नीमच: अस्पतालों का मूल काम मरीज की जान बचाना होता है, लेकिन नीमच के कनावटी स्थित ज्ञानोदय मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल का ताजा बयान और पुराना रिकॉर्ड देखकर लगता है कि इनकी ‘सुपर-स्पेशियलिटी’ इलाज में नहीं, बल्कि मौत के बाद खुद को बचाने के लिए फुलप्रूफ कानूनी ड्राफ्ट तैयार करने में है। 68 वर्षीय प्रहलाद विठोल की मौत के बाद जब हंगामा हुआ, तो प्रबंधन ने माफी या अफसोस जताने के बजाय सीधे एक ‘क्लीन चिट’ थमा दी।
अस्पताल प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष :
अस्पताल ने अपना बचाव करते हुए जो लिखित पक्ष रखा है, वह इस प्रकार है:
मरीज की पूर्व स्थिति: 68 वर्षीय प्रहलाद विठोल सीने में दर्द और सांस फूलने की शिकायत के साथ अस्पताल आए थे। वे पहले से ही ब्रेन स्ट्रोक, हाइपरटेंशन और अनियंत्रित डायबिटीज से पीड़ित थे।
जांच और सलाह: 21 मई 2026 को एंजियोग्राफी में हृदय की तीनों मुख्य धमनियों में गंभीर रुकावट (Triple Vessel Disease) पाई गई। डॉक्टरों ने बेटे को स्थिति समझाई और बाईपास सर्जरी (Open Heart Surgery) की सलाह दी।
परिजनों का निर्णय: मरीज के बेटे बाईपास के लिए तैयार नहीं थे और उन्होंने पीसीआई (PCI – एंजियोप्लास्टी) का विकल्प चुना। 22 मई 2026 को परिवार की लिखित सहमति (Informed Consent) के बाद ही मरीज को कैथ लैब ले जाया गया।
मृत्यु का कारण: प्रक्रिया के दौरान मरीज को अचानक दौरे (Seizure) आए और उल्टी हुई, जिसके फेफड़ों में चले जाने (Aspiration) की आशंका है। इसके तुरंत बाद कार्डियो-पल्मोनरी अरेस्ट हुआ। डॉक्टरों ने सीपीआर और अस्थायी पेसमेकर लगाया, लेकिन पुरानी बीमारियों और जटिलताओं के कारण मरीज को बचाया नहीं जा सका।
इस बयान का लब्बोलुआब यह है: ‘मरीज हमारे इलाज से नहीं मरा, वह तो पहले से बीमार था। और जो भी गलत हुआ, वह बेटे के उस फैसले के कारण हुआ जिस पर उसने खुद दस्तखत किए थे!’ यानी, अस्पताल ने बड़ी ही सफाई से अपने हाथ धो लिए और मौत का सारा ठीकरा उसी रोते-बिलखते परिवार पर फोड़ दिया, जिसने इन पर भरोसा किया था।
सर्दी-जुकाम पर 15-20 टेस्ट, और अब ‘मौत’ पर सफाई की पर्ची
यह कोई पहला मामला नहीं है जब इस ज्ञानोदय मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल में इलाज के नाम पर बवाल कटा हो। ज्ञानोदय मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल का इतिहास ऐसे ‘कारनामों’ से भरा पड़ा है। यहां की व्यवस्था एक सोची-समझी रणनीति पर काम करती है। अगर कोई मरीज मामूली सर्दी-जुकाम लेकर भी पहुंच जाए, तो डॉक्टर उसे हाथ लगाने से पहले 15-20 टेस्ट का पर्चा थमा देते हैं। हर मरीज से कम से कम 7,000 से 10,000 रुपये ऐंठने का सीधा टारगेट सेट रहता है।
अब जब इसी ‘टारगेट’ के चक्कर में एक बुजुर्ग की जान चली गई, तो प्रबंधन ने बीमारियों की एक पूरी डिक्शनरी खोल दी। अस्पताल का दावा है कि प्रहलाद विठोल को पहले से ब्रेन स्ट्रोक, हाई बीपी और अनियंत्रित शुगर था। साफ है कि प्रबंधन चीख-चीख कर यह साबित करना चाहता है कि मरीज तो चलता-फिरता ‘टाइम बम’ था, हमने तो उसे छूकर मानो अहसान कर दिया!
‘बायपास’ का खौफ और ‘पीसीआई’ का जाल: बेटे पर फोड़ा मौत का ठीकरा
ज्ञानोदय मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल का सबसे बड़ा बचाव यह है कि 21 मई को एंजियोग्राफी के बाद डॉक्टरों ने ‘ओपन हार्ट सर्जरी (बायपास)’ की सलाह दी थी। अब जरा प्रैक्टिकल होकर सोचिए— जिस बुजुर्ग को पहले से स्ट्रोक और शुगर हो, क्या कोई भी बेटा यह गारंटी लेगा कि वह सीना चीरकर होने वाली बायपास का सदमा बर्दाश्त कर लेगा?
