तराना हादसे में 4 साल का मासूम राख, पर ‘नीमच RTO की लापरवाही’ जारी: सवालों से भाग रहे अधिकारी, क्या शहर में है चिताओं के जलने का इंतज़ार?
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
17 मई 2026, (अपडेटेड 17 मई 2026, 6:38 अपराह्न IST)

नीमच (द टाइम्स ऑफ एमपी इन्वेस्टिगेशन डेस्क)। “मैंने दूसरों को तो बचा लिया, लेकिन अपने भविष्य को नहीं बचा पाया…” ये वो दर्दनाक शब्द हैं जो उस बदनसीब पिता अभिषेक जैन के कांपते होठों से निकले, जिसने अपनी आँखों के सामने अपने 4 साल के मासूम बेटे अनय को एक धधकती बस के अंदर राख होते देखा। तराना (शाजापुर-उज्जैन बॉर्डर) के पास एक स्लीपर बस में लगी आग ने पूरे मध्य प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है।

एक हँसता-खेलता परिवार चंद मिनटों में उजड़ गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस दिल दहला देने वाली घटना के बाद नीमच प्रशासन की नींद टूटी है? क्या नीमच RTO की लापरवाही पर कोई लगाम लगी है? इसका सीधा और बेहद कड़वा जवाब है— नहीं।

तराना की सड़क पर जो बस राख के ढेर में तब्दील हुई, वह प्रदेश की कोई इकलौती बस नहीं थी। साफ है कि वैसी ही, बल्कि उससे भी बदतर हालत वाली दर्जनों बसें रोज़ाना नीमच के बस स्टैंड और प्राइवेट ट्रेवल्स के अड्डों से इंदौर, भोपाल और अन्य शहरों के लिए फर्राटे भर रही हैं। मोटर व्हीकल एक्ट के नियम-कानूनों को सरेआम ठेंगा दिखाकर, खुलेआम मौत का सौदा किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि नीमच RTO अपने एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर शायद नीमच में भी किसी ऐसी ही भयानक त्रासदी के होने का इंतज़ार कर रहे हैं।

आज ‘द टाइम्स ऑफ एमपी’ इस पूरे सिस्टम का कच्चा चिट्ठा खोल रहा है। हम बिना किसी लाग-लपेट के सीधे सवाल कर रहे हैं कि आखिर चंद रुपयों के मुनाफे के लिए नीमच की सड़कों पर इन ‘चलते-फिरते ताबूतों’ को दौड़ने की परमिशन कौन दे रहा है?

तराना हादसे का खौफनाक सच: जो नीमच के लिए एक सीधा अलर्ट है

सबसे पहले उस हादसे की क्रोनोलॉजी को समझिए, जिसकी आग की लपटें नीमच के प्रशासनिक गलियारों तक महसूस की जानी चाहिए। इंदौर से शिवपुरी जा रही इंटरसिटी बस (MP07 ZL 9090) में रात के समय एसी की वायरिंग में शॉर्ट सर्किट हुआ। यात्रियों को सफर के दौरान ही जलने की बदबू आ गई थी। उन्होंने बकायदा ड्राइवर और क्लीनर को टोका भी, लेकिन उन्होंने इसे “मामूली बात” कहकर टाल दिया। यानी, इस घटना में मौत का पहला कारण तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि इंसानी लापरवाही थी।

कुछ ही देर में बस आग का एक विकराल गोला बन गई। बस में 50 से ज्यादा यात्री थे और अंदर चीख-पुकार मच गई। धक्का-मुक्की के उस खौफनाक मंजर में 4 साल का अनय सीट के नीचे दब गया। जब लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे, तब वह मासूम कुचला जा रहा था। पिता अभिषेक ने कई लोगों को खींचकर बाहर निकाला, लेकिन जब वह अपने जिगर के टुकड़े की तरफ लपका, तो आग इतनी भयानक हो चुकी थी कि वह उसे बचा नहीं सका।

इस हादसे में तीन सबसे बड़ी तकनीकी खामियां सामने आईं, जो नीमच से चलने वाली 90% से ज्यादा बसों में भी मौजूद हैं:

