करोड़ों की आमदनी के बावजूद सांवलियाजी मंदिर की व्यवस्थाओं पर सवाल
चित्तौड़गढ़: चित्तौड़गढ़ जिले का प्रसिद्ध सांवलियाजी मंदिर एक बार फिर अपनी प्रशासनिक व्यवस्था और फैसलों की प्रक्रिया को लेकर चर्चा में है। पिछले करीब 35 वर्षों में मंदिर का चढ़ावा करीब 200 गुना तक बढ़ चुका है। श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में पहुंच गई है, लेकिन मंदिर का सिस्टम अब भी पुराने प्रशासनिक ढांचे पर चलता दिखाई देता है।
मीडिया रिपोर्ट और मंदिर से जुड़े लोगों के मुताबिक, करोड़ों रुपये की आय के बावजूद कई व्यवस्थाएं धीमी प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्भरता के कारण प्रभावित होती हैं। यही वजह है कि अब मंदिर प्रबंधन मॉडल पर सवाल उठने लगे हैं।
लाखों से करोड़ों तक पहुंचा चढ़ावा
जानकारी के अनुसार, 1991 के आसपास मंदिर की वार्षिक नकद आय करीब 10 से 15 लाख रुपये थी। वर्तमान में यह आंकड़ा बढ़कर करीब 31 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच चुका है। सोना-चांदी और अन्य दान सामग्री को जोड़ने पर वास्तविक चढ़ावा इससे भी अधिक माना जाता है। हर दिन हजारों श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं, जबकि त्योहारों और विशेष अवसरों पर यहां भारी भीड़ उमड़ती है। लगातार बढ़ती लोकप्रियता ने मंदिर की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया, लेकिन उसी अनुपात में व्यवस्थाओं का विस्तार नहीं हो पाया।
स्टाफ बढ़ा, लेकिन सिस्टम की रफ्तार नहीं बदली
रिपोर्ट के अनुसार, वर्षों में मंदिर कर्मचारियों की संख्या में बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन बढ़ती व्यवस्थाओं और श्रद्धालुओं के दबाव के मुकाबले इसे पर्याप्त नहीं माना जा रहा। स्थानीय लोगों का कहना है कि पार्किंग, भीड़ प्रबंधन, पेयजल, सफाई, ट्रैफिक कंट्रोल और श्रद्धालु सुविधाओं में आधुनिक स्तर के बदलाव की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। कई बार श्रद्धालुओं को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
मंदिर प्रबंधन में SDM स्तर तक निर्भरता क्यों?
मंदिर प्रशासन को लेकर सबसे बड़ी चर्चा फैसलों की प्रक्रिया को लेकर है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और विकास कार्य अब भी सरकारी मंजूरियों और SDM स्तर की प्रक्रिया पर निर्भर रहते हैं।
जानकारों का कहना है कि मंदिर मंडल का ढांचा लंबे समय से सरकारी नियंत्रण आधारित प्रणाली पर संचालित होता रहा है। ऐसे में निर्माण कार्य, व्यवस्थाओं में बदलाव, खर्च और कई प्रशासनिक निर्णयों के लिए अधिकारी स्तर की स्वीकृति जरूरी होती है। इसी कारण कई छोटे-बड़े कामों में भी देरी होने की बात सामने आती रही है।
SDM पर अतिरिक्त जिम्मेदारियों का दबाव
रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई कि SDM स्तर के अधिकारी पहले से ही राजस्व, कानून व्यवस्था, चुनाव, प्रशासनिक बैठकें और क्षेत्रीय जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं। इसके साथ मंदिर प्रबंधन से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर रहती है।
ऐसे में करोड़ों रुपये की आय और लाखों श्रद्धालुओं वाले बड़े धार्मिक संस्थान के लिए अलग प्रोफेशनल प्रबंधन मॉडल की जरूरत महसूस की जा रही है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि मंदिर को अधिक प्रशासनिक स्वतंत्रता और विशेषज्ञ व्यवस्था मिलनी चाहिए।
श्रद्धालुओं की उम्मीदें बढ़ीं
सांवलियाजी मंदिर राजस्थान और मध्यप्रदेश क्षेत्र का बड़ा आस्था केंद्र है। लगातार बढ़ती भीड़ और आय के कारण श्रद्धालु अब बेहतर सुविधाओं और तेज व्यवस्थाओं की उम्मीद कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि आधुनिक प्रबंधन, डिजिटल सिस्टम और स्वतंत्र प्रशासनिक ढांचा विकसित किया जाए तो मंदिर क्षेत्र को धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
व्यवस्थाओं को लेकर चर्चा तेज
मंदिर की बढ़ती आय और पुराने सिस्टम के बीच का अंतर अब चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। लोगों का कहना है कि जिस गति से चढ़ावा और श्रद्धालु बढ़े, उसी गति से व्यवस्थाओं और फैसलों की प्रक्रिया में बदलाव नहीं हो पाया। फिलहाल इस विषय पर मंदिर प्रशासन की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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