नीमच: नीमच-मंदसौर फोरलेन पर रावतखेड़ा में हाल ही में अग्रवाल ग्रुप की नई कॉलोनी ‘होम टाउन कॉलोनी’ (Home Town Colony) का बड़े जोर-शोर से उद्घाटन हुआ है। खुद को शहर की पहली तथाकथित ‘प्रीमियम टाउनशिप’ बताने वाले इस ‘होम टाउन कॉलोनी’ प्रोजेक्ट ने प्रचार की ऐसी आंधी चलाई है कि हाईवे के सुरक्षा नियम भी उसमें उड़ गए हैं। फोरलेन के बीच बने डिवाइडरों और सड़क के किनारों पर ‘होम टाउन कॉलोनी’ के होर्डिंग और बोर्ड ऐसे सज गए हैं, जैसे हाईवे किसी की निजी संपत्ति हो। विज्ञापनों की इस चकाचौंध में राहगीरों की सुरक्षा और सड़क हादसों का जोखिम प्रशासन को नजर नहीं आ रहा है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल MPRDC (मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम) के जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है, जिनकी नाक के नीचे यह सब हो रहा है और वे मूकदर्शक बने बैठे हैं।
नियम ताक पर, डिवाइडर बने ‘होम टाउन कॉलोनी’ के विज्ञापन का मंच
सड़क सुरक्षा नियमों के तहत हाईवे के डिवाइडर पर किसी भी प्रकार के निजी बोर्ड या होर्डिंग लगाना पूर्णतः वर्जित है। इसके पीछे स्पष्ट वैज्ञानिक और सुरक्षा कारण हैं, क्योंकि इससे तेज गति से आ रहे वाहन चालकों का ध्यान भटकता है और गंभीर दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है। अग्रवाल ग्रुप (इंदौर) के भरोसे का दावा करने वाली इस ‘होम टाउन कॉलोनी’ के बोर्ड हाईवे पर सीना ताने खड़े हैं।

ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि हाईवे पर प्रतिदिन पेट्रोलिंग कर निगरानी का दावा करने वाले अमले को ये अवैध बोर्ड क्यों नजर नहीं आते? क्या रसूखदार प्रोजेक्ट्स के लिए नियमों के चश्मे का नंबर बदल जाता है? एक तरफ प्रशासन सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाकर खानापूर्ति करता है, वहीं दूसरी तरफ फोरलेन के बीचों-बीच मौत को दावत देते इन विज्ञापनों पर आंखें मूंद ली जाती हैं।
19 अगस्त का आश्वासन, 1 सितंबर तक हवा-हवाई, अधिकारी ने नहीं उठाया फोन
सिस्टम की सुस्ती का आलम यह है कि जब 19 अगस्त को इस नियम विरुद्ध कार्य की ओर MPRDC के अधिकारी राहुल बर्डे का ध्यान आकर्षित कराया गया, तो उन्होंने बड़ी तत्परता से कहा था— “अगर ऐसा है तो मैं आज ही गाड़ी भिजवा कर हटवाता हूं।”
आज 1 सितंबर हो चुका है। 14 दिन बीतने के बाद भी ‘होम टाउन कॉलोनी’ के वो बोर्ड अपनी जगह पर ‘अंगद के पैर’ की तरह जमे हुए हैं। अधिकारी महोदय की वह ‘गाड़ी’ शायद आज तक फोरलेन का रास्ता ही नहीं ढूंढ पाई है। हद तो तब हो गई जब 14 दिन बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर, 1 सितंबर को हमने MPRDC अधिकारी राहुल बर्डे से फिर संपर्क करना चाहा, लेकिन उन्होंने हमारा फोन उठाना ही मुनासिब नहीं समझा।
शायद उनके पास अपनी इस नाकामी या ‘चुप्पी’ का कोई जवाब ही नहीं बचा है। डेढ़ महीने से अधिक का समय गुजर जाने और स्पष्ट शिकायत के बावजूद, अधिकारियों की यह खामोशी कई गंभीर सवालों को जन्म देती है। क्या प्रशासन किसी भारी दबाव में है या यह किसी अघोषित मौन स्वीकृति का नतीजा है?
