्ली: देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के नाम पर लागू किए गए UGC (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) के नए नियमों को सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका लगा है। गुरुवार को एक ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की बेंच ने ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026’ पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि UGC द्वारा बनाए गए इन नियमों के प्रावधान न केवल अस्पष्ट हैं, बल्कि इनका समाज में गंभीर दुरुपयोग भी हो सकता है।

क्या है पूरा मामला?

UGC ने इसी साल 13 जनवरी को नए नियमों को नोटिफाई किया था, जिसे 15 जनवरी से देशभर के कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में लागू कर दिया गया। इन नियमों का प्राथमिक उद्देश्य कैंपस में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के साथ होने वाले जातीय भेदभाव को रोकना था। लेकिन, इन नियमों के जारी होते ही सवर्ण समाज और सामान्य वर्ग के छात्रों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि UGC के ये नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के साथ खुल्लम-खुल्ला भेदभाव करते हैं।

कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अब केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने साफ किया है कि इन नियमों का ड्राफ्ट फिर से तैयार किया जाना चाहिए क्योंकि वर्तमान स्वरूप संवैधानिक रूप से संदिग्ध नजर आ रहा है। इस मामले की अगली सुनवाई अब 19 मार्च को तय की गई है।

कोर्ट रूम में उठी तीखी दलीलें: ‘स्वाभाविक अपराधी’ क्यों?

सुनवाई के दौरान एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने UGC के नियम 3(C) को चुनौती दी, जो जाति आधारित भेदभाव को परिभाषित करता है। उन्होंने तर्क दिया कि यह परिभाषा इतनी संकीर्ण है कि इसमें मान लिया गया है कि केवल एक खास वर्ग ही भेदभाव का शिकार होता है।

CJI सूर्यकांत ने भी इस पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए पूछा कि यदि कोई छात्र उत्तर-पूर्व से आता है और उस पर कोई नस्लीय टिप्पणी होती है, तो क्या UGC के ये नियम उसकी रक्षा करेंगे? वकीलों ने कोर्ट को बताया कि इन नियमों से ‘रैगिंग’ की परिभाषा को ही हटा दिया गया है। इससे स्थिति यह बन गई है कि यदि कोई छात्र रैगिंग का विरोध करता है, तो उस पर उल्टा जातिगत भेदभाव का क्रॉस-केस चलाया जा सकता है। ऐसे में UGC के ये नियम निर्दोष छात्रों के लिए जेल जाने का रास्ता साफ कर रहे हैं।

विवाद के 5 मुख्य कारण: आखिर सवर्ण छात्र क्यों हैं नाराज?

UGC के इन नए नियमों को लेकर विरोध के पीछे पाँच प्रमुख तर्क दिए जा रहे हैं:

  1. भेदभाव की एकतरफा परिभाषा: नियमों के अनुसार, केवल SC, ST, OBC, महिला या विकलांग ही पीड़ित हो सकते हैं। सवर्ण छात्र केवल आरोपी हो सकते हैं, पीड़ित नहीं। यह समानता के अधिकार का उल्लंघन लगता है।

  2. झूठी शिकायत पर कोई दंड नहीं: ड्राफ्ट में झूठी शिकायत करने वाले के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान था, जिसे UGC ने फाइनल नियमों से हटा दिया। इससे बदले की भावना से की जाने वाली शिकायतों को बढ़ावा मिलेगा।

  3. कमेटी में सवर्णों का प्रतिनिधित्व नहीं: ‘इक्वलिटी कमेटी’ और ‘इक्विटी स्क्वाड’ में जनरल कैटेगरी के सदस्यों के लिए कोई जगह नहीं है, जिससे निष्पक्ष जांच की उम्मीद कम हो जाती है।

  4. संस्थानों में डर का माहौल: नियमों का उल्लंघन होने पर कॉलेज की मान्यता रद्द करने या ग्रांट रोकने की सख्त सजा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसके डर से कॉलेज प्रशासन मेरिट के आधार पर कड़े फैसले लेने से डरेगा।

  5. UGC एक्ट के दायरे से बाहर: आलोचकों का मानना है कि 1956 का UGC एक्ट अकादमिक मानकों के लिए है, न कि सामाजिक पुलिसिंग के लिए।

रोहित वेमुला केस से 2026 के कानून तक का सफर

इन नियमों की नींव 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला और 2019 में डॉ. पायल तडवी की आत्महत्या के बाद पड़ी थी। सुप्रीम कोर्ट ने ही UGC को सख्त नियम बनाने को कहा था। इसके बाद कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने भी इसमें सुधार के सुझाव दिए थे। लेकिन अब कोर्ट का मानना है कि UGC ने नियमों को बनाने में संतुलन खो दिया है।

राजनीतिक गलियारों में हलचल

एक तरफ तमिलनाडु के सीएम एम.के. स्टालिन ने UGC के इन कदमों की सराहना की थी, तो दूसरी तरफ भाजपा नेता बृजभूषण शरण सिंह ने इसे समाज को बांटने वाला कानून बताया। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद केंद्र सरकार बैकफुट पर है और उसे अब 19 मार्च तक एक समावेशी और निष्पक्ष ड्राफ्ट पेश करना होगा। तब तक उच्च शिक्षा संस्थानों में UGC के इन नए विवादित नियमों पर ताला लगा रहेगा।


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Aakash Sharma
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