सोयाबीन में पीला मोजेक: पत्तियों पर दिखा ये संकेत तो बढ़ सकती है परेशानी!
Reported by: News Desk | Edited by: आकाश शर्मा
06 सितम्बर 2026, (अपडेटेड 06 सितम्बर 2026, 11:53 पूर्वाह्न IST)

मध्य प्रदेश | सोयाबीन की फसल में सोयाबीन में पीला मोजेक और मोजेक रोग का खतरा किसानों की चिंता बढ़ा सकता है। फसल की ऊपरी पत्तियों पर पीले-हरे रंग का चितकबरापन, पत्तियों का मुड़ना या सिकुड़ना दिखाई दे तो किसान इसे सामान्य न समझें। ICAR-राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान ने ऐसे लक्षण दिखाई देने पर फसल की निगरानी बढ़ाने और रोगग्रस्त पौधों को हटाने की सलाह दी है।

रोग की शुरुआत कुछ पौधों से हो सकती है। ऐसे में शुरुआती लक्षणों की पहचान और समय पर नियंत्रण के उपाय महत्वपूर्ण हो जाते हैं। उपलब्ध कृषि सलाह के मुताबिक सफेद मक्खी और एफिड जैसे कीट भी रोग के प्रसार में भूमिका निभा सकते हैं।

पत्तियों पर ये बदलाव दिखें तो रहें सावधान

सोयाबीन में पीला मोजेक की पहचान के लिए किसानों को सबसे पहले पत्तियों पर नजर रखनी चाहिए। संक्रमित पौधों की ऊपरी पत्तियों पर पीले और हरे रंग के मिले-जुले निशान दिखाई दे सकते हैं। इसके साथ पत्तियां मुड़ने, सिकुड़ने या कुरकुरी होने लग सकती हैं। कुछ मामलों में प्रभावित पौधों की बढ़वार भी रुक सकती है। शुरुआत में ये लक्षण खेत के कुछ चुनिंदा पौधों पर नजर आ सकते हैं।

किसानों को इन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए

  • पत्तियों पर पीले-हरे चितकबरे निशान
  • पत्तियों का मुड़ना
  • पत्तियों का सिकुड़ना
  • पत्तियों का कुरकुरा होना
  • पौधे की बढ़वार प्रभावित होना

रोगग्रस्त पौधे जड़ सहित निकालें

ICAR-राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान की सलाह के अनुसार रोग के संदिग्ध या संक्रमित पौधों की पहचान होने पर उन्हें खेत में छोड़ना नहीं चाहिए। ऐसे पौधों को जड़ सहित उखाड़कर खेत से बाहर ले जाकर सुरक्षित तरीके से नष्ट करने की सलाह दी गई है। केवल संक्रमित पत्तियों को तोड़ देना पर्याप्त नहीं माना गया है। पूरे रोगग्रस्त पौधे को हटाने से खेत में संक्रमण के संभावित प्रसार को कम करने में मदद मिल सकती है।

सफेद मक्खी और एफिड पर भी नजर जरूरी

रोग प्रबंधन में केवल संक्रमित पौधों को हटाना ही पर्याप्त नहीं है। सफेद मक्खी और एफिड जैसे कीट संक्रमित पौधों से वायरस लेकर स्वस्थ पौधों तक पहुंचा सकते हैं। इसलिए किसानों को खेत में इन कीटों की मौजूदगी पर भी लगातार नजर रखनी चाहिए। यदि इनकी संख्या बढ़ती दिखाई दे तो अनुशंसित कीटनाशक विकल्पों में से किसी एक का इस्तेमाल किया जा सकता है।

कीट नियंत्रण के लिए बताए गए विकल्प

उपलब्ध कृषि सलाह के मुताबिक सफेद मक्खी और एफिड के नियंत्रण के लिए अलग-अलग विकल्प बताए गए हैं। थायामेथोक्सम और लैम्ब्डा-सायहेलोथ्रिन के मिश्रण का 125 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव किया जा सकता है। इसके अलावा बीटा-सायफ्लुथ्रिन और इमिडाक्लोप्रिड के मिश्रण का 350 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने का विकल्प बताया गया है।

वहीं एसिटामिप्रिड 25 प्रतिशत और बाइफेंथ्रिन 25 प्रतिशत WG के मिश्रण की मात्रा 250 ग्राम प्रति हेक्टेयर बताई गई है। यह विकल्प सफेद मक्खी और एफिड के साथ तना मक्खी के नियंत्रण में भी मदद कर सकता है।

