नीमच : बच्चे की हर दूसरे दिन नई फरमाइश और पैसों की कीमत को लेकर उसकी कम समझ कई माता-पिता के लिए चिंता का विषय हो सकती है। खासकर 10 से 12 साल की उम्र में कुछ आसान आदतों के जरिए बच्चे को बजट, जरूरत और चाहत के बीच अंतर तथा सोच-समझकर पैसे खर्च करने की अहमियत सिखाई जा सकती है।
बच्चे को पैसों की कीमत कैसे सिखाएं, इसका मतलब केवल उसे खर्च करने से रोकना नहीं है। दिए गए सुझावों के अनुसार, बच्चे को सीमित पॉकेट मनी देना, हर मांग तुरंत पूरी न करना, खरीदारी के छोटे फैसलों में शामिल करना, घर के बजट की बेसिक जानकारी देना और माता-पिता का खुद जिम्मेदारी से खर्च करना इसमें मदद कर सकता है।
बच्चे को पैसों की कीमत समझाना क्यों जरूरी?
कई माता-पिता की शिकायत रहती है कि उनका बच्चा पैसे की वैल्यू नहीं समझता और बार-बार किसी नई चीज की मांग करता है। समझाने के बाद भी उसकी फरमाइशों में कमी नहीं आती। ऐसे में सिर्फ मना करने के बजाय बच्चे को यह समझाने की जरूरत होती है कि उपलब्ध पैसे को अलग-अलग जरूरतों के बीच कैसे इस्तेमाल किया जाता है।
10 से 12 साल के बच्चे को पांच आसान तरीकों से पैसों की अहमियत समझाने की शुरुआत की जा सकती है। इन तरीकों में बच्चे को खुद छोटे आर्थिक फैसले लेने का मौका देना भी शामिल है।
1. फिक्स्ड पॉकेट मनी से सिखाएं बजट बनाना

पहला तरीका बच्चे के लिए पॉकेट मनी की एक निश्चित रकम तय करना है। उसे हर बार मांगने पर अतिरिक्त पैसे देने के बजाय पहले से तय राशि देना बच्चे के लिए बजट समझने की शुरुआत हो सकती है। जब बच्चे के पास खर्च करने के लिए सीमित रकम होगी, तो उसे तय करना होगा कि वह उस पैसे का इस्तेमाल किस चीज के लिए करे। इससे धीरे-धीरे यह समझ विकसित हो सकती है कि पैसे सीमित हैं और हर इच्छा पर तुरंत खर्च करना संभव नहीं होता।
इस तरीके का उद्देश्य बच्चे को केवल पैसे देना नहीं, बल्कि उपलब्ध रकम का सही इस्तेमाल करना सिखाना है।
2. बच्चे की हर मांग तुरंत पूरी न करें

दूसरा तरीका बच्चे की हर छोटी-बड़ी मांग को तुरंत पूरा न करना है। बच्चे से पूछा जा सकता है कि जिस चीज की वह अभी मांग कर रहा है, क्या एक सप्ताह बाद भी उसे उसकी उतनी ही जरूरत महसूस होगी? यह सवाल बच्चे को अपनी इच्छा के बारे में दोबारा सोचने का मौका देता है। इससे वह धीरे-धीरे तत्काल इच्छा और वास्तविक जरूरत के बीच अंतर समझ सकता है। बार-बार तुरंत खरीदारी करने के बजाय कुछ समय इंतजार करने की आदत बच्चे में अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण विकसित करने में मदद कर सकती है।
3. शॉपिंग में बच्चे को भी फैसला लेने दें

बच्चों को पैसे की वैल्यू समझाने के लिए उन्हें छोटे फैसले लेने का मौका देना भी उपयोगी तरीका बताया गया है। उदाहरण के तौर पर, खरीदारी के लिए ₹500 का बजट तय है तो बच्चे को विकल्प दिया जा सकता है कि वह एक महंगी चीज लेना चाहता है या उसी बजट में दो छोटी चीजें। यहां फैसला बच्चे को लेने दें। इससे उसे समझने का मौका मिलता है कि एक विकल्प चुनने का अर्थ कभी-कभी दूसरे विकल्प को छोड़ना भी होता है।
ऐसे छोटे निर्णय बच्चे को उपलब्ध बजट के भीतर अपनी प्राथमिकताएं तय करना सिखा सकते हैं। यही आदत आगे चलकर सोच-समझकर पैसे खर्च करने की समझ विकसित करने में मदद कर सकती है।
4. घर के बजट की बेसिक जानकारी दें

