प्राकृतिक खेती का ये फॉर्मूला बना वरदान, नीमच का किसान बना मिसाल

फूलपुरा के किसान प्रकाश खूंवार ने प्राकृतिक खेती अपनाकर बदली अपनी तकदीर, अब कम लागत में बेहतर उत्पादन के साथ दूसरे किसानों के लिए भी बने प्रेरणा

मनासा। क्या खेती में हर साल बढ़ता खर्च कम किया जा सकता है? क्या बिना महंगे रासायनिक खाद और कीटनाशकों के भी अच्छी पैदावार हासिल की जा सकती है? इन सवालों का जवाब नीमच जिले के मनासा विकासखंड के ग्राम फूलपुरा के किसान प्रकाश खूंवार की कहानी देती है। प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उन्होंने न केवल खेती की लागत में भारी कमी की, बल्कि उत्पादन और मुनाफे में भी सकारात्मक बदलाव देखा। आज उनकी सफलता आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा का विषय बन गई है।

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कुछ वर्ष पहले तक प्रकाश खूंवार भी अन्य किसानों की तरह रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भर थे। हर सीजन में खेती की लागत बढ़ती जा रही थी और इसके साथ खेत की मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी लगातार कमजोर हो रही थी। बढ़ते खर्च और घटती गुणवत्ता ने उन्हें खेती का नया विकल्प तलाशने के लिए मजबूर किया। इसी दौरान उन्होंने प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ाया और यही फैसला उनकी खेती की दिशा बदलने वाला साबित हुआ।

हर साल हजारों रुपये खर्च होते थे रासायनिक खाद पर

प्रकाश खूंवार के अनुसार वे अपनी लगभग 10 बीघा कृषि भूमि पर गेहूं सहित अन्य फसलों की खेती करते हैं। पहले खेती के लिए डीएपी, यूरिया, सुपर फॉस्फेट और अन्य रासायनिक उर्वरकों का उपयोग किया जाता था। इन पर हर वर्ष करीब 60 हजार रुपये तक खर्च करना पड़ता था।

इतना खर्च करने के बावजूद मिट्टी की गुणवत्ता लगातार प्रभावित हो रही थी। खेतों की उर्वरा शक्ति कम होने लगी थी और उत्पादन लागत भी बढ़ती जा रही थी। ऐसे में खेती से होने वाला लाभ अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिल पा रहा था।

प्रशिक्षण से मिली नई सोच, बदल दिया खेती का तरीका

करीब तीन वर्ष पहले प्रकाश खूंवार संस्था सॉलिडेरिडाड द्वारा आयोजित पुनर्योजी कृषि प्रशिक्षण से जुड़े। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें प्राकृतिक खेती की तकनीकों, मिट्टी की सेहत सुधारने के उपाय और स्थानीय संसाधनों से जैविक उत्पाद तैयार करने की जानकारी दी गई।

प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्होंने अपने खेत में रासायनिक खादों का उपयोग धीरे-धीरे कम करना शुरू किया। इसके स्थान पर घर पर ही नीमास्त्र और घनजीवामृत तैयार करना शुरू किया। साथ ही खेत पर वर्मी कम्पोस्ट यूनिट भी स्थापित की, जिससे जैविक खाद का उत्पादन स्वयं करने लगे।

वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत से सुधरी मिट्टी की गुणवत्ता

प्रकाश खूंवार नियमित रूप से वर्मी कम्पोस्ट में जीवामृत मिलाकर उसे आवश्यक नमी में रखते हैं। इससे कम्पोस्ट में सूक्ष्म जीव सक्रिय बने रहते हैं, जो मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में मदद करते हैं।

उनका कहना है कि पहले जहां खेत की मिट्टी सख्त होती जा रही थी, वहीं अब उसमें सुधार दिखाई देने लगा है। मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होने से फसलों की बढ़वार भी पहले की तुलना में अच्छी हो रही है। प्राकृतिक खेती के इस तरीके से उन्हें रासायनिक उत्पादों पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा है।

80 प्रतिशत तक घट गई खेती की लागत

प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद सबसे बड़ा बदलाव खेती की लागत में देखने को मिला। पहले जहां रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर लगभग 60 हजार रुपये खर्च होते थे, वहीं अब खेती का कुल खर्च घटकर करीब 12 हजार रुपये रह गया है।

यानी पहले की तुलना में लगभग 80 प्रतिशत तक लागत कम हो गई है। इससे खेती पहले की अपेक्षा अधिक लाभकारी साबित हो रही है। कम खर्च होने से आर्थिक दबाव भी कम हुआ है और खेती का लाभ बढ़ा है।

कम लागत में बेहतर उत्पादन भी मिल रहा

प्रकाश खूंवार बताते हैं कि वर्तमान में उनकी 4 से 5 बीघा भूमि से करीब 55 से 60 बोरी गेहूं का उत्पादन प्राप्त हो रहा है। प्राकृतिक तरीके से तैयार होने वाली उपज की बाजार में अच्छी मांग भी मिल रही है।

रसायनमुक्त उत्पादन होने के कारण उपज की गुणवत्ता बेहतर मानी जा रही है, जिससे उचित मूल्य मिलने में भी मदद मिल रही है। इससे खेती की आमदनी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

दूसरे किसानों को भी कर रहे प्रेरित

अपनी सफलता के बाद प्रकाश खूंवार अब अपने गांव और आसपास के क्षेत्रों के किसानों को भी प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि किसान धीरे-धीरे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करें और मिट्टी की सेहत को प्राथमिकता दें, तो खेती लंबे समय तक लाभकारी बनी रह सकती है।

वे किसानों को वर्मी कम्पोस्ट, घनजीवामृत और नीमास्त्र तैयार करने की जानकारी भी साझा कर रहे हैं, ताकि अधिक से अधिक किसान कम लागत वाली खेती की ओर बढ़ सकें।

संस्था ने बताया क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल

संस्था सॉलिडेरिडाड के महाप्रबंधक डॉ. सुरेश मोटवानी ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खेती में रासायनिक निर्भरता कम करने के आह्वान के अनुरूप भारत-यूरोपीय संघ साझेदारी कार्यक्रम के तहत किसानों को पुनर्योजी कृषि से जोड़ा जा रहा है।

उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य किसानों को ऐसी खेती की ओर प्रेरित करना है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहे, उत्पादन लागत कम हो और खेती अधिक टिकाऊ बन सके। उनके अनुसार प्रकाश खूंवार इस अभियान के सफल और प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आए हैं।

किसानों के लिए बना प्रेरणादायक मॉडल

फूलपुरा के किसान प्रकाश खूंवार की यह सफलता बताती है कि सही प्रशिक्षण, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाकर खेती की लागत में बड़ी कमी लाई जा सकती है। साथ ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखते हुए बेहतर उत्पादन भी प्राप्त किया जा सकता है।

उनकी यह पहल अब क्षेत्र के कई किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है। यदि अधिक किसान इस दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो कम लागत और टिकाऊ खेती का मॉडल ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत हो सकता है।


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