Ratan Tata Birthday: न दफ्तर, न कुर्सी… जब पहली जॉब में रतन टाटा ने मजदूरों संग उठाया था फावड़ा, पढ़ें फर्श से अर्श की कहानी
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
28 दिसम्बर 2025, (अपडेटेड 28 दिसम्बर 2025, 10:51 पूर्वाह्न IST)

नीमच/मुंबई: Ratan Tata Birthday आज 28 दिसंबर है, एक ऐसा दिन जो भारतीय उद्योग जगत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। आज Ratan Tata Birthday है। हालांकि, हमारे बीच अब वो भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं (9 अक्टूबर 2024 को उनका निधन हो गया था), लेकिन उनकी विरासत और उनके किस्से आज भी हर भारतीय के दिल में धड़कते हैं।

अक्सर हम रतन टाटा को लग्जरी कारों, बड़े होटलों और हजारों करोड़ की कंपनियों के मालिक के रूप में याद करते हैं। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि चांदी का चम्मच लेकर पैदा होने के बावजूद, उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक ‘मजदूर’ की तरह की थी? आज उनके जन्मदिन पर हम आपके लिए लेकर आए हैं उनके संघर्ष, सादगी और सफलता की वो विस्तृत कहानी, जो किसी भी एमबीए की किताब में नहीं मिलेगी।

Ratan Tata Birthday 1962: जब टाटा के वारिस को मिली ‘मजदूर’ की नौकरी

Ratan Tata Birthday यह कहानी साल 1962 की है। रतन टाटा अमेरिका से आर्किटेक्चर और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके भारत लौटे थे। हर किसी को लगा था कि टाटा परिवार का वारिस है, तो सीधा किसी बड़े वातानुकूलित (AC) केबिन में बैठेगा। लेकिन नियति और जेआरडी टाटा (तत्कालीन चेयरमैन) को कुछ और ही मंजूर था।

जब रतन टाटा ने टाटा स्टील (Tata Steel) जॉइन किया, तो उन्हें कोई एग्जीक्यूटिव पोस्ट नहीं दी गई। उन्हें जमशेदपुर (Jamshedpur) भेजा गया, वह भी सीधा ‘शॉप फ्लोर’ पर। यह वह जगह थी जहां लोहे की भट्टियां धधकती थीं और मजदूर पसीना बहाते थे।

Ratan Tata Birthday पर याद की जाने वाली यह सबसे महत्वपूर्ण घटना है। वहां रतन टाटा ने किसी साहब की तरह नहीं, बल्कि एक आम वर्कमैन की तरह काम किया। उन्होंने वहां:

  • धधकती भट्टियों (Blast Furnace) के पास काम किया।

  • अपने हाथों से फावड़ा चलाया।

  • भट्टियों में चूना पत्थर (Limestone) ढोने का काम किया।

सोचिए, एक व्यक्ति जो भविष्य में अरबों डॉलर के साम्राज्य का मालिक बनने वाला था, वह अपने शुरुआती दिनों में धूल और धुएं के बीच पसीना बहा रहा था। यही वह अनुभव था जिसने रतन टाटा को जमीन से जोड़े रखा।

Ratan Tata Birthday सीखी सबसे बड़ी सीख: “मशीनें नहीं, लोग कंपनी चलाते हैं”

Ratan Tata Birthday जमशेदपुर के उन कठिन दिनों ने रतन टाटा के व्यक्तित्व को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने बाद में कई साक्षात्कारों में स्वीकार किया कि उस जमीनी अनुभव ने उन्हें सिखाया कि कंपनी की असली ताकत उसकी बड़ी-बड़ी मशीनें या बैलेंस शीट नहीं, बल्कि वहां काम करने वाले कर्मचारी होते हैं।

यही वजह थी कि जब वे चेयरमैन बने, तो उन्होंने हमेशा ‘Human Capital’ (मानव संसाधन) को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने टाटा स्टील में काम करने वाले मजदूरों की तकलीफों को खुद महसूस किया था, इसलिए जब भी कंपनी मुश्किल में आई, उन्होंने छंटनी करने के बजाय अपने कर्मचारियों का हाथ थामे रखा। 1989 में जब टाटा स्टील में ऐतिहासिक समझौते हुए, तो उसमें रतन टाटा की इसी सोच की झलक थी।