‘होम टाउन कॉलोनी’ के ‘प्रीमियम’ दावे और पारदर्शिता पर उठते सवाल
शहर के भीतर भी ‘होम टाउन कॉलोनी’ के विज्ञापन वाले होर्डिंग जगह-जगह देखे जा सकते हैं। जब एक प्रोजेक्ट अपनी शुरुआत और प्रचार में ही फोरलेन के स्पष्ट नियमों की इतनी सहजता से अनदेखी कर सकता है, तो आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ‘होम टाउन कॉलोनी’ प्रोजेक्ट के अन्य विकास कार्यों, लेआउट और अनुमतियों (T&CP, RERA आदि) में पूरी पारदर्शिता बरती गई होगी? नियम-कायदों को लेकर जो तस्वीर बाहर हाईवे पर दिख रही है, उससे ग्राहकों और निवेशकों के बीच संशय का माहौल बनना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
‘प्रीमियम’ हवा बनाम इथेनॉल की बदबूदार हकीकत!
‘होम टाउन कॉलोनी’ की इस पूरी ‘प्रीमियम’ कहानी का सबसे बड़ा और तीखा व्यंग्य इसकी भौगोलिक स्थिति है। शहर से दूर बसी इस कॉलोनी के बेहद करीब एक इथेनॉल फैक्ट्री संचालित होती है। इस फैक्ट्री से उठने वाली भयंकर बदबू ने आसपास के कई किलोमीटर दूर तक के गांवों का जीना पहले से ही मुहाल किया हुआ है। प्रदूषण और दुर्गंध की शिकायतें आए दिन प्रशासन के पास पहुंचती रहती हैं।
ऐसे में बदबू के इस साये से महज चंद कदमों की दूरी पर ‘होम टाउन’ में करोड़ों के ‘प्रीमियम’ प्लॉट लेकर आशियाना बनाने का फैसला किसी तपस्या से कम नहीं होगा। जो हवा दिन-रात लोगों को परेशान करती हो, उस वातावरण में सुकून की सांस लेने का सपना बेचना मार्केटिंग का कोई बड़ा चमत्कार ही कहा जा सकता है। क्या यहाँ घर बनाने वाले लोग ताजी हवा के बजाय इथेनॉल की बदबू के साथ समझौता करने के लिए तैयार हैं?
कंपनी का पक्ष: साहब ने फोन उठाया नहीं, मार्केटिंग टीम ने वेंडर पर फोड़ा ठीकरा
जब ‘होम टाउन’ के इस पूरे गोलमाल पर कंपनी का पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो वहां से भी निराशा ही हाथ लगी।
अधिकारी की चुप्पी: कंपनी के जिम्मेदार अधिकारी मयंक अग्रवाल से फोन पर संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल का जवाब देना जरूरी नहीं समझा।
मार्केटिंग टीम का बेतुका तर्क: इसके बाद जब मार्केटिंग टीम के संदीप सांघवी से बात की गई, तो उनका जवाब बेहद हास्यास्पद था। उन्होंने बड़ी आसानी से सारा ठीकरा ‘वेंडर’ के सिर फोड़ते हुए कहा कि ‘ये बोर्ड वेंडर ने लगाए हैं और उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है’।
जब उनसे उस ‘अज्ञात’ वेंडर की जानकारी मांगी गई जिसने हाईवे के नियमों की धज्जियां उड़ा दी हैं, तो सांघवी गोलमोल जवाब देने लगे। वेंडर का नाम बताने के बजाय उन्होंने बड़ी सफाई से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। अब यह अपने आप में एक बड़ा मजाक है कि खुद को ‘प्रीमियम टाउनशिप’ बताने वाले इतने बड़े ‘होम टाउन’ प्रोजेक्ट की मार्केटिंग टीम को यही नहीं पता कि उनके विज्ञापन कौन, कहां और कैसे लगा रहा है! क्या कंपनी के विज्ञापन हवा में अपने आप लग रहे हैं, या फिर यह सवालों और जवाबदेही से बचने का कोई नया तरीका है?
बड़ा सवाल
क्या प्रशासन किसी बड़े सड़क हादसे का इंतजार कर रहा है, या फिर हाईवे की सुरक्षा को ‘होम टाउन’ के रसूखदार विज्ञापनों के हवाले हमेशा के लिए छोड़ दिया जाएगा? नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई कब होगी? जनता जवाब मांग रही है।
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