नई दिल्ली। बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं और ईंधन की संभावित कमी को देखते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। ईंधन की बचत को प्राथमिकता देते हुए सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने न्यायिक व्यवस्था को प्रभावित किए बिना कई नई व्यवस्थाएं लागू की हैं। इन फैसलों में चुनिंदा मामलों की वर्चुअल सुनवाई, जजों के लिए कार-पूलिंग व्यवस्था और रजिस्ट्री कर्मचारियों के लिए वर्क फ्रॉम होम जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि मौजूदा समय में संसाधनों का समझदारी से उपयोग करना बेहद जरूरी हो गया है। अदालत ने साफ किया है कि ईंधन की बचत केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी है। यही कारण है कि न्यायपालिका ने भी अपने स्तर पर व्यावहारिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
अदालतों में बढ़ेगा डिजिटल सिस्टम का उपयोग
सुप्रीम कोर्ट प्रशासन के अनुसार जिन मामलों में पक्षकारों की शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य नहीं है, वहां अब वर्चुअल सुनवाई को प्राथमिकता दी जाएगी। इससे न केवल वकीलों और पक्षकारों की यात्रा कम होगी, बल्कि हजारों लीटर ईंधन की बचत भी संभव हो सकेगी।
कोर्ट अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन सुनवाई का ढांचा काफी मजबूत हुआ है। कोविड काल में विकसित हुई डिजिटल व्यवस्था अब ईंधन की बचत के उद्देश्य से फिर से बड़े स्तर पर उपयोग में लाई जा रही है। इससे न्यायिक प्रक्रिया भी प्रभावित नहीं होगी और लोगों को अनावश्यक यात्रा से राहत मिलेगी।
जजों के लिए कार-पूलिंग व्यवस्था लागू
ईंधन की बचत अभियान के तहत सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों के लिए कार-पूलिंग व्यवस्था को भी प्रोत्साहित किया है। जानकारी के अनुसार जिन जजों के आवास और यात्रा मार्ग समान हैं, उन्हें एक ही वाहन में यात्रा करने की सलाह दी गई है। इससे सरकारी वाहनों की संख्या कम होगी और ईंधन की खपत पर नियंत्रण रखा जा सकेगा।
अदालत प्रशासन का मानना है कि छोटी-छोटी व्यवस्थाओं से बड़े स्तर पर असर दिखाई दे सकता है। यदि देश की बड़ी संस्थाएं इस तरह के कदम उठाती हैं, तो आम लोगों में भी संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग का संदेश जाएगा।
रजिस्ट्री स्टाफ को मिला वर्क फ्रॉम होम विकल्प
सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री के कई कर्मचारियों को अब चरणबद्ध तरीके से वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दी जा रही है। जिन कर्मचारियों का काम डिजिटल माध्यम से संभव है, उन्हें घर से कार्य करने की अनुमति दी गई है। इससे प्रतिदिन कार्यालय आने-जाने में होने वाली ईंधन खपत को कम किया जा सकेगा।
अधिकारियों के मुताबिक, इस व्यवस्था से कार्यालय संचालन पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। डिजिटल फाइलिंग, ऑनलाइन दस्तावेज प्रबंधन और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसी तकनीकों के कारण अब कई प्रशासनिक कार्य दूरस्थ रूप से भी आसानी से किए जा सकते हैं।
ईंधन संकट को लेकर सरकार भी सतर्क
अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण कई देशों में ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है। भारत सरकार भी लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए कदम अन्य सरकारी संस्थानों के लिए भी उदाहरण बन सकते हैं।
ईंधन की बचत को लेकर लंबे समय से जागरूकता अभियान चलाए जाते रहे हैं, लेकिन अब संस्थागत स्तर पर ठोस कार्रवाई देखने को मिल रही है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी विभाग और निजी संस्थान हाइब्रिड कार्य प्रणाली अपनाते हैं, तो देशभर में ईंधन की खपत में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
आम लोगों पर भी पड़ सकता है सकारात्मक असर
सुप्रीम कोर्ट की इस पहल का असर आम नागरिकों पर भी दिखाई दे सकता है। यदि बड़े संस्थान वर्चुअल मीटिंग, कार-पूलिंग और सीमित यात्रा जैसे उपायों को अपनाते हैं, तो आम लोग भी इससे प्रेरित होंगे। इससे ट्रैफिक दबाव कम होगा, प्रदूषण घटेगा और ईंधन की बचत को बढ़ावा मिलेगा।
दिल्ली-एनसीआर जैसे बड़े शहरों में प्रतिदिन लाखों वाहन सड़कों पर उतरते हैं। ऐसे में यदि कुछ प्रतिशत लोग भी साझा यात्रा या घर से काम करने की व्यवस्था अपनाते हैं, तो इसका सीधा फायदा पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को मिल सकता है।
न्यायिक व्यवस्था प्रभावित नहीं होगी
सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है। अदालत के नियमित कामकाज और जरूरी मामलों की सुनवाई पहले की तरह जारी रहेगी। जिन मामलों में व्यक्तिगत उपस्थिति जरूरी होगी, वहां सामान्य प्रक्रिया ही अपनाई जाएगी।
अदालत का कहना है कि तकनीक और प्रशासनिक प्रबंधन के सही उपयोग से न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। यही कारण है कि ईंधन की बचत के साथ-साथ डिजिटल दक्षता पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।
ताज़ा ख़बरों का अपडेट सीधा अपने फोन पर पाने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।