Ratan Tata Birthday आलोचनाओं का दौर और 1991 का बदलाव

सफलता का रास्ता कभी सीधा नहीं होता। 1970 के दशक में उन्हें नेल्को (NELCO) और एम्प्रेस मिल्स जैसी बीमार (घाटे में चल रही) कंपनियों को संभालने की जिम्मेदारी दी गई। यह दौर उनके लिए अग्निपरीक्षा जैसा था। कई बार उन्हें असफलता मिली और दबी जुबान में उनकी आलोचना भी हुई कि क्या वे जेआरडी टाटा की जगह लेने के लायक हैं?

लेकिन 1991 में जब जेआरडी टाटा ने उन्हें टाटा सन्स का चेयरमैन नियुक्त किया, तो उन्होंने आलोचकों को अपने काम से जवाब दिया। यह वह दौर था जब भारत में उदारीकरण (Liberalization) शुरू हो रहा था। Ratan Tata Birthday के मौके पर उनके इस विजन को याद करना जरूरी है। उन्होंने पुराने ढर्रे पर चल रहे टाटा ग्रुप को आधुनिक बनाया। उन्होंने साल्ट (नमक) से लेकर सॉफ्टवेयर तक, टाटा को हर घर का हिस्सा बना दिया।

इंडिका और नैनो: भारतीय सपनों को दिए पंख

रतन टाटा सिर्फ मुनाफा नहीं देखते थे, वे देश की जरूरत देखते थे।

  1. टाटा इंडिका: जब उन्होंने भारत की अपनी कार (Indigenously designed car) बनाने का सपना देखा, तो दुनिया हंसी थी। लेकिन 1998 में इंडिका लॉन्च करके उन्होंने साबित किया कि भारतीय इंजीनियरिंग ग्लोबल स्तर की है।

  2. टाटा नैनो: एक बार उन्होंने बारिश में एक परिवार को स्कूटर पर भीगते हुए देखा। पति-पत्नी और दो बच्चे, फिसलन भरी सड़क पर असुरक्षित थे। उस दृश्य ने उन्हें इतना विचलित किया कि उन्होंने दुनिया की सबसे सस्ती कार ‘नैनो’ बनाने की ठान ली। भले ही नैनो मार्केट में कम चली हो, लेकिन उसने ‘आम आदमी की कार’ का सपना सच कर दिखाया।

Ratan Tata Birthday विरासत: 100 बिलियन डॉलर का विजन

एक समय फावड़ा चलाने वाले रतन टाटा ने जब 2012 में रिटायरमेंट लिया (हालांकि वे बाद में भी मार्गदर्शक रहे), तब तक टाटा समूह का राजस्व 100 बिलियन डॉलर (अरबों रुपये) को पार कर चुका था। उन्होंने टेटली टी (Tetley Tea), कोरस स्टील (Corus) और जगुआर लैंड रोवर (JLR) जैसे बड़े विदेशी ब्रांड्स को खरीदकर टाटा को एक ग्लोबल सुपरपावर बना दिया।आज Ratan Tata Birthday मनाते हुए हमें उनकी सादगी याद आती है। वे 9 अक्टूबर 2024 को हमें छोड़कर चले गए, लेकिन उनकी दी हुई सीख—

“अगर आप तेज चलना चाहते हैं तो अकेले चलिए, लेकिन अगर आप दूर तक जाना चाहते हैं तो सबको साथ लेकर चलिए” —आज भी हर उद्यमी के लिए मूलमंत्र है।

रतन टाटा का जीवन हमें सिखाता है कि कोई काम छोटा नहीं होता और विनम्रता से बड़ा कोई आभूषण नहीं होता। जमशेदपुर की भट्टी में तपा हुआ वो ‘मजदूर’ ही असली ‘रतन’ बनकर चमका।


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Aakash Sharma
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