नीमच। जब खून के रिश्ते ही हक मारने पर उतारू हो जाएं, तो इंसान न्याय के लिए किस दरवाजे पर दस्तक दे? मंगलवार को नीमच जिले की जनसुनवाई में एक ऐसा ही हैरान कर देने वाला मामला सामने आया। यह कोई सामान्य शिकायत नहीं थी, बल्कि पिछले ढाई दशकों से सुलग रहा एक गहरा पैतृक संपत्ति विवाद था, जिसने स्थानीय राजस्व तंत्र और पारिवारिक रिश्तों दोनों की असलियत सामने लाकर रख दी है। मनासा तहसील के एक छोटे से गांव से आए ग्रामीण ने जब कलेक्टर हिमांशु चंद्रा के सामने अपनी फाइल खोली, तो अपनों के धोखे का एक बड़ा राज बेनकाब हो गया।
रास्ते का पहरा और हक से बेदखली का सच
मनासा तहसील के ग्राम लसुडियाआंत्री निवासी गणेश पिता रमेशचंद्र खटीक वह पीड़ित हैं, जो पिछले 20-25 वर्षों से सरकारी दफ्तरों की खाक छान रहे हैं। जनसुनवाई में दिए गए उनके आवेदन ने इस बात को पुख्ता कर दिया है कि कैसे ग्रामीण इलाकों में ज़मीन के लालच में अपनों को ही दरकिनार कर दिया जाता है।
इस पैतृक संपत्ति विवाद की जड़ें काफी गहरी हैं। गणेश का सीधा आरोप है कि उनके हिस्से के प्लाटों पर जाने का इकलौता रास्ता उनके ही परिजनों ने जबरन बंद कर दिया है। हालात यह हैं कि पुश्तैनी कृषि भूमि में कानूनी रूप से एक-चौथाई (1/4) हिस्सा होने के बावजूद, उन्हें न तो जमीन का कोई टुकड़ा दिया जा रहा है और न ही उस जमीन पर उगने वाली फसल का कोई लाभ मिल रहा है। यह सिर्फ एक पारिवारिक झगड़ा नहीं है, बल्कि एक व्यक्ति को उसके मूल अधिकारों से वंचित करने की सोची-समझी साजिश नजर आती है।
ग्राम स्वामित्व योजना में ‘खेल’ का चौंकाने वाला आरोप
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सस्पेंस तब सामने आया जब ‘ग्राम स्वामित्व योजना’ का जिक्र हुआ। केंद्र सरकार की यह योजना ग्रामीणों को उनकी आबादी भूमि का मालिकाना हक देने के लिए बनाई गई थी, लेकिन गणेश के मामले में इस योजना के दुरुपयोग का गंभीर आरोप लगा है।
आवेदक का दावा है कि इस योजना के तहत हुए सर्वे में भारी हेराफेरी की गई है। जिन प्लाटों पर उनका वास्तविक और कानूनी हक था, उन्हें सर्वे के दौरान साजिशन अन्य लोगों (परिजनों) के नाम पर दर्ज करवा दिया गया। यदि प्रशासन की जांच में यह आरोप सच साबित होता है, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि इस पैतृक संपत्ति विवाद में केवल परिवार ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर रिकॉर्ड तैयार करने वाले राजस्व अमले की भी संदिग्ध भूमिका रही है।
25 साल का लंबा संघर्ष: मुख्य मांगें
एक आम ग्रामीण का 20-25 साल तक केवल अपने हक के लिए भटकना, व्यवस्था की सुस्ती पर करारा तमाचा है। गणेश ने कलेक्टर से गुहार लगाते हुए स्पष्ट रूप से निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
रास्ते की बहाली: प्लाट पर आने-जाने के लिए परिजनों द्वारा अवैध रूप से बंद किए गए रास्ते को तुरंत खुलवाया जाए।
संपत्ति का बंटवारा: पुश्तैनी जमीन में एक-चौथाई हिस्से का राजस्व नियमों के तहत सीमांकन कर वैधानिक कब्जा दिलाया जाए।
रिकॉर्ड में सुधार: ग्राम स्वामित्व योजना के तहत गलत तरीके से दर्ज किए गए नामों की जांच हो और रिकॉर्ड को सुधारा जाए।
यह मामला अब सीधे जिले के कलेक्टर हिमांशु चंद्रा के संज्ञान में आ चुका है। मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के तहत ऐसे मामलों में रास्ता खुलवाने और बंटवारा करने के स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। सवाल यह है कि क्या इस पैतृक संपत्ति विवाद का अब कोई ठोस समाधान निकलेगा, या यह फाइल भी लाल फीताशाही के बीच कहीं दब जाएगी? 25 साल से न्याय की आस लगाए बैठे गणेश के लिए जनसुनवाई आखिरी उम्मीद है। प्रशासन का अगला कदम ही तय करेगा कि इस धोखे की कहानी का अंत न्याय के साथ होगा या नहीं।
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