  • इमरजेंसी गेट का न खुलना: बस में इमरजेंसी गेट तो था, लेकिन वह जाम था और वक्त पर खुला ही नहीं।

  • फायर एक्सटिंग्विशर का न होना: आग बुझाने का कोई उपकरण काम नहीं आया, और जो था उसे स्टाफ को चलाना नहीं आता था।

  • अवैध मॉडिफिकेशन: बस की वायरिंग और इंटीरियर मनमाने ढंग से लोकल स्तर पर तैयार करवाए गए थे, जो पल भर में आग पकड़ लेते हैं।

नीमच में RTO की कुंभकर्णी नींद: ‘सेटिंग’ के खेल में दांव पर लोगों की जान

अब बात करते हैं नीमच की जमीनी हकीकत की। नीमच से रोज़ाना सैकड़ों यात्री स्लीपर और सिटिंग बसों में लंबा सफर करते हैं। तराना हादसे की अखबारी कटिंग पढ़कर आम आदमी सिहर उठा है, लेकिन क्या नीमच RTO या यातायात पुलिस ने बस स्टैंड पर जाकर एक भी बस की सघन चेकिंग की? नीमच RTO की लापरवाही का आलम यह है कि फिटनेस सर्टिफिकेट के नाम पर सिर्फ कागज़ी खानापूर्ति होती है। “फिटनेस” अब यात्रियों की सुरक्षा का पैमाना नहीं, बल्कि ‘सेटिंग और उगाही’ का दूसरा नाम बन चुका है।

नीमच में खुलेआम हो रहे हैं ये मौत के इंतज़ाम:

1. अवैध ‘जुगाड़’ वाले स्लीपर कोच

नीमच से चलने वाली कई बसें चेसिस पर लोकल बॉडी मेकर्स द्वारा बनवाई जाती हैं। बस ऑपरेटर चंद पैसे बचाने के लिए लोकल कुशन, घटिया फोम के गद्दे, सस्ते प्लास्टिक पैनल और सिंथेटिक परदे लगाते हैं। ये सभी चीजें अत्यधिक ज्वलनशील (Highly Combustible) होती हैं। एक छोटी सी चिंगारी इन बसों को चंद सेकंड में भट्टी में बदल देती है। RTO की आँखों के सामने ये मॉडिफाइड बसें रोज़ाना दौड़ रही हैं, लेकिन इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।

2. बिजली का जानलेवा ओवरलोड (मोबाइल चार्जिंग और भारी AC)

यात्रियों को लुभाने के लिए आज बसों में हर सीट पर मोबाइल चार्जिंग पॉइंट, एलईडी लाइटिंग, हैवी म्यूजिक सिस्टम और बड़े एसी कंप्रेसर लगाए जा रहे हैं। लेकिन इनकी वायरिंग सड़क किनारे के अनुभवहीन मैकेनिकों से करवाई जाती है। सस्ती और पतली तारों पर जब एसी और दर्जनों मोबाइल चार्जिंग का लोड पड़ता है, तो तारें गर्म होती हैं और शॉर्ट सर्किट होता है। तराना हादसे का मुख्य कारण भी यही घटिया वायरिंग और शॉर्ट सर्किट था। सवाल यह है कि नीमच से चलने वाली किस बस की ‘इलेक्ट्रिक ऑडिटिंग’ हुई है? जवाब है- किसी की नहीं।

3. इमरजेंसी गेट की जगह ‘मौत की एक्स्ट्रा सीट’ का लालच

यह बस ऑपरेटरों का सबसे बड़ा और जानलेवा अपराध है। मोटर व्हीकल एक्ट के नियमों के अनुसार हर बस में चालू हालत में एक इमरजेंसी गेट होना अनिवार्य है। लेकिन नीमच से चलने वाली कई स्लीपर बसों में इमरजेंसी गेट के ठीक आगे एक अतिरिक्त सीट लगा दी जाती है, ताकि ऑपरेटर एक यात्री का किराया ज्यादा वसूल सके। अगर गेट होता भी है, तो वह जाम रहता है या उस पर लोहे की ग्रिल वेल्ड कर दी जाती है।

