Hospital: मंदसौर के सरकारी अस्पताल में मोबाइल टॉर्च से हो रहा मरीजों का इलाज, स्वास्थ्य दावों की खुली पोल

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मंदसौर। मध्य प्रदेश सरकार भले ही स्वास्थ्य सेवाओं को वर्ल्ड क्लास और हाई-टेक बनाने के लाख दावे करे, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल उलट है। मंदसौर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं इन दिनों खुद वेंटिलेटर पर हांफती नजर आ रही हैं। हाल ही में मंदसौर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल (Hospital) से एक ऐसी चौंकाने वाली और शर्मनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस चिकित्सालय में मरीजों का इलाज बकायदा मोबाइल की टॉर्च जलाकर किया जा रहा है। यह खौफनाक दृश्य देखकर हर कोई हैरान है कि आखिर हम किस सदी में जी रहे हैं।
जिंदगी के साथ सरेआम खिलवाड़: फ्लैशलाइट में लग रहा कैनुला
मरीजों की जान के साथ सरेआम कैसा खिलवाड़ हो रहा है, इसका सीधा अंदाजा शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात की इस घटना से लगाया जा सकता है। मिली जानकारी के अनुसार, जब रात के समय ड्यूटी पर मौजूद नर्सिंग स्टाफ एक गंभीर मरीज को कैनुला (IV line) लगाने के लिए वार्ड में पहुंचा, तो वहां गहरा अंधेरा छाया हुआ था। पर्याप्त रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण, स्टाफ को मजबूरन अपने मोबाइल की फ्लैशलाइट का सहारा लेना पड़ा।
जरा सोचिए, कम रोशनी में किसी मरीज की नस खोजना और उसमें सुई लगाना कितना बड़ा जोखिम है। यह सीधा-सीधा किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसी स्थिति है। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को इस तरह के भारी दबाव और असुरक्षित माहौल में काम करना पड़ रहा है, जो इस अस्पताल (Hospital) प्रबंधन की घोर लापरवाही और सिस्टम के पूरी तरह से फेल होने को उजागर करता है।
वार्ड फुल, कॉरिडोर और ठंडे फर्श पर रात गुजार रहे मरीज
समस्या सिर्फ बिजली कटौती या बैकअप की ही नहीं है, बल्कि इस सरकारी अस्पताल (Hospital) में जगह का भी भारी संकट पैदा हो गया है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि यहां के तमाम वार्ड पूरी तरह से खचाखच भर चुके हैं। नए मरीजों को भर्ती करने के लिए एक पलंग (बेड) तक नसीब नहीं हो रहा है।
मजबूरी में मरीजों को अस्पताल (Hospital)के ठंडे गलियारों (कॉरिडोर) में शिफ्ट कर जमीन पर गद्दे डालकर लिटाया जा रहा है। मरीजों की शारीरिक तकलीफ तो अपनी जगह है, उनके साथ आए परिजनों की मानसिक स्थिति और भी ज्यादा दयनीय हो चुकी है। वे रात-रात भर मच्छरों के बीच बरामदों के फर्श पर अपनी रातें गुजारने को विवश हैं। एक बेहतर अस्पताल (Hospital) से जो उम्मीदें आम जनता को होती हैं, वे यहां पूरी तरह से दम तोड़ती नजर आ रही हैं।
करोड़ों का भारी-भरकम बजट, लेकिन पावर बैकअप नदारद
हम सब जानते हैं कि हर साल स्वास्थ्य बजट के नाम पर करोड़ों रुपये आवंटित किए जाते हैं। आयुष्मान भारत जैसी बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय योजनाओं का खूब ढिंढोरा पीटा जाता है। लेकिन, जब एक आम और गरीब इंसान इलाज की आस में इस अस्पताल (Hospital) की दहलीज पर कदम रखता है, तो उसे राहत के बजाय सिर्फ परेशानी का ही सामना करना पड़ता है।
करोड़ों रुपये के सालाना बजट वाले इस चिकित्सालय में एक उचित पावर बैकअप या इनवर्टर व्यवस्था का न होना स्वास्थ्य महकमे की लचर कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा तमाचा है। भर्ती मरीजों के परिजनों का स्पष्ट आरोप है कि मूलभूत सुविधाओं का यह अकाल लंबे समय से जारी है, लेकिन जिम्मेदारों की कुंभकर्णी नींद तब तक नहीं टूटती, जब तक कि कोई बड़ी अनहोनी न हो जाए।
प्रशासन की चुप्पी और अधिकारियों का रवैया
इतनी बड़ी घटना सामने आने के बाद भी प्रबंधन और वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से कोई ठोस और संतोषजनक जवाब नहीं आया है। आम जनता सवाल पूछ रही है कि आखिर इस भयंकर लापरवाही की जिम्मेदारी किसकी है? जब एक आम आदमी अपने बीमार परिजन को लेकर अस्पताल (Hospital) पहुंचता है, तो वह एक सुरक्षित और बेहतर माहौल की उम्मीद करता है। लेकिन मंदसौर के इस घटनाक्रम ने लोगों के मन में डर पैदा कर दिया है।
ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों का क्या होगा हाल?
इस घोर अव्यवस्था को लेकर मरीजों और उनके परिजनों में खासा आक्रोश पनप रहा है। उनका साफ कहना है कि जब जिला मुख्यालय पर मौजूद जिले के सबसे बड़े अस्पताल (Hospital)l का यह बदतर हाल है, तो दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों में मौजूद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) की जमीनी स्थिति का तो भगवान ही मालिक होगा। गांवों से लोग बेहतर इलाज की उम्मीद में शहर आते हैं, लेकिन यहां की बदहाली उन्हें और निराश कर देती है।
नागरिकों की प्रशासन से तुरंत कड़ी कार्रवाई की मांग
अब स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने तत्काल प्रभाव से व्यवस्थाओं में सुधार की पुरजोर मांग की है। उनकी प्रमुख मांगों में अतिरिक्त बेड की पर्याप्त व्यवस्था करना, निर्बाध बिजली आपूर्ति के लिए 24 घंटे मजबूत पावर बैकअप सुनिश्चित करना और मरीजों के लिए बुनियादी सुविधाएं तुरंत बहाल करना शामिल है।
अब देखना यह दिलचस्प होगा कि इस गंभीर वाकये के सामने आने के बाद जिला कलेक्टर और स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी क्या कड़े कदम उठाते हैं, या फिर इस अस्पताल (Hospital) की हालत यूं ही राम भरोसे चलती रहेगी।
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