1 बड़ा फैसला: Mahakal VIP Entry Case में सुप्रीम कोर्ट की दोटूक, अब कलेक्टर ही करेंगे फैसला!
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
27 जनवरी 2026, (अपडेटेड 27 जनवरी 2026, 1:57 अपराह्न IST)

उज्जैन। धार्मिक आस्था और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच चल रहे Mahakal VIP Entry Case में देश की सर्वोच्च अदालत ने मंगलवार को एक युगांतकारी फैसला सुनाया है। उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग भगवान महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। न्यायालय ने इंदौर हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया, जिसमें मंदिर की दर्शन व्यवस्था और वीआईपी प्रोटोकॉल का सर्वाधिकार उज्जैन कलेक्टर को सौंपा गया था।

इस फैसले के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि मंदिर के भीतर कौन ‘अति विशिष्ट’ है और किसे गर्भगृह में प्रवेश मिलेगा, इसका अंतिम फैसला प्रशासनिक विवेक पर निर्भर करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

Mahakal VIP Entry Case की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति की पीठ ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों को सुना, लेकिन अंततः हाईकोर्ट के निर्णय को ही सर्वोपरि माना। इंदौर के अधिवक्ता चर्चित शास्त्री और दर्पण अवस्थी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी मुख्य आपत्ति इस बात पर थी कि मंदिर में ‘वीआईपी कल्चर’ के कारण आम श्रद्धालु उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

याचिका में आरोप लगाया गया था कि जहां एक ओर आम जनता को घंटों लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है और उन्हें केवल बाहर से दर्शन मिलते हैं, वहीं रसूखदार लोग बिना किसी बाधा के गर्भगृह में जाकर अभिषेक कर रहे हैं। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा मानते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

कलेक्टर की शक्तियों में इजाफा

इस न्यायिक आदेश के बाद Mahakal VIP Entry Case में उज्जैन कलेक्टर की भूमिका सबसे अहम हो गई है। हाईकोर्ट ने पूर्व में स्पष्ट किया था कि मंदिर के भीतर भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की है। अदालत के अनुसार, यदि कलेक्टर किसी विशेष परिस्थिति या प्रोटोकॉल के तहत किसी व्यक्ति को अनुमति देते हैं, तो वह ‘वीआईपी’ की श्रेणी में आएगा। इसका अर्थ यह है कि अब मंदिर समिति और कलेक्टर ही दर्शन के नियमों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाल सकेंगे। न्यायालय का मानना है कि लाखों लोगों की सुरक्षा को केवल किताबी नियमों से नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत देखकर ही नियंत्रित किया जा सकता है।

2.5 साल से जारी है गर्भगृह का इंतजार

Mahakal VIP Entry Case की जड़ें उस फैसले में छिपी हैं, जो जुलाई 2023 में लिया गया था। सावन के महीने में श्रद्धालुओं के बढ़ते दबाव को देखते हुए प्रशासन ने 4 जुलाई 2023 से 11 सितंबर 2023 तक गर्भगृह में प्रवेश पूरी तरह बंद किया था। हालांकि, सावन बीतने के बाद भी यह प्रतिबंध नहीं हटाया गया। वर्तमान में करीब ढाई साल बीत चुके हैं और आम श्रद्धालु केवल गणेश मंडपम, कार्तिकेय मंडपम और नंदी हॉल से ही दर्शन कर पा रहे हैं। पहले 1,500 रुपये की रसीद पर गर्भगृह में जाने की व्यवस्था थी, जो फिलहाल आम भक्तों के लिए बंद है।

‘महाकाल लोक’ का प्रभाव और बढ़ती भीड़

अक्टूबर 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘महाकाल लोक’ के भव्य लोकार्पण के बाद उज्जैन में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है। आंकड़ों की मानें तो महाकाल लोक बनने से पहले रोजाना 20 से 30 हजार लोग आते थे, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 1.5 से 2 लाख प्रतिदिन हो गई है। त्यौहारों पर यह आंकड़ा 5 लाख तक पहुंच जाता है। Mahakal VIP Entry Case में प्रशासन ने भी यही दलील दी है कि इतने छोटे गर्भगृह में इतनी बड़ी संख्या में लोगों को प्रवेश देना किसी भी हादसे को दावत देने जैसा हो सकता है। सुरक्षा और सुगम दर्शन के बीच संतुलन बनाना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच खींचतान

राजनीतिक गलियारों में भी Mahakal VIP Entry Case गूंज रहा है। उज्जैन के सांसद अनिल फिरोजिया और महापौर ने भी मुख्यमंत्री मोहन यादव से इस विषय पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है। जनप्रतिनिधियों का तर्क है कि जब वीआईपी और नेता गर्भगृह में जा सकते हैं, तो आम जनता को केवल बाहर से दर्शन क्यों कराए जा रहे हैं? इस सामाजिक और राजनीतिक दबाव के बीच सुप्रीम कोर्ट का फैसला प्रशासन के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया है, क्योंकि अब उनके पास न्यायिक सुरक्षा कवच है।

सुरक्षा और श्रद्धा के बीच का रास्ता

अंततः, Mahakal VIP Entry Case केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भक्तों की आस्था और उनकी सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट ने कलेक्टर को अधिकार देकर यह सुनिश्चित किया है कि मंदिर की व्यवस्था सुचारू रहे। हालांकि, प्रशासन के लिए अब यह नैतिक जिम्मेदारी होगी कि वे ‘वीआईपी’ शब्द का उपयोग केवल अनिवार्य प्रोटोकॉल के लिए करें, न कि इसे किसी भेदभाव का जरिया बनाएं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कलेक्टर इस नई शक्ति का उपयोग करते हुए आम भक्तों के लिए गर्भगृह के द्वार खोलने का कोई मध्यम मार्ग निकालते हैं या नहीं।


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Aakash Sharma
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