जब आग लगती है या बस पलटती है, तो सेंट्रल लॉकिंग फेल हो जाती है। ऐसे में यात्री कांच तोड़कर ही बाहर निकल सकते हैं, लेकिन बसों के टफन ग्लास इतने मोटे होते हैं कि उन्हें तोड़ना आसान नहीं होता। अंदर फंसे लोग सचमुच तंदूर की तरह भुन जाते हैं।

4. दिखावे के लिए फायर एक्सटिंग्विशर और अनट्रेंड स्टाफ

बसों में आग बुझाने वाले यंत्र (Fire Extinguishers) या तो होते ही नहीं हैं, और अगर होते हैं तो वे एक्सपायरी डेट पार कर चुके होते हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बस के ड्राइवर और क्लीनर को उन्हें चलाना ही नहीं आता। जब आग लगती है, तो वे यात्रियों को मरने के लिए छोड़कर सबसे पहले खुद भाग खड़े होते हैं।

सिस्टम का कड़वा सच: हादसों के बाद चंद दिनों की रस्म-अदायगी

मध्य प्रदेश में एक बेहद शर्मनाक “सिस्टम” काम करता है। जब भी कोई बड़ा हादसा होता है (चाहे वह सीधी बस हादसा हो, गुना बस हादसा हो या अब तराना), प्रशासन तुरंत हरकत में आने का नाटक करता है। अचानक से RTO और पुलिस सड़कों पर आ जाते हैं। 2-4 दिन तक बसों की चेकिंग का अभियान चलता है। कुछ बसों के चालान काटे जाते हैं, अखबारों में फोटो छपती हैं कि “प्रशासन सख्त है”। शासन स्तर से भी रटे-रटाए बयान आते हैं कि “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा”

लेकिन 5 दिन बाद? सब कुछ फिर से उसी पुराने ढर्रे पर लौट आता है। चेकिंग अभियान फाइलों में दफन हो जाते हैं, आरटीओ और बस ऑपरेटरों के बीच की ‘मंथली सेटिंग’ फिर से चालू हो जाती है, और मौत के ताबूत फिर से सड़कों पर दौड़ने लगते हैं। हम प्रशासन से पूछना चाहते हैं कि क्या सुरक्षा के नियम सिर्फ हादसे के बाद 4 दिन के लिए होते हैं?

द टाइम्स ऑफ एमपी के 5 सीधे सवाल, जिनका जवाब RTO को देना होगा

हम किसी को खुश करने के लिए पत्रकारिता नहीं करते। जनहित सर्वोपरि है। इसलिए नीमच के जिम्मेदार अधिकारियों से हमारे ये स्पष्ट सवाल हैं:

  1. क्या नीमच बस स्टैंड से चलने वाली 100% बसों में इमरजेंसी गेट क्लियर और चालू हालत में हैं? यदि नहीं, तो वे बसें सड़क पर क्यों हैं?

  2. पिछले 6 महीनों में RTO नीमच ने कितनी बसों का ‘इलेक्ट्रिक और वायरिंग ऑडिट’ किया है?

  3. फिटनेस सर्टिफिकेट किस आधार पर बांटे जा रहे हैं? क्या बस को भौतिक रूप से बिना देखे दलालों के जरिए मुहर लग रही है?

  4. क्षमता से ज्यादा सीटें लगाकर अवैध रूप से स्लीपर में तब्दील की गई कितनी बसों के परमिट पिछले एक साल में रद्द किए गए हैं?

  5. टोल प्लाजा और पुलिस चेकपोस्ट से जब ये ओवरलोडेड बसें गुजरती हैं, तो उन्हें रोककर चेक क्यों नहीं किया जाता?

सवालों से भागते साहब: RTO ने फोन उठाना भी नहीं समझा मुनासिब

जिम्मेदारों की लापरवाही का आलम देखिए। इस पूरे मामले और जनता की सुरक्षा से जुड़े इन सुलगते सवालों पर जब ‘द टाइम्स ऑफ एमपी’ की टीम ने नीमच RTO अधिकारी का पक्ष जानने के लिए उन्हें कॉल किया, तो साहब ने फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा। एक ज़िले के ज़िम्मेदार परिवहन अधिकारी का मीडिया के सवालों से इस तरह कन्नी काटना कोई सामान्य बात नहीं है।

