मंदसौर। मध्य प्रदेश के गांधीसागर अभयारण्य में इन दिनों छोटे-छोटे पक्षी जंगलों के सबसे बड़े रक्षक बनकर सामने आए हैं। खासकर कठफोड़वा और अन्य कीटभक्षी पक्षी लाखों पेड़ों को अंदर से खोखला करने वाले कीड़ों का सफाया कर रहे हैं। वन विभाग के अनुसार ये “जंगल बचाने वाले पक्षी” पेड़ों को बीमार होने से बचाकर पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
पेड़ों की रक्षा में जुटे पक्षी
जंगलों में मौजूद लकड़ी भेदक भृंग, दीमक और कई हानिकारक कीट पेड़ों को धीरे-धीरे कमजोर कर देते हैं। ऐसे में ब्लैक-रम्प्ड फ्लेमबैक यानी सुनहरा कठफोड़वा अपनी मजबूत चोंच से पेड़ों की छाल तोड़कर इन कीड़ों को बाहर निकालता है और उन्हें खा जाता है। इससे पेड़ लंबे समय तक स्वस्थ बने रहते हैं।
1.5 करोड़ पेड़ों से मिल रही करोड़ों किलो ऑक्सीजन
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार गांधीसागर क्षेत्र में करीब 1.5 करोड़ विकसित पेड़ मौजूद हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि एक विकसित पेड़ सालभर में औसतन 118 किलो ऑक्सीजन छोड़ता है। इस हिसाब से यहां के जंगल हर वर्ष लगभग 177 करोड़ किलो ऑक्सीजन वातावरण में पहुंचा रहे हैं, जो करीब 65 लाख लोगों की जरूरत पूरी करने के बराबर है।
पर्यावरण के असली प्रहरी
डीएफओ संजय रायखेरे ने बताया कि “जंगल बचाने वाले पक्षी” केवल पक्षी नहीं, बल्कि जंगलों की सुरक्षा श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि इनकी संख्या कम हुई तो कीटों का प्रकोप तेजी से बढ़ सकता है, जिससे लाखों पेड़ों पर खतरा मंडराने लगेगा।
ये पक्षी भी निभा रहे बड़ी भूमिका
गांधीसागर अभयारण्य में केवल कठफोड़वा ही नहीं, बल्कि नटहैच, ट्रीक्रीपर, वार्बलर, फ्लाईकैचर और बार्बेट जैसे पक्षी भी पेड़ों की छाल और पत्तियों पर मौजूद कीड़ों को खत्म कर रहे हैं। ये पक्षी प्राकृतिक कीट नियंत्रण प्रणाली की तरह काम करते हैं।
जंगलों के लिए क्यों जरूरी हैं ये पक्षी
जंगल बचाने वाले पक्षी पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में बेहद जरूरी हैं। यदि इनके प्राकृतिक आवास सुरक्षित नहीं रहे तो जंगलों में कीटों का खतरा बढ़ सकता है, जिससे पेड़ों के सूखने और ऑक्सीजन उत्पादन पर बड़ा असर पड़ेगा। यही कारण है कि अब वन विभाग इन पक्षियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दे रहा है।
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