Rs. vs USD 90 के पार: GDP के ‘गुब्बारे’ की हवा निकाल रहा गिरता रुपया! क्या हम पाकिस्तान के साथ ‘C’ ग्रेड में खड़े हैं?
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
03 दिसम्बर 2025, (अपडेटेड 03 दिसम्बर 2025, 3:00 अपराह्न IST)

नीमच | विशेष रिपोर्ट: देश की संसद में तालियां बज रही हैं कि “भारत दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है” और हमारी GDP रॉकेट की रफ़्तार से भाग रही है। लेकिन बुधवार को मुद्रा बाज़ार (Forex Market) ने इस जश्न में भंग डाल दिया। Rs. vs USD (रुपया बनाम डॉलर) के ऐतिहासिक युद्ध में भारतीय रुपया चारों खाने चित हो गया और शर्मनाक रिकॉर्ड बनाते हुए 90 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया।

यह गिरावट सामान्य नहीं है। यह उस वक्त हो रही है जब सरकार दावा कर रही है कि देश ‘अमृतकाल’ में है। जनता और निवेशक अब एक ही सवाल पूछ रहे हैं: “अगर देश की इकोनॉमी ‘शेर’ है, तो करेंसी ‘भीगी बिल्ली’ क्यों बन गई है?”

विरोधाभास: बढ़ती GDP और रसातल में जाता रुपया

आंकड़े झूठ नहीं बोलते, लेकिन सरकार के दावे और ज़मीनी हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क आ गया है।

  • सरकारी दावा: भारत 7% की दर से बढ़ रहा है, हम ग्लोबल पावर बन रहे हैं।

  • कड़वी हकीकत: Rs. vs USD के चार्ट पर नजर डालें तो रुपया एशिया की “सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं” (Worst Performing Currency) में शामिल हो गया है।

अर्थशास्त्री हैरान हैं। नियम कहता है कि जिस देश की GDP मजबूत होती है, उसकी करेंसी भी मजबूत होनी चाहिए। लेकिन भारत में उल्टा हो रहा है। रुपये का 90 के पार जाना यह साबित करता है कि हमारी तथाकथित ‘ग्रोथ’ खोखली है और पूरी तरह से आयात (Import) पर निर्भर है। हम विदेश से सामान खरीदकर अपनी GDP बढ़ा रहे हैं, और उसी खरीदारी में देश की करेंसी की बलि चढ़ रही है।

शर्मनाक तुलना: क्या हम ‘C’ ग्रेड लिस्ट में शामिल?

बाज़ार के गलियारों में अब दबी जुबान में वह चर्चा हो रही है, जो किसी भी भारतीय को चुभ सकती है। करेंसी की स्थिरता और प्रदर्शन (Currency Performance) के मामले में भारत को अब ‘C’ ग्रेड देशों की कतार में देखा जा रहा है।

  • हैरानी की बात यह है कि गिरावट की रफ़्तार में भारतीय रुपये की तुलना पाकिस्तान और अन्य संघर्षरत अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं से होने लगी है।

  • भले ही हमारी इकोनॉमी का साइज़ पाकिस्तान से बहुत बड़ा है, लेकिन करेंसी के ‘टूटने की रफ़्तार’ में हम अपने पड़ोसियों से होड़ लगा रहे हैं। Rs. vs USD में आई 5% की गिरावट ने ग्लोबल इन्वेस्टर्स की नजरों में भारत की साख (Rating) पर गहरा बट्टा लगा दिया है।

100% असली आंकड़े: गिरावट के 5 बड़े गुनहगार

रुपये की इस दुर्दशा के पीछे कोई “विदेशी साजिश” नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक कारण हैं जिन्हें नकारा नहीं जा सकता:

1. विदेशी निवेशकों (FPI) का ऐतिहासिक विश्वासघात ($17 अरब की निकासी) रुपये की कमर तोड़ने का सबसे बड़ा कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) हैं। इस साल विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाज़ार से लगभग 17 अरब डॉलर (करीब 1.4 लाख करोड़ रुपये) निकाल लिए हैं। जब निवेशक देश छोड़कर भागते हैं, तो इसका साफ़ मतलब है कि उन्हें आपकी “GDP ग्रोथ” की कहानी पर अब भरोसा नहीं रहा।

2. व्यापार घाटा (Trade Deficit) का विस्फोट अक्टूबर के आंकड़े गवाह हैं कि भारत का माल व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है। हम दुनिया को सामान बेचने (निर्यात) में फेल हो रहे हैं और खरीदने (आयात) में रिकॉर्ड बना रहे हैं। अमेरिका के भारी टैरिफ और सोने के आयात में उछाल ने Rs. vs USD के संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया है।

3. अमेरिका की ‘टैरिफ वॉर’ अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50% तक आयात शुल्क लगाने के संकेत दिए हैं। इससे भारत का निर्यात सेक्टर सदमे में है। जब निर्यात नहीं होगा, तो डॉलर देश में आएगा कैसे? डॉलर की किल्लत ने रुपये को ‘वेंटिलेटर’ पर ला दिया है।

4. हेजिंग (Hedging) का डर बाज़ार में डर (Panic) का माहौल है। Rs. vs USD 90 होते ही आयातक (Importers) बदहवास होकर डॉलर खरीद रहे हैं ताकि भविष्य के और बड़े नुकसान से बच सकें। वहीं, निर्यातक अपना डॉलर बाज़ार में नहीं ला रहे। इस असंतुलन ने आग में घी का काम किया है।

5. RBI के हाथ बंधे रिज़र्व बैंक (RBI) ने रुपये को बचाने की कोशिश की, लेकिन डॉलर की मांग ‘सुनामी’ बन चुकी है। केंद्रीय बैंक की फॉरवर्ड मार्केट में 63.4 अरब डॉलर की शॉर्ट पोजीशन यह बताती है कि अब RBI के पास भी दखल देने की गुंजाइश खत्म हो रही है।

आम आदमी पर क्या होगा असर?

सरकार GDP के आंकड़े दिखाकर अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन Rs. vs USD 90 के पार जाने का दर्द आपकी रसोई में दिखेगा:

  • पेट्रोल-डीजल: भारत 85% तेल बाहर से खरीदता है। डॉलर महंगा मतलब तेल महंगा। चुनाव खत्म होते ही पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ना तय मानिए।

  • महंगाई: जब डीजल महंगा होगा, तो मालभाड़ा बढ़ेगा, जिससे सब्जी, दूध और राशन महंगा होगा।

  • ब्याज दरें: गिरते रुपये को थामने के लिए RBI को ब्याज दरें ऊँची रखनी पड़ेंगी। यानी आपकी होम लोन और कार लोन की EMI कम होने का सपना फ़िलहाल भूल जाइये।

निष्कर्ष: सिर्फ कागजों पर GDP बढ़ने से देश अमीर नहीं होता। अगर आपकी करेंसी की वैल्यू रद्दी के भाव हो रही है, तो दुनिया के बाज़ार में आपकी हैसियत घट रही है। Rs. vs USD का 90 के पार जाना सरकार के लिए ‘चेतावनी’ नहीं, बल्कि ‘इमरजेंसी सायरन’ है।


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Aakash Sharma
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