उनकी यह चुप्पी चीख-चीख कर बयां कर रही है कि उनके पास इन खामियों का कोई जवाब नहीं है। जब अधिकारी मीडिया का फोन तक नहीं उठाएंगे, तो एक आम यात्री की शिकायत पर वो क्या ही खाक कार्रवाई करेंगे? यह रवैया ही बता रहा है कि सिस्टम किस कदर सड़ चुका है और ‘सेटिंग’ की जड़ें कितनी गहरी हैं।

ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट्स की चेतावनी: मॉडिफिकेशन ही है असली हत्यारा

ऑटोमोबाइल इंजीनियरों का साफ कहना है कि प्राइवेट बस ऑपरेटर लोकल स्तर पर जो बस की बॉडी तैयार करवाते हैं, वही हादसों की जड़ है। हैवी एसी और जनरेटर से इंजन पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। समय पर मेंटेनेंस न होने के कारण डीजल पाइपलाइन से लीकेज होता है, जो सीधे बस के गर्म हिस्सों या साइलेंसर पर गिरकर भयंकर आग का कारण बनता है। इसके अलावा, इंटीरियर में इस्तेमाल होने वाले सस्ते सर्किट बोर्ड किसी भी समय पिघल सकते हैं। यह कोई तकनीकी रॉकेट साइंस नहीं है, बल्कि बेसिक कॉमन सेंस है जिसे बस ऑपरेटर लालच में नजरअंदाज कर रहे हैं।

बस यात्रियों के लिए अलर्ट: अपनी जान की कीमत खुद समझें

चूंकि प्रशासन गहरी नींद में है और बस ऑपरेटरों को आपकी जान की कोई परवाह नहीं है, इसलिए अब समय आ गया है कि यात्री खुद जागरूक हों:

  • सफर से पहले चेक करें: बस में चढ़ने से पहले देखें कि उसका इमरजेंसी गेट कहाँ है। अगर गेट के आगे सीट लगी है या सामान रखा है, तो बस में सफर करने से साफ इंकार करें।

  • फायर एक्सटिंग्विशर पूछें: सफर शुरू होने से पहले ड्राइवर या कंडक्टर से पूछें कि आग बुझाने का यंत्र कहाँ है।

  • बदबू को इग्नोर न करें: अगर कहीं से भी वायरिंग के जलने की या डीजल की बदबू आए, तो तुरंत बस रुकवाएं। जब तक संतुष्टि न हो, बस को आगे न बढ़ने दें। आपकी जान से कीमती आपका सफर नहीं है।

  • तुरंत शिकायत करें: अगर बस में कोई भी खामी दिखे, तो 112 डायल करें और परिवहन विभाग के हेल्पलाइन नंबर पर शिकायत दर्ज कराएं।

तराना में 4 साल के अनय की जली हुई लाश पूरे सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है। नीमच का RTO महकमा और जिला प्रशासन अगर इस हादसे से भी सबक नहीं लेता है, तो इसका सीधा अर्थ है कि वे जानबूझकर हत्याओं की जमीन तैयार कर रहे हैं। ‘द टाइम्स ऑफ एमपी’ की सीधी मांग है कि दिखावे की कागज़ी कार्रवाई बंद हो। तुरंत एक सघन चेकिंग अभियान शुरू हो और खामी मिलने पर बसों को सीधा कबाड़खाने भेजा जाए। समय आ गया है कि नीमच प्रशासन जागे, इससे पहले कि किसी और ‘अनय’ के राख होने की खबर हमें लिखनी पड़े।


FAQ Section

Q1: तराना बस हादसा क्या है और यह कैसे हुआ?
तराना के पास इंदौर से शिवपुरी जा रही एक स्लीपर बस में एसी की वायरिंग में शॉर्ट सर्किट से भीषण आग लग गई। इस हादसे में 4 साल का एक मासूम बच्चा जिंदा जल गया। आग लगने का मुख्य कारण घटिया वायरिंग और अनदेखी था।

Q2: स्लीपर बसों में आग लगने के मुख्य कारण क्या होते हैं?
बसों में आग लगने के मुख्य कारण अवैध लोकल बॉडी मॉडिफिकेशन, मोबाइल चार्जिंग और AC का ओवरलोड, घटिया क्वालिटी की वायरिंग से होने वाला शॉर्ट सर्किट और डीजल पाइपलाइन में लीकेज होते हैं।

