नीमच । नीमच में मंगलवार को उस समय बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया, जब भाजपा शासित नगरपालिका परिषद के ही चार भाजपा पार्षदों ने अपनी परिषद की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। जनसुनवाई में कलेक्टर हिमांशु चंद्रा को सौंपे गए विस्तृत ज्ञापन के बाद जिले की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। पूरे मामले के केंद्र में करोड़ों रुपये मूल्य की नगरपालिका भूमि से जुड़ा चर्चित भूमि विवाद है।
भाजपा पार्षद एवं नगरपालिका अपील समिति सदस्य एडवोकेट शशिकुमार कल्याणी के नेतृत्व में दिए गए ज्ञापन में योजना क्रमांक-18 स्थित भूखंड क्रमांक-15 के कथित अवैध नामांतरण, नियमविरुद्ध लीज नवीनीकरण तथा नगरपालिका की बहुमूल्य भूमि पर कब्जे के गंभीर आरोप लगाए गए। पार्षदों का कहना है कि पूरे मामले में कई स्तरों पर नियमों की अनदेखी हुई है।
भाजपा बोर्ड के खिलाफ भाजपा पार्षदों का मोर्चा
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी बात यह रही कि जिस नगरपालिका परिषद पर सवाल उठाए गए हैं, वहां भाजपा का ही बोर्ड काबिज है और परिषद अध्यक्ष भी भाजपा से ही हैं। ऐसे में सत्ता पक्ष के ही पार्षदों का खुलकर विरोध करना राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।
ज्ञापन में बताया गया कि संबंधित भूखंड वर्ष 1981-90 के दौरान एक विशेष उद्देश्य के लिए आवंटित किया गया था, लेकिन बाद में उसका उपयोग नियमों के विपरीत किया गया। इतना ही नहीं, बिना वैधानिक प्रक्रिया पूरी किए कथित रूप से लीज का नवीनीकरण और नामांतरण तक कर दिया गया।
पार्षदों ने आरोप लगाया कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर भूमि विवाद का मामला है, जिसमें करोड़ों रुपये की नगरपालिका संपत्ति दांव पर लगी हुई है।
भूखंड क्रमांक-15 को लेकर उठे गंभीर सवाल
ज्ञापन में योजना क्रमांक-18 स्थित भूखंड क्रमांक-15 का विशेष उल्लेख किया गया। पार्षदों का आरोप है कि इस बहुमूल्य नगरपालिका भूमि पर कथित रूप से अवैध तरीके से कब्जा कायम रखा गया और संबंधित कार्रवाई नियमों के विपरीत की गई।
उन्होंने कहा कि यदि लीज की शर्तों का उल्लंघन हुआ था, तो नगरपालिका परिषद ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की। पार्षदों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग करते हुए कहा कि दस्तावेजों और रिकॉर्ड की गहराई से जांच होना जरूरी है। उनका कहना है कि इस भूमि विवाद ने नगरपालिका की पारदर्शिता और प्रशासनिक कार्यप्रणाली दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
2019 में लीज निरस्त, फिर भी कब्जा वापसी नहीं
ज्ञापन में यह भी बताया गया कि वर्ष 2019 में संबंधित लीज अनुबंध निरस्त हो चुका था। इसके बावजूद अब तक नगरपालिका परिषद द्वारा भूमि का वास्तविक आधिपत्य वापस नहीं लिया गया। इसी मुद्दे को लेकर भाजपा पार्षदों ने प्रशासन पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि जब परिषद के पक्ष में आदेश मौजूद हैं, तो फिर करोड़ों की भूमि को वापस लेने में देरी क्यों हो रही है।
पार्षदों ने आरोप लगाया कि पूरे भूमि विवाद में कार्रवाई की धीमी रफ्तार कई तरह की शंकाओं को जन्म दे रही है।
फर्जी वसीयत और नियमों के उल्लंघन के आरोप
ज्ञापन में कथित फर्जी वसीयत और अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर किए गए नामांतरण का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। पार्षदों ने कहा कि पूरे मामले में वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई।
उन्होंने दावा किया कि यह मामला पूर्व में न्यायालय में नगरपालिका परिषद के पक्ष में तय हो चुका है और लीज निरस्ती के आदेश भी जारी किए जा चुके हैं। इसके बावजूद कब्जा वापसी और दंडात्मक कार्रवाई नहीं होना कई सवाल खड़े करता है।
कलेक्टर से निष्पक्ष जांच की मांग
जनसुनवाई में पहुंचे पार्षदों ने मांग की कि करोड़ों रुपये मूल्य की उक्त नगरपालिका भूमि को तत्काल परिषद के आधिपत्य में लिया जाए। साथ ही पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह भूमि विवाद आने वाले दिनों में जिले की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है। खास बात यह है कि इस बार आरोप विपक्ष ने नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों ने ही लगाए हैं। अब सबकी नजर जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।
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