जबलपुर। मध्य प्रदेश में ऑनलाइन खाद वितरण की व्यवस्था जारी रहेगी। मंगलवार को जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने ई-विकास (डिस्ट्रीब्यूशन एंड एग्रीकल्चर फर्टिलाइजर सप्लाई सॉल्यूशन सिस्टम) के खिलाफ कृषि आदान विक्रेता संघ की याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने उर्वरकों की कालाबाजारी, जमाखोरी और गैर-कृषि उपयोग रोकने के लिए लागू इस व्यवस्था को नीतिगत निर्णय माना है, जिसमें न्यायालय सीमित परिस्थितियों में ही हस्तक्षेप कर सकता है।
फैसले के साथ किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थिति भी स्पष्ट हुई है। यदि किसी जिले में इंटरनेट या दूसरी तकनीकी समस्या के कारण ऑनलाइन सिस्टम काम नहीं करता है, तो संबंधित कलेक्टर परिस्थितियों के अनुसार पुरानी ऑफलाइन व्यवस्था लागू करने का निर्णय ले सकते हैं।
ऑनलाइन खाद वितरण पर विक्रेता संघ ने क्यों उठाए सवाल?
कृषि आदान विक्रेता संघ ने ई-विकास और ई-टोकन प्रणाली को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। संघ की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और तकनीकी जानकारी की कमी को प्रमुख समस्या बताया गया। याचिका में दलील दी गई कि ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी कमजोर रहने के कारण खाद वितरण के दौरान किसानों को परेशानी होती है। ई-टोकन प्रणाली में इंटरनेट और तकनीकी जानकारी की जरूरत के चलते किसानों के साथ उर्वरक विक्रेताओं को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को उर्वरक नियंत्रण आदेश, 1985 के विपरीत भी बताया था। कृषि आदान विक्रेता संघ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय अग्रवाल के साथ अधिवक्ता अमन गुप्ता ने पैरवी की। राज्य शासन की ओर से उप महाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली और केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ता सुयश ठाकुर उपस्थित हुए।
हाईकोर्ट ने व्यवस्था को लेकर क्या कहा?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उर्वरकों की कालाबाजारी, जमाखोरी और गैर-कृषि उपयोग रोकने के लिए बनाई गई व्यवस्था केंद्र सरकार का नीतिगत निर्णय है। ऐसे नीतिगत मामलों में न्यायालय सीमित परिस्थितियों में ही हस्तक्षेप कर सकता है। अदालत ने इसी आधार पर कृषि आदान विक्रेता संघ की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद प्रदेश में ऑनलाइन खाद वितरण की मौजूदा व्यवस्था जारी रहने का रास्ता साफ हो गया है।
इस मामले में 10 मार्च 2026 को हुई सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। उस सुनवाई में राज्य सरकार ने पुरानी व्यवस्था में होने वाली गड़बड़ियों को लेकर अपना पक्ष रखा था।
सरकार ने बताया, क्यों लाई गई ई-विकास प्रणाली?
10 मार्च की सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली ने अदालत को बताया था कि पुरानी व्यवस्था में खेती नहीं करने वाले लोग भी सब्सिडी वाली खाद खरीद लेते थे। सरकार के अनुसार, ऐसी खाद की कालाबाजारी होती थी या उसका गैर-कृषि कार्यों में उपयोग किया जाता था। राज्य सरकार ने बताया कि ई-विकास प्रणाली में किसानों को उनकी भूमि के रिकॉर्ड के आधार पर खाद उपलब्ध कराई जा रही है। सरकार के मुताबिक, इसका उद्देश्य अवैध भंडारण और कालाबाजारी पर प्रभावी रोक लगाना है।
इस मामले में जहां विक्रेता संघ ने इंटरनेट और तकनीकी परेशानियों को आधार बनाकर ऑनलाइन खाद वितरण पर सवाल उठाए, वहीं सरकार ने नई व्यवस्था को कालाबाजारी और गैर-कृषि उपयोग रोकने से जोड़ा।
बटाई और किराए पर खेती करने वालों के लिए क्या व्यवस्था?
भूमि रिकॉर्ड के आधार पर खाद मिलने के बीच बटाई या किराए पर खेती करने वाले किसानों को लेकर भी सरकार ने स्थिति स्पष्ट की थी। राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि ऐसे किसान एसडीएम से सत्यापन करा सकते हैं। सत्यापन होने के बाद बटाई या किराए पर खेती करने वाले किसान ई-टोकन के माध्यम से खाद प्राप्त कर सकते हैं। इससे भूमि रिकॉर्ड आधारित व्यवस्था के साथ उन किसानों के लिए भी विकल्प रखा गया है, जो अपनी जमीन के बजाय बटाई या किराए की जमीन पर खेती करते हैं।
इंटरनेट नहीं चला तो यहीं काम आएगा क्लॉज 18.9
हाईकोर्ट के आदेश में ई-विकास प्रणाली के क्लॉज 18.9 का भी उल्लेख किया गया है। यह प्रावधान इंटरनेट या दूसरी तकनीकी समस्या आने की स्थिति में महत्वपूर्ण होगा। क्लॉज 18.9 के तहत यदि किसी जिले में इंटरनेट या अन्य तकनीकी समस्या उत्पन्न होती है, तो संबंधित जिला कलेक्टर परिस्थितियों के अनुसार पुरानी ऑफलाइन व्यवस्था लागू करने का निर्णय ले सकते हैं।
यानी सामान्य परिस्थितियों में प्रदेश में ऑनलाइन खाद वितरण जारी रहेगा, लेकिन तकनीकी बाधा आने पर ऑफलाइन व्यवस्था अपनाने का विकल्प भी मौजूद रहेगा।
फैसले के बाद अब क्या रहेगी व्यवस्था?
हाईकोर्ट द्वारा कृषि आदान विक्रेता संघ की याचिका खारिज किए जाने के बाद ई-विकास आधारित व्यवस्था फिलहाल जारी रहेगी। किसानों को भूमि रिकॉर्ड के आधार पर खाद देने की व्यवस्था बनी रहेगी, जबकि बटाई या किराए पर खेती करने वाले किसान एसडीएम से सत्यापन के बाद ई-टोकन से खाद प्राप्त कर सकेंगे।
वहीं इंटरनेट या तकनीकी समस्या आने पर संबंधित कलेक्टर परिस्थितियों के आधार पर ऑफलाइन व्यवस्था लागू करने का निर्णय ले सकेंगे। इस तरह हाईकोर्ट के फैसले के बाद ऑनलाइन खाद वितरण जारी रहेगा, लेकिन तकनीकी परेशानी की स्थिति के लिए ऑफलाइन विकल्प भी व्यवस्था में मौजूद है।
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