Q3: नीमच में अवैध स्लीपर बसों की शिकायत कहाँ करें?
आप नीमच RTO कार्यालय, यातायात पुलिस या सीधे 112 डायल करके बस के नंबर के साथ अवैध मॉडिफिकेशन या इमरजेंसी गेट ब्लॉक होने की शिकायत कर सकते हैं।

Q4: सफर के दौरान बस में आग लग जाए तो क्या करें?
सबसे पहले घबराएं नहीं। तुरंत इमरजेंसी गेट की तरफ बढ़ें। अगर गेट न खुले, तो बस में रखे हथौड़े (Emergency Hammer) से खिड़की का शीशा कोनों पर वार करके तोड़ें और बाहर निकलें।

Q5: क्या स्लीपर बस में इमरजेंसी गेट के आगे सीट लगाना कानूनी है?
बिल्कुल नहीं। मोटर व्हीकल एक्ट के तहत इमरजेंसी गेट को किसी भी तरह से ब्लॉक करना या उसके आगे एक्स्ट्रा सीट लगाना पूरी तरह से गैर-कानूनी और दंडनीय अपराध है।


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Aakash Sharma
Aakash Sharmahttps://thetimesofmp.com
आकाश शर्मा मध्यप्रदेश के नीमच क्षेत्र में सक्रिय पत्रकार और द टाइम्स ऑफ MP के संपादक हैं। उन्हें प्रिंट मीडिया में 12 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव है। लंबे समय से स्थानीय एवं जनसरोकार से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग, समाचार संपादन और समाचार प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उन्होंने स्थानीय पत्रकारिता में व्यापक अनुभव हासिल किया है।द टाइम्स ऑफ MP के माध्यम से आकाश शर्मा नीमच, मंदसौर और आसपास के क्षेत्रों से जुड़ी महत्वपूर्ण खबरों को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। उनकी कवरेज में स्थानीय प्रशासन, पुलिस एवं कानून-व्यवस्था, जनसमस्याएं, नागरिक सुविधाएं, राजनीति, सामाजिक गतिविधियां, शिक्षा, कृषि, व्यापार और अन्य जनहित से जुड़े विषय शामिल हैं।उनकी संपादकीय कार्यशैली में तथ्यपरक रिपोर्टिंग, स्रोत-आधारित जानकारी, निष्पक्ष प्रस्तुति और जिम्मेदार पत्रकारिता को प्राथमिकता दी जाती है। संवेदनशील और अपराध से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग में आरोप और प्रमाणित तथ्य के बीच अंतर बनाए रखने तथा उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर खबर प्रस्तुत करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।पत्रकारिता के साथ आकाश शर्मा पिछले 4 वर्षों से पैरा लीगल वॉलंटियर (PLV) के रूप में भी कार्य कर रहे हैं। इस भूमिका में वे कानूनी जागरूकता और जनहित से जुड़े कार्यों से जुड़े रहे हैं। इसके साथ ही वे इंटरनेशनल ह्यूमन सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशन में जिला उपाध्यक्ष (District Vice President) के दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।अनुभव 12 वर्ष — प्रिंट मीडिया एवं पत्रकारिता का अनुभव 4 वर्ष — पैरा लीगल वॉलंटियर (PLV) के रूप में अनुभव संपादक — द टाइम्स ऑफ MP जिला उपाध्यक्ष — इंटरनेशनल ह्यूमन सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशनआकाश शर्मा का उद्देश्य स्थानीय स्तर की महत्वपूर्ण सूचनाओं को विश्वसनीय, स्पष्ट, तथ्यपरक और जिम्मेदार पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाना तथा आम नागरिकों से जुड़े मुद्दों को प्रभावी मंच प्रदान करना है।विशेषज्ञता: स्थानीय पत्रकारिता | प्रिंट मीडिया | समाचार संपादन | डिजिटल पत्रकारिता | स्थानीय समाचार रिपोर्टिंग | जनहित के मुद्दे | कानूनी जागरूकता |

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