बिना रजिस्ट्री वाला पारिवारिक समझौता बंटवारा साबित करने के लिए मान्य: सुप्रीम कोर्ट
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
10 नवम्बर 2025, (अपडेटेड 10 नवम्बर 2025, 8:35 अपराह्न IST)

नई दिल्ली: देश के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे से जुड़े दो महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं पर स्थिति स्पष्ट करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने गुरुवार (6 नवंबर) को कहा कि बिना पंजीकरण (unregistered) के किया गया पारिवारिक समझौता (Family Settlement) भी ‘संयुक्त परिवार की स्थिति समाप्त’ (severance of status) करने के लिए वैध सबूत है, भले ही उसका उपयोग स्वामित्व (title) स्थापित करने के लिए न किया जा सके।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजनिया की खंडपीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के उस निर्णय को पलट दिया, जिसमें पंजीकृत परित्याग विलेख (Registered Relinquishment Deed) और 1972 के पारिवारिक समझौते (Palupatti) के बावजूद संपत्ति को संयुक्त माना गया था।

मुख्य बिंदु: पंजीकृत परित्याग विलेख (Registered Relinquishment Deed) पर स्पष्टता

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संयुक्त परिवार के सहभाजनकर्ता (coparcener) द्वारा किसी प्रतिफल (consideration) के बदले में किया गया पंजीकृत परित्याग विलेख तुरंत प्रभाव से लागू होता है।

“यदि किसी सहभाजनकर्ता ने किसी प्रतिफल के बदले में अपने अधिकारों का परित्याग किया है, तो वह विलेख तुरंत प्रभाव से उसके अधिकार समाप्त कर देता है। इसकी वैधता किसी आगे की कार्रवाई पर निर्भर नहीं करती।”

सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने निचली अदालतों की इस गलती को सुधारा कि पंजीकृत विलेख को “लागू” (enforce) करने के लिए किसी अतिरिक्त प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती।

अहम फैसला: अपंजीकृत पारिवारिक समझौता (Unregistered Family Settlement) अब भी मान्य

सर्वोच्च न्यायालय ने सबसे महत्वपूर्ण फैसला अपंजीकृत पारिवारिक समझौते पर दिया। कोर्ट ने कहा कि अपंजीकृत पारिवारिक समझौते को भले ही स्वामित्व स्थापित करने के लिए इस्तेमाल न किया जा सके, लेकिन यह सीमित (collateral) उद्देश्यों के लिए साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य है।

  • यह समझौता यह साबित करने के लिए मान्य है कि परिवार में संयुक्त स्थिति समाप्त हो गई है।
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू कानून के तहत, संयुक्त परिवार की स्थिति समाप्त करने के लिए केवल एक स्पष्ट घोषणा पर्याप्त है, चाहे वह लिखित हो या मौखिक।
  • पंजीकरण की आवश्यकता तब नहीं होती, जब समझौता केवल यह दिखाता है कि पक्षकारों ने बाद में संपत्तियों का उपयोग और आनंद कैसे लिया।

खंडपीठ ने “संयुक्त स्थिति समाप्त होने” और “भौतिक विभाजन (division by metes and bounds)” के बीच भी अंतर बताया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट अब इस निर्णय के अनुरूप अंतिम डिक्री (final decree) तैयार करे और संपत्ति का सीमांकन (demarcation) ‘मेट्स एंड बाउंड्स’ के आधार पर करे।

यह फैसला पारिवारिक संपत्ति विवादों में एक नया अध्याय शुरू करता है और अपंजीकृत पारिवारिक समझौतों को सीमित कानूनी वैधता प्रदान कर राहत देता है।

 

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Aakash Sharma
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आकाश शर्मा मध्यप्रदेश के नीमच क्षेत्र में सक्रिय पत्रकार और द टाइम्स ऑफ MP के संपादक हैं। उन्हें प्रिंट मीडिया में 12 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव है। लंबे समय से स्थानीय एवं जनसरोकार से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग, समाचार संपादन और समाचार प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उन्होंने स्थानीय पत्रकारिता में व्यापक अनुभव हासिल किया है।द टाइम्स ऑफ MP के माध्यम से आकाश शर्मा नीमच, मंदसौर और आसपास के क्षेत्रों से जुड़ी महत्वपूर्ण खबरों को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। उनकी कवरेज में स्थानीय प्रशासन, पुलिस एवं कानून-व्यवस्था, जनसमस्याएं, नागरिक सुविधाएं, राजनीति, सामाजिक गतिविधियां, शिक्षा, कृषि, व्यापार और अन्य जनहित से जुड़े विषय शामिल हैं।उनकी संपादकीय कार्यशैली में तथ्यपरक रिपोर्टिंग, स्रोत-आधारित जानकारी, निष्पक्ष प्रस्तुति और जिम्मेदार पत्रकारिता को प्राथमिकता दी जाती है। संवेदनशील और अपराध से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग में आरोप और प्रमाणित तथ्य के बीच अंतर बनाए रखने तथा उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर खबर प्रस्तुत करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।पत्रकारिता के साथ आकाश शर्मा पिछले 4 वर्षों से पैरा लीगल वॉलंटियर (PLV) के रूप में भी कार्य कर रहे हैं। इस भूमिका में वे कानूनी जागरूकता और जनहित से जुड़े कार्यों से जुड़े रहे हैं। इसके साथ ही वे इंटरनेशनल ह्यूमन सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशन में जिला उपाध्यक्ष (District Vice President) के दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।अनुभव 12 वर्ष — प्रिंट मीडिया एवं पत्रकारिता का अनुभव 4 वर्ष — पैरा लीगल वॉलंटियर (PLV) के रूप में अनुभव संपादक — द टाइम्स ऑफ MP जिला उपाध्यक्ष — इंटरनेशनल ह्यूमन सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशनआकाश शर्मा का उद्देश्य स्थानीय स्तर की महत्वपूर्ण सूचनाओं को विश्वसनीय, स्पष्ट, तथ्यपरक और जिम्मेदार पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाना तथा आम नागरिकों से जुड़े मुद्दों को प्रभावी मंच प्रदान करना है।विशेषज्ञता: स्थानीय पत्रकारिता | प्रिंट मीडिया | समाचार संपादन | डिजिटल पत्रकारिता | स्थानीय समाचार रिपोर्टिंग | जनहित के मुद्दे | कानूनी जागरूकता |

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