बच्चे को पैसों की कीमत कैसे सिखाएं, इसके लिए घर के बजट की बेसिक बातें भी उसके साथ साझा की जा सकती हैं। हालांकि, इसके लिए उसे ईएमआई या आर्थिक तनाव जैसी जटिल बातें समझाने की जरूरत नहीं है। बच्चे को सामान्य तरीके से बताया जा सकता है कि घर में आने वाले पैसे अलग-अलग जरूरतों और खर्चों के लिए बांटे जाते हैं।
उसे समझाया जा सकता है कि घर में हर रकम केवल खरीदारी के लिए उपलब्ध नहीं होती। अलग-अलग जरूरतों के लिए पैसे का इस्तेमाल किया जाता है। इससे बच्चे में यह समझ विकसित हो सकती है कि पैसे असीमित नहीं हैं और उन्हें प्राथमिकताओं के आधार पर खर्च करना पड़ता है।
5. माता-पिता खुद बनें जिम्मेदार खर्च का उदाहरण

पांचवां तरीका माता-पिता के अपने व्यवहार से जुड़ा है। बच्चे माता-पिता की बातों के साथ उनके व्यवहार को भी देखते और अपनाते हैं। अगर माता-पिता खुद बिना सोचे-समझे खरीदारी करते हैं, लेकिन बच्चे से बचत और नियंत्रित खर्च की उम्मीद रखते हैं, तो संदेश का असर कम हो सकता है। इसलिए बच्चों में बचत की आदत विकसित करने के साथ माता-पिता को भी खरीदारी और खर्च को लेकर जिम्मेदार व्यवहार दिखाना चाहिए। बच्चा जब परिवार में बजट, जरूरत और प्राथमिकता के आधार पर फैसले होते देखेगा, तो उसके लिए इन आदतों को समझना आसान हो सकता है।
जरूरत और चाहत का फर्क समझना भी जरूरी
पैसों की अहमियत सिखाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बच्चे को जरूरत और चाहत का फर्क समझाना है। हर पसंदीदा चीज जरूरी नहीं होती और हर चीज तुरंत खरीदना भी जरूरी नहीं है। फिक्स्ड पॉकेट मनी, खरीदारी के विकल्प और कुछ समय इंतजार करने जैसी आदतें इसी समझ को विकसित करने में मदद कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, बच्चे को कोई चीज पसंद आती है तो तुरंत खरीदने के बजाय उसे कुछ दिन इंतजार करने को कहा जा सकता है।
इसके बाद भी वह उस चीज को जरूरी मानता है तो उपलब्ध पॉकेट मनी या तय बजट के आधार पर फैसला करने का मौका दिया जा सकता है।
डांटने के बजाय छोटे फैसलों से दें सीख
दिए गए सुझावों से यह स्पष्ट होता है कि बच्चे को पैसों की अहमियत समझाने के लिए रोजमर्रा की छोटी परिस्थितियों का इस्तेमाल किया जा सकता है। पॉकेट मनी तय करना, सीमित बजट में विकल्प चुनवाना और घर के सामान्य खर्च की जानकारी देना इसके व्यावहारिक तरीके हैं। इस प्रक्रिया में माता-पिता का व्यवहार भी अहम है। बच्चे से जिम्मेदार खर्च की उम्मीद करने के साथ परिवार में भी सोच-समझकर खरीदारी करने की आदत दिखनी चाहिए।
इस तरह बचपन से ही बच्चे को यह समझाने की शुरुआत की जा सकती है कि पैसे खर्च करने से पहले जरूरत, उपलब्ध बजट और प्राथमिकता पर विचार करना जरूरी है।
FAQ Section
बच्चे को पैसों की कीमत किस उम्र में समझानी चाहिए?
दिए गए सुझाव खासतौर पर 10 से 12 साल के बच्चों के संदर्भ में हैं। इस उम्र में पॉकेट मनी और छोटे खरीदारी संबंधी फैसलों के जरिए पैसे के इस्तेमाल की समझ विकसित करने की कोशिश की जा सकती है।
क्या बच्चे को पॉकेट मनी देना सही है?
पॉकेट मनी की एक फिक्स्ड राशि तय करना बच्चे को बजट और सीमित रकम के सही इस्तेमाल की शुरुआती समझ देने का तरीका हो सकता है।
बच्चे की हर मांग पूरी क्यों नहीं करनी चाहिए?
हर मांग तुरंत पूरी करने के बजाय बच्चे को कुछ समय इंतजार करने के लिए कहने से उसे जरूरत और इच्छा के बीच फर्क समझने तथा अपनी तत्काल इच्छाओं पर नियंत्रण सीखने का मौका मिल सकता है।
क्या बच्चों को घर के बजट के बारे में बताना चाहिए?
बेसिक जानकारी दी जा सकती है। दिए गए सुझाव के मुताबिक, ईएमआई या आर्थिक तनाव जैसी जटिल बातों के बजाय यह समझाया जा सकता है कि घर के पैसे अलग-अलग जरूरतों और खर्चों के लिए बांटे जाते हैं।
बच्चे में बचत और जिम्मेदार खर्च की आदत कैसे डालें?
फिक्स्ड पॉकेट मनी, सीमित बजट में फैसले लेने का मौका, हर मांग तुरंत पूरी न करना और माता-पिता का जिम्मेदार खर्च बच्चे को पैसे की अहमियत समझाने में मदद कर सकता है।
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