जब डॉक्टरों ने खुद बायपास के भारी जोखिम गिनाकर परिवार को खौफजदा कर दिया, तो घबराए हुए बेटे ने ‘कम चीर-फाड़’ वाली पीसीआई (PCI – एंजियोप्लास्टी और स्टेंटिंग) का विकल्प चुन लिया। यह कोई स्वतंत्र चॉइस नहीं थी, यह ‘एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई’ वाली मजबूरी थी। और अब ज्ञानोदय मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल बड़ी बेशर्मी से कह रहा है कि “देखिए, हमने तो बायपास कहा था, जोखिम भरा पीसीआई तो बेटे ने चुना!”
कैथ लैब या भूलभुलैया? उल्टी फेफड़ों में गई और डॉक्टर ताकते रहे!
ज्ञानोदय मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल के बयान का सबसे हास्यास्पद और डरावना हिस्सा वह है, जो कैथ लैब के अंदर हुआ। रिपोर्ट कहती है कि प्रक्रिया के दौरान मरीज को अचानक दौरे (Seizure) आए, उल्टी हुई जो फेफड़ों में चली गई (Aspiration), और फिर कार्डियक अरेस्ट हो गया।
यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि कैथ लैब जैसी हाई-टेक और ‘कंट्रोल्ड’ जगह पर, जहां विशेषज्ञों की फौज मौजूद होती है, वहां एक मरीज की उल्टी फेफड़ों में कैसे चली गई? क्या सक्शन मशीनें बंद थीं? क्या वेंटिलेशन का बैकअप उस वक्त काम नहीं कर रहा था? ज्ञानोदय मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल कह रहा है कि उन्होंने सीपीआर दिया और पेसमेकर लगाया। हालांकि, जब तक फेफड़ों में उल्टी भर चुकी हो और दिल रुक चुका हो, तब यह सीपीआर महज ‘कागजी खानापूर्ति’ ही साबित होता है।
‘सहमति पत्र’ यानी मौत का लीगल लाइसेंस
प्रबंधन का सबसे अचूक ब्रह्मास्त्र है— परिजनों की लिखित सहमति (Informed Consent)। 22 मई को कैथ लैब ले जाने से पहले जो दस्तखत करवाए गए, वे अब अस्पताल की सबसे बड़ी ढाल बन गए हैं।
निजी अस्पतालों में यह ‘सहमति पत्र’ एक ऐसा जादुई कागज होता है, जिसका सीधा मतलब है: “अगर आप बच गए तो चमत्कार हमारा, और अगर मर गए तो रिस्क आपका।” पुलिस ने मर्ग तो कायम कर लिया है, लेकिन क्या प्रशासन इस ‘सहमति पत्र’ की आड़ में छिपी इस सफेदपोश लीपापोती को बेनकाब कर पाएगा? या फिर हर बार की तरह, एक और फाइल चुपचाप बंद कर दी जाएगी?
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FAQs: ज्ञानोदय हॉस्पिटल मौत विवाद और नई लीपापोती
1. ज्ञानोदय मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल में प्रहलाद विठोल की मौत पर क्या बवाल है?
परिजनों का आरोप है कि मामूली दर्द के साथ आए बुजुर्ग को डराकर कैथ लैब ले जाया गया, जहां प्रक्रिया के दौरान घोर लापरवाही के चलते उनकी मौत हो गई।
2. ज्ञानोदय मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल ने अपनी आधिकारिक सफाई में क्या तर्क दिया है?
अस्पताल का तर्क है कि मरीज पहले से ही स्ट्रोक और शुगर जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त था, और कैथ लैब में अचानक आए दौरे और उल्टी फेफड़ों में जाने (Aspiration) से कार्डियक अरेस्ट हुआ।
3. अस्पताल में टेस्ट और दवाइयों को लेकर मरीजों का क्या आरोप है?
मरीजों का आरोप है कि यहां सर्दी-जुकाम पर भी 15-20 टेस्ट लिख दिए जाते हैं। साथ ही डॉक्टर ऐसी दवाइयां लिखते हैं जो शहर में कहीं नहीं मिलतीं, ताकि मरीज सिर्फ अस्पताल के महंगे मेडिकल से ही दवा खरीदें।
4. बायपास और पीसीआई (PCI) को लेकर प्रबंधन का क्या दावा है?
ज्ञानोदय मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल ने दावा किया है कि डॉक्टरों ने सुरक्षित ‘बायपास सर्जरी’ की सलाह दी थी, लेकिन बेटे ने खुद अपनी मर्जी और लिखित सहमति से ‘पीसीआई’ (एंजियोप्लास्टी) का जोखिम भरा विकल्प चुना।
5. क्या ‘सहमति पत्र’ अस्पताल को कानूनी रूप से बचा लेगा?
सहमति पत्र कानूनी बचाव जरूर देता है, लेकिन यदि जांच में इलाज के दौरान सक्शन मशीनों की अनुपलब्धता या मेडिकल नेग्लिजेंस (Medical Negligence) साबित होती है, तो सिर्फ दस्तखत अस्पताल को नहीं बचा सकते।
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