ध्यान रखें: एक समय में किसी एक विकल्प का ही इस्तेमाल करना चाहिए।

पीले स्टिकी ट्रैप से भी निगरानी

सफेद मक्खी की निगरानी और नियंत्रण के लिए खेत में पीले स्टिकी ट्रैप लगाए जा सकते हैं। इन्हें अलग-अलग स्थानों पर लगाने से कीटों की मौजूदगी का पता लगाने में मदद मिल सकती है। किसानों को इन ट्रैप की नियमित जांच करनी चाहिए। यदि बड़ी संख्या में कीट फंसे दिखाई दें तो संबंधित हिस्से की फसल का बारीकी से निरीक्षण किया जाना चाहिए।

छिड़काव से पहले इन बातों का रखें ध्यान

कीटनाशक का इस्तेमाल निर्धारित मात्रा में ही किया जाना चाहिए। दवा के इस्तेमाल से पहले उत्पाद के लेबल और निर्देशों को ध्यान से पढ़ना जरूरी है। छिड़काव के दौरान दस्ताने और मास्क जैसे सुरक्षा साधनों का इस्तेमाल करना चाहिए। तेज हवा या बारिश की आशंका के दौरान छिड़काव से बचने की सलाह दी गई है। जरूरत पड़ने पर किसान स्थानीय कृषि अधिकारी, कृषि विस्तार अधिकारी या कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञ से सलाह ले सकते हैं।

किसान यहां से ले सकते हैं कृषि सलाह

किसान ब्लॉक या जिला स्तर पर कृषि विस्तार अधिकारी (RAEO) अथवा उप संचालक कृषि कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं। सोयाबीन फसल की सुरक्षा और रोग प्रबंधन से संबंधित मार्गदर्शन के लिए इंदौर स्थित भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान से भी सलाह ली जा सकती है। तत्काल कृषि सलाह के लिए किसान कॉल सेंटर के टोल-फ्री नंबर 1551 पर संपर्क किया जा सकता है।

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Aakash Sharma
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आकाश शर्मा मध्यप्रदेश के नीमच क्षेत्र में सक्रिय पत्रकार और द टाइम्स ऑफ MP के संपादक हैं। उन्हें प्रिंट मीडिया में 12 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव है। लंबे समय से स्थानीय एवं जनसरोकार से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग, समाचार संपादन और समाचार प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उन्होंने स्थानीय पत्रकारिता में व्यापक अनुभव हासिल किया है।द टाइम्स ऑफ MP के माध्यम से आकाश शर्मा नीमच, मंदसौर और आसपास के क्षेत्रों से जुड़ी महत्वपूर्ण खबरों को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। उनकी कवरेज में स्थानीय प्रशासन, पुलिस एवं कानून-व्यवस्था, जनसमस्याएं, नागरिक सुविधाएं, राजनीति, सामाजिक गतिविधियां, शिक्षा, कृषि, व्यापार और अन्य जनहित से जुड़े विषय शामिल हैं।उनकी संपादकीय कार्यशैली में तथ्यपरक रिपोर्टिंग, स्रोत-आधारित जानकारी, निष्पक्ष प्रस्तुति और जिम्मेदार पत्रकारिता को प्राथमिकता दी जाती है। संवेदनशील और अपराध से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग में आरोप और प्रमाणित तथ्य के बीच अंतर बनाए रखने तथा उपलब्ध आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर खबर प्रस्तुत करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।पत्रकारिता के साथ आकाश शर्मा पिछले 4 वर्षों से पैरा लीगल वॉलंटियर (PLV) के रूप में भी कार्य कर रहे हैं। इस भूमिका में वे कानूनी जागरूकता और जनहित से जुड़े कार्यों से जुड़े रहे हैं। इसके साथ ही वे इंटरनेशनल ह्यूमन सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशन में जिला उपाध्यक्ष (District Vice President) के दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।अनुभव 12 वर्ष — प्रिंट मीडिया एवं पत्रकारिता का अनुभव 4 वर्ष — पैरा लीगल वॉलंटियर (PLV) के रूप में अनुभव संपादक — द टाइम्स ऑफ MP जिला उपाध्यक्ष — इंटरनेशनल ह्यूमन सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशनआकाश शर्मा का उद्देश्य स्थानीय स्तर की महत्वपूर्ण सूचनाओं को विश्वसनीय, स्पष्ट, तथ्यपरक और जिम्मेदार पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाना तथा आम नागरिकों से जुड़े मुद्दों को प्रभावी मंच प्रदान करना है।विशेषज्ञता: स्थानीय पत्रकारिता | प्रिंट मीडिया | समाचार संपादन | डिजिटल पत्रकारिता | स्थानीय समाचार रिपोर्टिंग | जनहित के मुद्दे | कानूनी जागरूकता |

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